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ਭਗਵਦ੍ਗੀਤਾ · ਅਧ੍ਯਾਯ 14 / 18

ਗੁਣਤ੍ਰਯਵਿਭਾਗਯੋਗ

Bhagavad Gita Chapter 14 in Punjabi (Gurmukhi)

Guṇa Traya Vibhāg Yog · तीन गुण · 27 श्लोक

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अध्याय सारांश

भगवद गीता का चौदहवा अध्याय गुणत्रयविभागयोग है। इस अध्याय में, कृष्ण भौतिक प्रकृति के तीन गुणों का वर्णन करते हैं जिनसे भौतिक संसार में सब कुछ प्रभावित होता है - अच्छाई, लालसा और अज्ञान। आगे वह इन तीनों गुणों के प्रधान अभिलक्षणों अथवा कारणों का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि कैसे ये तीनों गुण मनुष्य को प्रभावित करते हैं। फिर वह ऐसे व्यक्तियों की विभिन्न विशेषताओं का वर्णन करते हैं जो कि इन गुणों पर जीत पा चुके हैं। इस अध्याय के अंत में कृष्ण हमें सच्ची भक्ति कि शक्ति का स्मरण कराते हैं और बताते हैं की हम कैसे भगवन के साथ जुड़ कर इन गुणों को पार कर सकते हैं।

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ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚਪਰਂ ਭੂਯਃ ਪ੍ਰਵਕ੍ष੍ਯਾਮਿ ਜ੍ਞਾਨਾਨਾਂ ਜ੍ਞਾਨਮੁਤ੍ਤਮਮ੍।ਯਜ੍ਜ੍ਞਾਤ੍ਵਾ ਮੁਨਯਃ ਸਰ੍ਵੇ ਪਰਾਂ ਸਿਦ੍ਧਿਮਿਤੋ ਗਤਾਃ॥

śhrī-bhagavān uvācha paraṁ bhūyaḥ pravakṣhyāmi jñānānāṁ jñānam uttamam yaj jñātvā munayaḥ sarve parāṁ siddhim ito gatāḥ

अर्थश्री भगवान् ने कहा -- समस्त ज्ञानों में उत्तम परम ज्ञान को मैं पुन: कहूंगा, जिसको जानकर सभी मुनिजन इस (लोक) से जाकर (इस जीवनोपरान्त) परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।।

ਇਦਂ ਜ੍ਞਾਨਮੁਪਾਸ਼੍ਰਿਤ੍ਯ ਮਮ ਸਾਧਰ੍ਮ੍ਯਮਾਗਤਾਃ।ਸਰ੍ਗੇऽਪਿ ਨੋਪਜਾਯਨ੍ਤੇ ਪ੍ਰਲਯੇ ਵ੍ਯਥਨ੍ਤਿ ਚ॥

idaṁ jñānam upāśhritya mama sādharmyam āgatāḥ sarge ’pi nopajāyante pralaye na vyathanti cha

अर्थइस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे स्वरूप (सार्धम्यम्) को प्राप्त पुरुष सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते और प्रलयकाल में व्याकुल भी नहीं होते हैं।।

ਮਮ ਯੋਨਿਰ੍ਮਹਦ੍ਬ੍ਰਹ੍ਮ ਤਸ੍ਮਿਨ੍ ਗਰ੍ਭਂ ਦਧਾਮ੍ਯਹਮ੍।ਸਂਭਵਃ ਸਰ੍ਵਭੂਤਾਨਾਂ ਤਤੋ ਭਵਤਿ ਭਾਰਤ॥

mama yonir mahad brahma tasmin garbhaṁ dadhāmy aham sambhavaḥ sarva-bhūtānāṁ tato bhavati bhārata

अर्थहे भारत ! मेरी महद् ब्रह्मरूप प्रकृति, (भूतों की) योनि है, जिसमें मैं गर्भाधान करता हूँ; इससे समस्त भूतों की उत्पत्ति होती है।।

