Mantra.Tips
दुर्गा सप्तशती 1.50

अध्याय 1, श्लोक 50

अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadhaमधुकैटभवध

सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी

🔊 किसी भी शब्द को सुनने के लिए टैप करें — या पूरा श्लोक सुनने के लिए ▶ दबाएँ

लिप्यंतरण

saiṣā prasannā varadā nṛṇāṃ bhavati muktaye sā vidyā paramā mukterhetubhūtā sanātanī

अर्थ

वही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिए वरदायिनी होती है। वह परम विद्या, मुक्ति की हेतुभूता और सनातनी है,

इस श्लोक को साझा करें
Share:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 1.50 का अर्थ क्या है?
वही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिए वरदायिनी होती है। वह परम विद्या, मुक्ति की हेतुभूता और सनातनी है,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 50वाँ श्लोक है।