अध्याय 1, श्लोक 60
अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधुकैटभवधदृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम् । तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयः स्थितः ॥
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लिप्यंतरण
dṛṣṭvā tāvasurau cograu prasuptaṃ ca janārdanam tuṣṭāva yoganidrāṃ tāmekāgrahṛdayaḥ sthitaḥ
अर्थ
उन दोनों उग्र असुरों को और सोए हुए जनार्दन (विष्णु) को देखकर, एकाग्रचित्त होकर स्थिर रहकर योगनिद्रा की स्तुति करने लगे —
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 1.60 का अर्थ क्या है?▼
उन दोनों उग्र असुरों को और सोए हुए जनार्दन (विष्णु) को देखकर, एकाग्रचित्त होकर स्थिर रहकर योगनिद्रा की स्तुति करने लगे —
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 60वाँ श्लोक है।