ਸਰ੍ਵਯੋਨਿषੁ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਮੂਰ੍ਤਯਃ ਸਮ੍ਭਵਨ੍ਤਿ ਯਾਃ।ਤਾਸਾਂ ਬ੍ਰਹ੍ਮ ਮਹਦ੍ਯੋਨਿਰਹਂ ਬੀਜਪ੍ਰਦਃ ਪਿਤਾ॥

sarva-yoniṣhu kaunteya mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ tāsāṁ brahma mahad yonir ahaṁ bīja-pradaḥ pitā

अर्थहे कौन्तेय ! समस्त योनियों में जितनी मूर्तियाँ (शरीर) उत्पन्न होती हैं, उन सबकी योनि अर्थात् गर्भ है महद्ब्रह्म और मैं बीज की स्थापना करने वाला पिता हूँ।।

ਸਤ੍ਤ੍ਵਂ ਰਜਸ੍ਤਮ ਇਤਿ ਗੁਣਾਃ ਪ੍ਰਕृਤਿਸਂਭਵਾਃ।ਨਿਬਧ੍ਨਨ੍ਤਿ ਮਹਾਬਾਹੋ ਦੇਹੇ ਦੇਹਿਨਮਵ੍ਯਯਮ੍॥

sattvaṁ rajas tama iti guṇāḥ prakṛiti-sambhavāḥ nibadhnanti mahā-bāho dehe dehinam avyayam

अर्थहे महाबाहो ! सत्त्व, रज और तम ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण देही आत्मा को देह के साथ बांध देते हैं।।

ਤਤ੍ਰ ਸਤ੍ਤ੍ਵਂ ਨਿਰ੍ਮਲਤ੍ਵਾਤ੍ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਕਮਨਾਮਯਮ੍।ਸੁਖਸਙ੍ਗੇਨ ਬਧ੍ਨਾਤਿ ਜ੍ਞਾਨਸਙ੍ਗੇਨ ਚਾਨਘ॥

tatra sattvaṁ nirmalatvāt prakāśhakam anāmayam sukha-saṅgena badhnāti jñāna-saṅgena chānagha

अर्थहे निष्पाप अर्जुन ! इन (तीनों) में, सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाशक और अनामय (निरुपद्रव, निर्विकार या निरोग) है; (वह जीव को) सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बांध देता है।।

ਰਜੋ ਰਾਗਾਤ੍ਮਕਂ ਵਿਦ੍ਧਿ ਤृष੍ਣਾਸਙ੍ਗਸਮੁਦ੍ਭਵਮ੍।ਤਨ੍ਨਿਬਧ੍ਨਾਤਿ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਕਰ੍ਮਸਙ੍ਗੇਨ ਦੇਹਿਨਮ੍॥

rajo rāgātmakaṁ viddhi tṛiṣhṇā-saṅga-samudbhavam tan nibadhnāti kaunteya karma-saṅgena dehinam

अर्थहे कौन्तेय ! रजोगुण को रागस्वरूप जानो, जिससे तृष्णा और आसक्ति उत्पन्न होती है। वह देही आत्मा को कर्मों की आसक्ति से बांधता है।।

ਤਮਸ੍ਤ੍ਵਜ੍ਞਾਨਜਂ ਵਿਦ੍ਧਿ ਮੋਹਨਂ ਸਰ੍ਵਦੇਹਿਨਾਮ੍।ਪ੍ਰਮਾਦਾਲਸ੍ਯਨਿਦ੍ਰਾਭਿਸ੍ਤਨ੍ਨਿਬਧ੍ਨਾਤਿ ਭਾਰਤ॥

tamas tv ajñāna-jaṁ viddhi mohanaṁ sarva-dehinām pramādālasya-nidrābhis tan nibadhnāti bhārata

अर्थऔर हे भारत ! तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जानो; जो समस्त देहधारियों (जीवों) को मोहित करने वाला है। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा जीव को बांधता है।।

