अध्याय 11, श्लोक 31
अध्याय 11: Nārāyaṇī Stuti — नारायणीस्तुतिरक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र । दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम् ॥
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लिप्यंतरण
rakṣāṃsi yatrograviṣāśca nāgā yatrārayo dasyubalāni yatra dāvānalo yatra tathābdhimadhye tatra sthitā tvaṃ paripāsi viśvam
अर्थ
जहाँ राक्षस और उग्र विष वाले नाग हैं, जहाँ शत्रु और दस्युओं के बल हैं, जहाँ दावानल है, और समुद्र के बीच में भी — वहाँ स्थित रहकर आप विश्व की रक्षा करती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 11.31 का अर्थ क्या है?▼
जहाँ राक्षस और उग्र विष वाले नाग हैं, जहाँ शत्रु और दस्युओं के बल हैं, जहाँ दावानल है, और समुद्र के बीच में भी — वहाँ स्थित रहकर आप विश्व की रक्षा करती हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 11 (Nārāyaṇī Stuti — नारायणी स्तुति) का 31वाँ श्लोक है।