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दुर्गा सप्तशती 1.62

अध्याय 1, श्लोक 62

अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadhaमधुकैटभवध

निद्रां भगवतीं विष्णुरतुलां तेजसः प्रभुः

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लिप्यंतरण

nidrāṃ bhagavatīṃ viṣṇuratulāṃ tejasaḥ prabhuḥ

अर्थ

तेज के स्वामी विष्णु की उस अतुलनीय भगवती निद्रा की स्तुति की।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 1.62 का अर्थ क्या है?
तेज के स्वामी विष्णु की उस अतुलनीय भगवती निद्रा की स्तुति की।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 62वाँ श्लोक है।