अध्याय 1, श्लोक 37
अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधुकैटभवधस्वजनेन च सन्त्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति । एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ ॥
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लिप्यंतरण
svajanena ca santyaktasteṣu hārdī tathāpyati evameṣa tathāhaṃ ca dvāvapyatyantaduḥkhitau
अर्थ
अपने स्वजनों द्वारा त्यागा जाकर भी उनमें उसका अत्यंत स्नेह है। इस प्रकार वह और मैं दोनों ही अत्यंत दुःखी हैं,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 1.37 का अर्थ क्या है?▼
अपने स्वजनों द्वारा त्यागा जाकर भी उनमें उसका अत्यंत स्नेह है। इस प्रकार वह और मैं दोनों ही अत्यंत दुःखी हैं,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 37वाँ श्लोक है।