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दुर्गा सप्तशती 1.66

अध्याय 1, श्लोक 66

अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadhaमधुकैटभवध

त्वयैतत् पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते सर्वदा विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा पालने

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लिप्यंतरण

tvayaitat pālyate devi tvamatsyante ca sarvadā visṛṣṭau sṛṣṭirūpā tvaṃ sthitirūpā ca pālane

अर्थ

आपसे ही यह विश्व धारण किया जाता है, आपसे ही जगत् रचा जाता है; हे देवी! आपसे ही इसका पालन होता है और अंत में आप ही इसका भक्षण करती हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 1.66 का अर्थ क्या है?
आपसे ही यह विश्व धारण किया जाता है, आपसे ही जगत् रचा जाता है; हे देवी! आपसे ही इसका पालन होता है और अंत में आप ही इसका भक्षण करती हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 66वाँ श्लोक है।