ਸਤ੍ਤ੍ਵਂ ਸੁਖੇ ਸਞ੍ਜਯਤਿ ਰਜਃ ਕਰ੍ਮਣਿ ਭਾਰਤ।ਜ੍ਞਾਨਮਾਵृਤ੍ਯ ਤੁ ਤਮਃ ਪ੍ਰਮਾਦੇ ਸਞ੍ਜਯਤ੍ਯੁਤ॥

sattvaṁ sukhe sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata jñānam āvṛitya tu tamaḥ pramāde sañjayaty uta

अर्थहे भारत ! सत्त्वगुण सुख में आसक्त कर देता है और रजोगुण कर्म में, किन्तु तमोगुण ज्ञान को आवृत्त करके जीव को प्रमाद से युक्त कर देता है।।

ਰਜਸ੍ਤਮਸ਼੍ਚਾਭਿਭੂਯ ਸਤ੍ਤ੍ਵਂ ਭਵਤਿ ਭਾਰਤ।ਰਜਃ ਸਤ੍ਤ੍ਵਂ ਤਮਸ਼੍ਚੈਵ ਤਮਃ ਸਤ੍ਤ੍ਵਂ ਰਜਸ੍ਤਥਾ॥

rajas tamaśh chābhibhūya sattvaṁ bhavati bhārata rajaḥ sattvaṁ tamaśh chaiva tamaḥ sattvaṁ rajas tathā

अर्थहे भारत ! कभी रज और तम को अभिभूत (दबा) करके सत्त्वगुण की वृद्धि होती है, कभी रज और सत्त्व को दबाकर तमोगुण की वृद्धि होती है, तो कभी तम और सत्त्व को अभिभूत कर रजोगुण की वृद्धि होती है।।

ਸਰ੍ਵਦ੍ਵਾਰੇषੁ ਦੇਹੇऽਸ੍ਮਿਨ੍ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਉਪਜਾਯਤੇ।ਜ੍ਞਾਨਂ ਯਦਾ ਤਦਾ ਵਿਦ੍ਯਾਦ੍ਵਿਵृਦ੍ਧਂ ਸਤ੍ਤ੍ਵਮਿਤ੍ਯੁਤ॥

sarva-dvāreṣhu dehe ’smin prakāśha upajāyate jñānaṁ yadā tadā vidyād vivṛiddhaṁ sattvam ity uta

अर्थजब इस देह के द्वारों अर्थात् समस्त इन्द्रियों में ज्ञानरूप प्रकाश उत्पन्न होता है, तब सत्त्वगुण को प्रवृद्ध हुआ जानो।।

ਲੋਭਃ ਪ੍ਰਵृਤ੍ਤਿਰਾਰਮ੍ਭਃ ਕਰ੍ਮਣਾਮਸ਼ਮਃ ਸ੍ਪृਹਾ।ਰਜਸ੍ਯੇਤਾਨਿ ਜਾਯਨ੍ਤੇ ਵਿਵृਦ੍ਧੇ ਭਰਤਰ੍षਭ॥

lobhaḥ pravṛittir ārambhaḥ karmaṇām aśhamaḥ spṛihā rajasy etāni jāyante vivṛiddhe bharatarṣhabha

अर्थहे भरत-श्रेष्ठ ! रजोगुण के प्रवृद्ध होने पर लोभ, प्रवृत्ति (सामान्य चेष्टा) कर्मों का आरम्भ, शम का अभाव तथा स्पृहा, ये सब उत्पन्न होते हैं।।

ਅਪ੍ਰਕਾਸ਼ੋऽਪ੍ਰਵृਤ੍ਤਿਸ਼੍ਚ ਪ੍ਰਮਾਦੋ ਮੋਹ ਏਵ ਚ।ਤਮਸ੍ਯੇਤਾਨਿ ਜਾਯਨ੍ਤੇ ਵਿਵृਦ੍ਧੇ ਕੁਰੁਨਨ੍ਦਨ॥

aprakāśho ’pravṛittiśh cha pramādo moha eva cha tamasy etāni jāyante vivṛiddhe kuru-nandana

