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दुर्गा सप्तशती 11.30

अध्याय 11, श्लोक 30

अध्याय 11: Nārāyaṇī Stutiनारायणीस्तुति

विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपे- ष्वाद्येषु वाक्येषु का त्वदन्या ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम्

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लिप्यंतरण

vidyāsu śāstreṣu vivekadīpe- ṣvādyeṣu vākyeṣu ca kā tvadanyā mamatvagarte'timahāndhakāre vibhrāmayatyetadatīva viśvam

अर्थ

विद्याओं में, शास्त्रों में, विवेक के दीपों में और आद्य (वैदिक) वाक्यों में — आपके अतिरिक्त और कौन है? फिर भी आप ही इस विश्व को ममता के गड्ढे और अत्यन्त घोर अन्धकार में अत्यन्त भ्रमित करती हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 11.30 का अर्थ क्या है?
विद्याओं में, शास्त्रों में, विवेक के दीपों में और आद्य (वैदिक) वाक्यों में — आपके अतिरिक्त और कौन है? फिर भी आप ही इस विश्व को ममता के गड्ढे और अत्यन्त घोर अन्धकार में अत्यन्त भ्रमित करती हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 11 (Nārāyaṇī Stuti — नारायणी स्तुति) का 30वाँ श्लोक है।