अध्याय 1, श्लोक 32
अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधुकैटभवधसमाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः । कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम् ॥
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लिप्यंतरण
samādhirnāma vaiśyo'sau sa ca pārthivasattamaḥ kṛtvā tu tau yathānyāyaṃ yathārhaṃ tena saṃvidam
अर्थ
समाधि नामक वह वैश्य और वह राजश्रेष्ठ, मुनि के साथ यथायोग्य और यथोचित शिष्टाचार करके,
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 1.32 का अर्थ क्या है?▼
समाधि नामक वह वैश्य और वह राजश्रेष्ठ, मुनि के साथ यथायोग्य और यथोचित शिष्टाचार करके,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 32वाँ श्लोक है।