अध्याय 4, श्लोक 37
अध्याय 4: Śakrādi Stuti — शक्रादिस्तुतिरक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी । तच्छृणुष्व मयाख्यातं यथावत्कथयामि ते ॥
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लिप्यंतरण
rakṣaṇāya ca lokānāṃ devānāmupakāriṇī tacchṛṇuṣva mayākhyātaṃ yathāvatkathayāmi te
अर्थ
और लोकों की रक्षा के लिए — वे देवताओं की उपकारिणी। मेरे द्वारा कही जाती वह कथा सुनो; मैं तुम्हें यथावत् सुनाता हूँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती 4.37 का अर्थ क्या है?▼
और लोकों की रक्षा के लिए — वे देवताओं की उपकारिणी। मेरे द्वारा कही जाती वह कथा सुनो; मैं तुम्हें यथावत् सुनाता हूँ।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय का है?▼
यह श्री दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) के अध्याय 4 (Śakrādi Stuti — शक्रादि स्तुति) का 37वाँ श्लोक है।