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दुर्गा सप्तशती 1.46

अध्याय 1, श्लोक 46

अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadhaमधुकैटभवध

लोभात् प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं पश्यसि तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः

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लिप्यंतरण

lobhāt pratyupakārāya nanvetān kiṃ na paśyasi tathāpi mamatāvartte mohagarte nipātitāḥ

अर्थ

लोभ से उनसे प्रत्युपकार की आशा करते हैं। क्या आप यह नहीं देखते? फिर भी वे ममता के भँवर और मोह के गड्ढे में गिराए जाते हैं,

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 1.46 का अर्थ क्या है?
लोभ से उनसे प्रत्युपकार की आशा करते हैं। क्या आप यह नहीं देखते? फिर भी वे ममता के भँवर और मोह के गड्ढे में गिराए जाते हैं,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 46वाँ श्लोक है।