अध्याय 1, श्लोक 35
अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधुकैटभवधदुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना । ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि ॥
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लिप्यंतरण
duḥkhāya yanme manasaḥ svacittāyattatāṃ vinā mamatvaṃ gatarājyasya rājyāṅgeṣvakhileṣvapi
अर्थ
मेरे मन में जो दुःख है, वह मेरे अपने चित्त के वश में हुए बिना ही होता है — राज्य खो देने पर भी राज्य के समस्त अंगों में मेरी ममता बनी हुई है,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 1.35 का अर्थ क्या है?▼
मेरे मन में जो दुःख है, वह मेरे अपने चित्त के वश में हुए बिना ही होता है — राज्य खो देने पर भी राज्य के समस्त अंगों में मेरी ममता बनी हुई है,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 35वाँ श्लोक है।