अध्याय 11, श्लोक 1
अध्याय 11: Nārāyaṇī Stuti — नारायणीस्तुतिॐ ऋषिरुवाच देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम् । कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद् विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः ॥
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लिप्यंतरण
oṃ ṛṣiruvāca devyā hate tatra mahāsurendre sendrāḥ surā vahnipurogamāstām kātyāyanīṃ tuṣṭuvuriṣṭalābhād vikāśivaktrābjavikāśitāśāḥ
अर्थ
(ॐ। ऋषि बोले —) जब देवी ने वहाँ महान् असुरराज का वध किया, तब अग्नि आदि देवता इन्द्र सहित — अभीष्ट की प्राप्ति से जिनके मुख-कमल खिल उठे और जिनसे दिशाएँ प्रफुल्लित हो गईं — कात्यायनी की स्तुति करने लगे:
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 11.1 का अर्थ क्या है?▼
(ॐ। ऋषि बोले —) जब देवी ने वहाँ महान् असुरराज का वध किया, तब अग्नि आदि देवता इन्द्र सहित — अभीष्ट की प्राप्ति से जिनके मुख-कमल खिल उठे और जिनसे दिशाएँ प्रफुल्लित हो गईं — कात्यायनी की स्तुति करने लगे:
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 11 (Nārāyaṇī Stuti — नारायणी स्तुति) का 1वाँ श्लोक है।