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भगवद् गीता 14.19

अध्याय 14, श्लोक 19

अध्याय 14: Guṇa Traya Vibhāg Yogगुणत्रयविभागयोग

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥

लिप्यंतरण

nānyaṁ guṇebhyaḥ kartāraṁ yadā draṣhṭānupaśhyati guṇebhyaśh cha paraṁ vetti mad-bhāvaṁ so ’dhigachchhati

अर्थ

जब द्रष्टा (साधक) पुरुष तीनों गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता, अर्थात् नहीं समझता है और तीनों गुणों से परे मेरे तत्व को जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।

शब्दार्थ
nanoanyamotherguṇebhyaḥof the guṇaskartāramagents of actionyadāwhendraṣhṭāthe seeranupaśhyatiseeguṇebhyaḥto the modes of naturechaandparamtranscendentalvettiknowmat-bhāvammy divine naturesaḥtheyadhigachchhatiattain
व्याख्या

अब तक किये गये वर्णन से तो आत्मा का ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण चित्र सामने उभरकर आता है कि मानों वह कभी इन गुणों के बन्धन से मुक्त ही नहीं हो सकता। गीता के अध्येता को इस स्थल पर निराशा का अनुभव हो सकता है। जब तक हम रेलगाड़ी में आसीन रहेंगे? तब तक रेल की गति हमारी गति होगी। परन्तु जैसे ही हम गन्तव्य स्थान पर उतर जाते हैं? तब हम स्थिर हो जाते हैं हैं? केवल रेल गतिमान रहती है। इसी प्रकार? देहादि उपाधियों को ही अपना स्वरूप समझकर उनसे तादात्म्य करने पर उनके विकारों को हम अपने ही विकार मानकर दुख? कष्ट और बन्धन का अनुभव करते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि आत्मा के अनुभव में आने वाला बन्धन अविद्याजनित (मिथ्या) है? वास्तविक नहीं। अत उपाधियों में स्थित अहंभाव को त्यागकर उसके साक्षीस्वरूप आत्मा में स्थिति प्राप्त करना ही तीनगुणों से मुक्ति है।निदिध्यासन की साधना में इस तादात्म्य की निवृत्ति और स्वस्वरूप में स्थिति प्राप्त करने का अभ्यास किया जाता है। जिस साधक में ध्यान की योग्यता है? वह आत्मा को देखेगा अर्थात् साक्षात् आत्मरूप से अनुभव करेगा। यह आत्मा समस्त दोषों से सर्वथा मुक्त है परन्तु यह देखना घटपटादि दृश्य वस्तु को देखने के समान नहीं है आत्मा इन्द्रिय? मन और बुद्धि का भी द्रष्टा है? उनका दृश्य नहीं। दर्शन से तात्पर्य ऐसे निश्चयात्मक ज्ञान से है? जिसको प्राप्त कर लेने के पश्चात् तत्त्व के विषय में संकल्पविकल्प करने का कोई अवसर ही नहीं रह जाता।गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता आत्मानुभवी पुरुष न केवल अपने अनन्तस्वरूप को पहचानता है? वरन् यह भी जानता है कि अब तक जिस अहंकार को कर्तृत्व का अभिमान था वह इन गुणों के अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है? अर्थात् अहंकार उन गुणों का ही कार्य है। ये गुण ही हमारे विचारों पर शासन करके उनकी दिशा को निर्धारित करते हैं। अत कर्तृत्वभोक्तृत्वादि अभिमान जिसमें स्थित है? वह सूक्ष्म शरीर यहाँ गुण शब्द से सूचित किया गया है।