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दुर्गा सप्तशती 1.28

अध्याय 1, श्लोक 28

अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadhaमधुकैटभवध

पतिस्वजनहार्दं हार्दितेष्वेव मे मनः किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते

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लिप्यंतरण

patisvajanahārdaṃ ca hārditeṣveva me manaḥ kimetannābhijānāmi jānannapi mahāmate

अर्थ

पति और स्वजन का प्रेम छोड़कर भी, मेरा मन उन्हीं में लगा है। हे महामते! जानते हुए भी मैं इसे नहीं समझ पाता —

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 1.28 का अर्थ क्या है?
पति और स्वजन का प्रेम छोड़कर भी, मेरा मन उन्हीं में लगा है। हे महामते! जानते हुए भी मैं इसे नहीं समझ पाता —
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 28वाँ श्लोक है।