अध्याय 11, श्लोक 29
अध्याय 11: Nārāyaṇī Stuti — नारायणीस्तुतिएतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य धर्मद्विषां देवि महासुराणाम् । रूपैरनेकैर्बहुधात्ममूर्तिं कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या ॥
🔊 किसी भी शब्द को सुनने के लिए टैप करें — या पूरा श्लोक सुनने के लिए ▶ दबाएँ
लिप्यंतरण
etatkṛtaṃ yatkadanaṃ tvayādya dharmadviṣāṃ devi mahāsurāṇām rūpairanekairbahudhātmamūrtiṃ kṛtvāmbike tatprakaroti kānyā
अर्थ
हे देवी! धर्मद्रोही महान् असुरों का जो यह संहार आज आपने किया — अपने एक ही स्वरूप को अनेक रूपों में बहुधा करके — हे अम्बिके! इसे और कौन कर सकती है?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 11.29 का अर्थ क्या है?▼
हे देवी! धर्मद्रोही महान् असुरों का जो यह संहार आज आपने किया — अपने एक ही स्वरूप को अनेक रूपों में बहुधा करके — हे अम्बिके! इसे और कौन कर सकती है?
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 11 (Nārāyaṇī Stuti — नारायणी स्तुति) का 29वाँ श्लोक है।