अध्याय 1, श्लोक 36
अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधुकैटभवधजानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम । अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥
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लिप्यंतरण
jānato'pi yathājñasya kimetanmunisattama ayaṃ ca nikṛtaḥ putrairdārairbhṛtyaistathojjhitaḥ
अर्थ
ज्ञानी होते हुए भी अज्ञानी के समान। हे मुनिश्रेष्ठ! यह क्या है? और यह वैश्य भी अपने पुत्रों, स्त्री व सेवकों द्वारा तिरस्कृत और त्यागा गया है,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 1.36 का अर्थ क्या है?▼
ज्ञानी होते हुए भी अज्ञानी के समान। हे मुनिश्रेष्ठ! यह क्या है? और यह वैश्य भी अपने पुत्रों, स्त्री व सेवकों द्वारा तिरस्कृत और त्यागा गया है,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 36वाँ श्लोक है।