और गुणों से परे तत्त्व को जो जानता है मन स्वयं जड़ होने के कारण न कुछ कार्य कर सकता है और न स्वयं अपनी वृत्तियों को देख सकता है। अत जो चेतन तत्त्व उसे चेतनता प्रदान कर कार्यक्षम बनाता है? वह उस मन से भिन्न ही होगा। यदि किसी पात्र में रखा जल पिघले हुये रजत के समान चमक रहा हो? तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसने वह प्रभा सूर्य से प्राप्त की होगी। जल में अपनी स्वयं की कोई चमक नहीं होती। अब यदि उस जल में स्थित सूर्य का प्रतिबिम्ब छिन्नभिन्न होता है? तो उसका कारण पात्र में स्थित जल का स्वभाव होगा? न कि स्वयं सूर्य ही आकाश में नृत्य कर रहा होगा मन की उपाधि में व्यक्त हुआ चैतन्य ही व्यष्टि जीव कहलाता है? जिसे उपाधि के परिच्छेदों का कष्ट अनुभव होता है।जो पुरुष जीवभाव को त्यागकर उसके बिम्बभूत सच्चिदानन्द आत्मा को अपने स्वरूप से पहचान लेता है? वही पुरुष सभी परिच्छेदों के बन्धनों? दुख के अश्रुओं और निराशाओं के निश्वासों से सदा के लिये मुक्त हो जाता है।वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है उपनिषद् की घोषणा के अनुसार आत्मवित् पुरुष स्वयं ही आत्मा बन जाता है। मेरे स्वरूप से तात्पर्य आत्मस्वरूप से ही है। भगवान् श्रीकृष्ण को देवकीपुत्र या वृन्दावन के मुरली मनोहर कृष्ण ही नहीं समझना चाहिये। यहाँ श्रीकृष्ण भूतमात्र की आत्मा के रूप में उपदेश दे रहे हैं और गीता के प्रत्येक अध्येता को यह समझना चाहिये कि उसकी आत्मा ही जीव को उपदेश दे रही है।जाग्रतपुरुष स्वप्न में ऐसी स्थिति को उत्पन्न करता है कि वहाँ स्वप्नद्रष्टा के रूप में वह वस्तुओं को प्राप्त कर या खोकर सुखी और दुखी होता है। ये समस्त सुखदुख स्वयं में ही निहित स्वप्नद्रष्टा को होते हैं। जब वह स्वप्न से जागता है? तो स्वप्न जगत् और उसके बन्धन समाप्त हो जाते हैं और स्वयं स्वप्नद्रष्टा ही जाग्रतपुरुष बन जाता है। कल्पना कीजिये कि स्वप्नवस्था में उस दुखी स्वप्न द्रष्टा को उसकी जाग्रत अवस्था की चेतना आकर उपदेश देती है? तो वह यही श्लोक कहेगी कि जब स्वप्नद्रष्टा तुम स्वप्न देखने वाले मन के अतिरिक्त किसी कर्ता को नहीं देखोगे? और अपने में ही उस तत्त्व को जानोगे? जो इस मन से परे हैं तब तुम मेरे इस स्वरूप को अर्थात् जाग्रत की चेतना को प्राप्त होगे।इसी प्रकार? यहाँ चैतन्य की दृष्टि से उपदेश देते हैं कि जो मनुष्य अपने जाग्रतस्वप्नसुषुप्ति के व्यक्तित्व को त्यागकर उससे परे स्थित आत्मस्वरूप को पहचानता है? वही वास्तव में परम सत्य का जाग्रत पुरुष कहा जा सकता है। वह स्वयं आत्मस्वरूप (मद्भाव) बन जाता है।इस ज्ञान के फल को और अधिक स्पष्ट करते हुये भगवान् कहते है

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद् गीता 14.19 का अर्थ क्या है?
जब द्रष्टा (साधक) पुरुष तीनों गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता, अर्थात् नहीं समझता है और तीनों गुणों से परे मेरे तत्व को जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।
यह श्लोक भगवद् गीता के किस अध्याय का है?
यह श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 14 (Guṇa Traya Vibhāg Yog — Yoga through Understanding the Three Modes of Material Nature) का 19वाँ श्लोक है।