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दुर्गा सप्तशती 11.3

अध्याय 11, श्लोक 3

अध्याय 11: Nārāyaṇī Stutiनारायणीस्तुति

आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत- दाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये

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लिप्यंतरण

ādhārabhūtā jagatastvamekā mahīsvarūpeṇa yataḥ sthitāsi apāṃ svarūpasthitayā tvayaita- dāpyāyate kṛtsnamalaṅghyavīrye

अर्थ

आप ही अकेली जगत् की आधार हैं, क्योंकि आप पृथ्वी के रूप में स्थित हैं; और जल के रूप में स्थित आपसे ही यह सब आप्यायित (पुष्ट) होता है, हे अलंघ्य वीर्य वाली!

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 11.3 का अर्थ क्या है?
आप ही अकेली जगत् की आधार हैं, क्योंकि आप पृथ्वी के रूप में स्थित हैं; और जल के रूप में स्थित आपसे ही यह सब आप्यायित (पुष्ट) होता है, हे अलंघ्य वीर्य वाली!
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 11 (Nārāyaṇī Stuti — नारायणी स्तुति) का 3वाँ श्लोक है।