अर्थहे कुरुनन्दन ! तमोगुण के प्रवृद्ध होने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह ये सब उत्पन्न होते हैं।।

ਯਦਾ ਸਤ੍ਤ੍ਵੇ ਪ੍ਰਵृਦ੍ਧੇ ਤੁ ਪ੍ਰਲਯਂ ਯਾਤਿ ਦੇਹਭृਤ੍।ਤਦੋਤ੍ਤਮਵਿਦਾਂ ਲੋਕਾਨਮਲਾਨ੍ਪ੍ਰਤਿਪਦ੍ਯਤੇ॥

yadā sattve pravṛiddhe tu pralayaṁ yāti deha-bhṛit tadottama-vidāṁ lokān amalān pratipadyate

अर्थजब यह जीव (देहभृत्) सत्त्वगुण की प्रवृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल अर्थात् स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है।।

ਰਜਸਿ ਪ੍ਰਲਯਂ ਗਤ੍ਵਾ ਕਰ੍ਮਸਙ੍ਗਿषੁ ਜਾਯਤੇ।ਤਥਾ ਪ੍ਰਲੀਨਸ੍ਤਮਸਿ ਮੂਢਯੋਨਿषੁ ਜਾਯਤੇ॥

rajasi pralayaṁ gatvā karma-saṅgiṣhu jāyate tathā pralīnas tamasi mūḍha-yoniṣhu jāyate

अर्थरजोगुण के प्रवृद्ध काल में मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मासक्ति वाले (मनुष्य) लोक में वह जन्म लेता है तथा तमोगुण के प्रवृद्धकाल में (मरण होने पर) मूढ़योनि में जन्म लेता है।।

ਕਰ੍ਮਣਃ ਸੁਕृਤਸ੍ਯਾਹੁਃ ਸਾਤ੍ਤ੍ਵਿਕਂ ਨਿਰ੍ਮਲਂ ਫਲਮ੍।ਰਜਸਸ੍ਤੁ ਫਲਂ ਦੁਃਖਮਜ੍ਞਾਨਂ ਤਮਸਃ ਫਲਮ੍॥

karmaṇaḥ sukṛitasyāhuḥ sāttvikaṁ nirmalaṁ phalam rajasas tu phalaṁ duḥkham ajñānaṁ tamasaḥ phalam

अर्थशुभ कर्म का फल सात्विक और निर्मल कहा गया है; रजोगुण का फल दु;ख और तमोगुण का फल अज्ञान है।।

ਸਤ੍ਤ੍ਵਾਤ੍ਸਞ੍ਜਾਯਤੇ ਜ੍ਞਾਨਂ ਰਜਸੋ ਲੋਭ ਏਵ ਚ।ਪ੍ਰਮਾਦਮੋਹੌ ਤਮਸੋ ਭਵਤੋऽਜ੍ਞਾਨਮੇਵ ਚ॥

sattvāt sañjāyate jñānaṁ rajaso lobha eva cha pramāda-mohau tamaso bhavato ’jñānam eva cha

अर्थसत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है। रजोगुण से लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होता है।।

ਊਰ੍ਧ੍ਵਂ ਗਚ੍ਛਨ੍ਤਿ ਸਤ੍ਤ੍ਵਸ੍ਥਾ ਮਧ੍ਯੇ ਤਿष੍ਠਨ੍ਤਿ ਰਾਜਸਾਃ।ਜਘਨ੍ਯਗੁਣਵृਤ੍ਤਿਸ੍ਥਾ ਅਧੋ ਗਚ੍ਛਨ੍ਤਿ ਤਾਮਸਾਃ॥

ūrdhvaṁ gachchhanti sattva-sthā madhye tiṣhṭhanti rājasāḥ jaghanya-guṇa-vṛitti-sthā adho gachchhanti tāmasāḥ

