अध्याय 1, श्लोक 50
अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधुकैटभवधसैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये । सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी ॥
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लिप्यंतरण
saiṣā prasannā varadā nṛṇāṃ bhavati muktaye sā vidyā paramā mukterhetubhūtā sanātanī
अर्थ
वही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिए वरदायिनी होती है। वह परम विद्या, मुक्ति की हेतुभूता और सनातनी है,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 1.50 का अर्थ क्या है?▼
वही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिए वरदायिनी होती है। वह परम विद्या, मुक्ति की हेतुभूता और सनातनी है,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 50वाँ श्लोक है।