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दुर्गा सप्तशती 11.2

अध्याय 11, श्लोक 2

अध्याय 11: Nārāyaṇī Stutiनारायणीस्तुति

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य

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लिप्यंतरण

devi prapannārtihare prasīda prasīda mātarjagato'khilasya prasīda viśveśvari pāhi viśvaṃ tvamīśvarī devi carācarasya

अर्थ

'हे शरणागतों की पीड़ा हरने वाली देवी! प्रसन्न होइए; हे सम्पूर्ण जगत् की माता! प्रसन्न होइए; हे विश्वेश्वरी! प्रसन्न होकर विश्व की रक्षा कीजिए — हे देवी! आप ही चराचर की ईश्वरी हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 11.2 का अर्थ क्या है?
'हे शरणागतों की पीड़ा हरने वाली देवी! प्रसन्न होइए; हे सम्पूर्ण जगत् की माता! प्रसन्न होइए; हे विश्वेश्वरी! प्रसन्न होकर विश्व की रक्षा कीजिए — हे देवी! आप ही चराचर की ईश्वरी हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 11 (Nārāyaṇī Stuti — नारायणी स्तुति) का 2वाँ श्लोक है।