अर्थसत्त्वगुण में स्थित पुरुष उच्च (लोकों को) जाते हैं; राजस पुरुष मध्य (मनुष्य लोक) में रहते हैं और तमोगुण की अत्यन्त हीन प्रवृत्तियों में स्थित तामस लोग अधोगति को प्राप्त होते हैं।।

ਨਾਨ੍ਯਂ ਗੁਣੇਭ੍ਯਃ ਕਰ੍ਤਾਰਂ ਯਦਾ ਦ੍ਰष੍ਟਾਨੁਪਸ਼੍ਯਤਿ।ਗੁਣੇਭ੍ਯਸ਼੍ਚ ਪਰਂ ਵੇਤ੍ਤਿ ਮਦ੍ਭਾਵਂ ਸੋऽਧਿਗਚ੍ਛਤਿ॥

nānyaṁ guṇebhyaḥ kartāraṁ yadā draṣhṭānupaśhyati guṇebhyaśh cha paraṁ vetti mad-bhāvaṁ so ’dhigachchhati

अर्थजब द्रष्टा (साधक) पुरुष तीनों गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता, अर्थात् नहीं समझता है और तीनों गुणों से परे मेरे तत्व को जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।

ਗੁਣਾਨੇਤਾਨਤੀਤ੍ਯ ਤ੍ਰੀਨ੍ਦੇਹੀ ਦੇਹਸਮੁਦ੍ਭਵਾਨ੍।ਜਨ੍ਮਮृਤ੍ਯੁਜਰਾਦੁਃਖੈਰ੍ਵਿਮੁਕ੍ਤੋऽਮृਤਮਸ਼੍ਨੁਤੇ॥

guṇān etān atītya trīn dehī deha-samudbhavān janma-mṛityu-jarā-duḥkhair vimukto ’mṛitam aśhnute

अर्थयह देही पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप तीनों गुणों से अतीत होकर जन्म, मृत्यु, जरा और दु:खों से विमुक्त हुआ अमृतत्व को प्राप्त होता है।।

ਅਰ੍ਜੁਨ ਉਵਾਚਕੈਰ੍ਲਿਂਗੈਸ੍ਤ੍ਰੀਨ੍ਗੁਣਾਨੇਤਾਨਤੀਤੋ ਭਵਤਿ ਪ੍ਰਭੋ।ਕਿਮਾਚਾਰਃ ਕਥਂ ਚੈਤਾਂਸ੍ਤ੍ਰੀਨ੍ਗੁਣਾਨਤਿਵਰ੍ਤਤੇ॥

arjuna uvācha kair liṅgais trīn guṇān etān atīto bhavati prabho kim āchāraḥ kathaṁ chaitāns trīn guṇān ativartate

अर्थअर्जुन ने कहा -- हे प्रभो ! इन तीनो गुणों से अतीत हुआ पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है ? वह किस प्रकार के आचरण वाला होता है ? और, वह किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है।।

ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚਪ੍ਰਕਾਸ਼ਂ ਪ੍ਰਵृਤ੍ਤਿਂ ਮੋਹਮੇਵ ਪਾਣ੍ਡਵ।ਨ ਦ੍ਵੇष੍ਟਿ ਸਮ੍ਪ੍ਰਵृਤ੍ਤਾਨਿ ਨਿਵृਤ੍ਤਾਨਿ ਕਾਙ੍ਕ੍षਤਿ॥

śhrī-bhagavān uvācha prakāśhaṁ cha pravṛittiṁ cha moham eva cha pāṇḍava na dveṣhṭi sampravṛittāni na nivṛittāni kāṅkṣhati

अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- हे पाण्डव ! (ज्ञानी पुरुष) प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह के प्रवृत्त होने पर भी उनका द्वेष नहीं करता तथा निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा नहीं करता है।।

