अध्याय 1, श्लोक 65
अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधुकैटभवधत्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा । त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत् सृज्यते जगत् ॥
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लिप्यंतरण
tvameva sandhyā sāvitrī tvaṃ devi jananī parā tvayaitaddhāryate viśvaṃ tvayaitat sṛjyate jagat
अर्थ
वह नित्य अर्धमात्रा जो विशेष रूप से उच्चारित नहीं की जा सकती। हे देवी! आप ही संध्या, सावित्री और देवताओं की परा जननी हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 1.65 का अर्थ क्या है?▼
वह नित्य अर्धमात्रा जो विशेष रूप से उच्चारित नहीं की जा सकती। हे देवी! आप ही संध्या, सावित्री और देवताओं की परा जननी हैं।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 65वाँ श्लोक है।