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दुर्गा सप्तशती 1.27

अध्याय 1, श्लोक 27

अध्याय 1: Madhu-Kaiṭabha Vadhaमधुकैटभवध

किं करोमि बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः यैः सन्त्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः

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लिप्यंतरण

kiṃ karomi na badhnāti mama niṣṭhuratāṃ manaḥ yaiḥ santyajya pitṛsnehaṃ dhanalubdhairnirākṛtaḥ

अर्थ

मैं क्या करूँ? मेरा मन उनके प्रति कठोर नहीं हो पाता। जिन लोभियों ने पिता के स्नेह को त्यागकर मुझे निकाल दिया,

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती 1.27 का अर्थ क्या है?
मैं क्या करूँ? मेरा मन उनके प्रति कठोर नहीं हो पाता। जिन लोभियों ने पिता के स्नेह को त्यागकर मुझे निकाल दिया,
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 1 (Madhu-Kaiṭabha Vadha — मधु-कैटभ वध) का 27वाँ श्लोक है।