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दुर्गा सप्तशती 1.55

अध्याय 1, श्लोक 55

अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadhaमधुकैटभवध

ऋषिरुवाच नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम्

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लिप्यंतरण

ṛṣiruvāca nityaiva sā jaganmūrtistayā sarvamidaṃ tatam

अर्थ

ऋषि बोले — वह नित्या हैं, जगत्स्वरूपा हैं; उन्हीं से यह सब व्याप्त है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 1.55 का अर्थ क्या है?
ऋषि बोले — वह नित्या हैं, जगत्स्वरूपा हैं; उन्हीं से यह सब व्याप्त है।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 55वाँ श्लोक है।