अध्याय 1, श्लोक 58
अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधुकैटभवधआस्तीर्य शेषमभजत् कल्पान्ते भगवान् प्रभुः । तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ॥
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लिप्यंतरण
āstīrya śeṣamabhajat kalpānte bhagavān prabhuḥ tadā dvāvasurau ghorau vikhyātau madhukaiṭabhau
अर्थ
और भगवान् प्रभु शेषनाग पर शयन कर रहे थे — तब मधु और कैटभ नामक दो भयंकर प्रसिद्ध असुर,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 1.58 का अर्थ क्या है?▼
और भगवान् प्रभु शेषनाग पर शयन कर रहे थे — तब मधु और कैटभ नामक दो भयंकर प्रसिद्ध असुर,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 58वाँ श्लोक है।