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दुर्गा सप्तशती 1.57

अध्याय 1, श्लोक 57

अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadhaमधुकैटभवध

उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते

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लिप्यंतरण

utpanneti tadā loke sā nityāpyabhidhīyate yoganidrāṃ yadā viṣṇurjagatyekārṇavīkṛte

अर्थ

तब लोक में 'उत्पन्न' कही जाती हैं, यद्यपि वे नित्या ही हैं। कल्प के अंत में जब समस्त जगत् एकार्णव (एक समुद्र) हो गया, तब विष्णु योगनिद्रा में,

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 1.57 का अर्थ क्या है?
तब लोक में 'उत्पन्न' कही जाती हैं, यद्यपि वे नित्या ही हैं। कल्प के अंत में जब समस्त जगत् एकार्णव (एक समुद्र) हो गया, तब विष्णु योगनिद्रा में,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 57वाँ श्लोक है।