Mantra.Tips
दुर्गा सप्तशती 11.4

अध्याय 11, श्लोक 4

अध्याय 11: Nārāyaṇī Stutiनारायणीस्तुति

त्वं वैष्णवीशक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः

🔊 किसी भी शब्द को सुनने के लिए टैप करें — या पूरा श्लोक सुनने के लिए ▶ दबाएँ

लिप्यंतरण

tvaṃ vaiṣṇavīśaktiranantavīryā viśvasya bījaṃ paramāsi māyā sammohitaṃ devi samastametat tvaṃ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ

अर्थ

आप अनन्त वीर्य वाली वैष्णवी शक्ति हैं; आप विश्व के बीज और परम माया हैं। हे देवी! आपसे ही यह समस्त (जगत्) मोहित है; और आप ही प्रसन्न होने पर पृथ्वी पर मुक्ति की हेतु बनती हैं।

इस श्लोक को साझा करें
Share:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 11.4 का अर्थ क्या है?
आप अनन्त वीर्य वाली वैष्णवी शक्ति हैं; आप विश्व के बीज और परम माया हैं। हे देवी! आपसे ही यह समस्त (जगत्) मोहित है; और आप ही प्रसन्न होने पर पृथ्वी पर मुक्ति की हेतु बनती हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 11 (Nārāyaṇī Stuti — नारायणी स्तुति) का 4वाँ श्लोक है।