अध्याय 1, श्लोक 45
अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधुकैटभवधकणमोक्षादृतान् मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा । मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति ॥
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लिप्यंतरण
kaṇamokṣādṛtān mohātpīḍyamānānapi kṣudhā mānuṣā manujavyāghra sābhilāṣāḥ sutān prati
अर्थ
जो भूख से स्वयं पीड़ित होते हुए भी मोहवश अपने भूखे बच्चों की खुली चोंचों में दाने डालते हैं। हे नरश्रेष्ठ! इसी प्रकार मनुष्य भी अपनी संतान के प्रति अभिलाषा से भरे रहते हैं,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 1.45 का अर्थ क्या है?▼
जो भूख से स्वयं पीड़ित होते हुए भी मोहवश अपने भूखे बच्चों की खुली चोंचों में दाने डालते हैं। हे नरश्रेष्ठ! इसी प्रकार मनुष्य भी अपनी संतान के प्रति अभिलाषा से भरे रहते हैं,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 45वाँ श्लोक है।