अध्याय 1, श्लोक 48
अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधुकैटभवधमहामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत् । ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ॥
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लिप्यंतरण
mahāmāyā hareścaiṣā tayā sammohyate jagat jñānināmapi cetāṃsi devī bhagavatī hi sā
अर्थ
वही विष्णु की महामाया है, जिससे यह जगत् मोहित होता है। वही भगवती देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 1.48 का अर्थ क्या है?▼
वही विष्णु की महामाया है, जिससे यह जगत् मोहित होता है। वही भगवती देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 48वाँ श्लोक है।