ਉਦਾਸੀਨਵਦਾਸੀਨੋ ਗੁਣੈਰ੍ਯੋ ਵਿਚਾਲ੍ਯਤੇ।ਗੁਣਾ ਵਰ੍ਤਨ੍ਤ ਇਤ੍ਯੇਵ ਯੋऽਵਤਿष੍ਠਤਿ ਨੇਙ੍ਗਤੇ॥

udāsīna-vad āsīno guṇair yo na vichālyate guṇā vartanta ity evaṁ yo ’vatiṣhṭhati neṅgate

अर्थजो उदासीन के समान आसीन होकर गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और "गुण ही व्यवहार करते हैं" ऐसा जानकर स्थित रहता है और उस स्थिति से विचलित नहीं होता।।

ਸਮਦੁਃਖਸੁਖਃ ਸ੍ਵਸ੍ਥਃ ਸਮਲੋष੍ਟਾਸ਼੍ਮਕਾਞ੍ਚਨਃ।ਤੁਲ੍ਯਪ੍ਰਿਯਾਪ੍ਰਿਯੋ ਧੀਰਸ੍ਤੁਲ੍ਯਨਿਨ੍ਦਾਤ੍ਮਸਂਸ੍ਤੁਤਿਃ॥

sama-duḥkha-sukhaḥ sva-sthaḥ sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥ tulya-priyāpriyo dhīras tulya-nindātma-sanstutiḥ

अर्थजो स्वस्थ (स्वरूप में स्थित), सुख-दु:ख में समान रहता है तथा मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समदृष्टि रखता है; ऐसा वीर पुरुष प्रिय और अप्रिय को तथा निन्दा और आत्मस्तुति को तुल्य समझता है।।

ਮਾਨਾਪਮਾਨਯੋਸ੍ਤੁਲ੍ਯਸ੍ਤੁਲ੍ਯੋ ਮਿਤ੍ਰਾਰਿਪਕ੍षਯੋਃ।ਸਰ੍ਵਾਰਮ੍ਭਪਰਿਤ੍ਯਾਗੀ ਗੁਣਾਤੀਤਃ ਉਚ੍ਯਤੇ॥

mānāpamānayos tulyas tulyo mitrāri-pakṣhayoḥ sarvārambha-parityāgī guṇātītaḥ sa uchyate

अर्थजो मान और अपमान में सम है; शत्रु और मित्र के पक्ष में भी सम है, ऐसा सर्वारम्भ परित्यागी पुरुष गुणातीत कहा जाता है।।

ਮਾਂ ਯੋऽਵ੍ਯਭਿਚਾਰੇਣ ਭਕ੍ਿਤਯੋਗੇਨ ਸੇਵਤੇ।ਸ ਗੁਣਾਨ੍ਸਮਤੀਤ੍ਯੈਤਾਨ੍ ਬ੍ਰਹ੍ਮਭੂਯਾਯ ਕਲ੍ਪਤੇ॥

māṁ cha yo ’vyabhichāreṇa bhakti-yogena sevate sa guṇān samatītyaitān brahma-bhūyāya kalpate

अर्थजो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों के अतीत होकर ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है।।

ਬ੍ਰਹ੍ਮਣੋ ਹਿ ਪ੍ਰਤਿष੍ਠਾऽਹਮਮृਤਸ੍ਯਾਵ੍ਯਯਸ੍ਯ ਚ।ਸ਼ਾਸ਼੍ਵਤਸ੍ਯ ਧਰ੍ਮਸ੍ਯ ਸੁਖਸ੍ਯੈਕਾਨ੍ਤਿਕਸ੍ਯ ਚ॥

brahmaṇo hi pratiṣhṭhāham amṛitasyāvyayasya cha śhāśhvatasya cha dharmasya sukhasyaikāntikasya cha

अर्थक्योंकि मैं अमृत, अव्यय, ब्रह्म, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक अर्थात् पारमार्थिक सुख की प्रतिष्ठा हूँ।।