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ਭਗਵਦ੍ਗੀਤਾ · ਅਧ੍ਯਾਯ 7 / 18

ਜ੍ਞਾਨਵਿਜ੍ਞਾਨਯੋਗ

Bhagavad Gita Chapter 7 in Punjabi (Gurmukhi)

Jñāna Vijñāna Yog · ज्ञान और विज्ञान · 30 श्लोक

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अध्याय सारांश

भगवद गीता का सातवा अध्याय ज्ञानविज्ञानयोग है। इस अध्याय में कृष्ण बताते हैं कि वह सर्वोच्च सत्य हैं एवं हर चीज़ के मुख्य कारण हैं। वे इस भौतिक संसार में अपनी भ्रामक ऊर्जा - योगमाया के बारे में बताते हैं अथवा प्रकट करते हैं कि इस ऊर्जा पर काबू पाना साधारण मनुष्य के लिए कितना कठिन है परन्तु जो मनुष्य अपने मन को परमात्मा में लीन कर लेते हैं वे इस माया को जीत लेते हैं और उन्हे आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। वे उन चार प्रकार के लोगों का भी वर्णन करते हैं जो भक्ति में लीन होकर उनको आत्मसमर्पण करते हैं अथवा वे चार प्रकार जो नहीं करते। कृष्ण पुष्टि करते हैं कि वे ही परम सत्य हैं। जो लोग इस सत्य को समझ लेते हैं, वे आध्यात्मिक प्राप्ति के शिखर पर पहुंच जाते हैं और भगवान को प्राप्त कर लेते हैं।

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ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚ ਮਯ੍ਯਾਸਕ੍ਤਮਨਾਃ ਪਾਰ੍ਥ ਯੋਗਂ ਯੁਞ੍ਜਨ੍ਮਦਾਸ਼੍ਰਯਃ। ਅਸਂਸ਼ਯਂ ਸਮਗ੍ਰਂ ਮਾਂ ਯਥਾ ਜ੍ਞਾਸ੍ਯਸਿ ਤਚ੍ਛृਣੁ॥

śhrī bhagavān uvācha mayyāsakta-manāḥ pārtha yogaṁ yuñjan mad-āśhrayaḥ asanśhayaṁ samagraṁ māṁ yathā jñāsyasi tach chhṛiṇu

अर्थहे पार्थ ! मुझमें असक्त हुए मन वाले तथा मदाश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए जिस प्रकार तुम मुझे समग्ररूप से, बिना किसी संशय के, जानोगे वह सुनो।।

ਜ੍ਞਾਨਂ ਤੇऽਹਂ ਸਵਿਜ੍ਞਾਨਮਿਦਂ ਵਕ੍ष੍ਯਾਮ੍ਯਸ਼ੇषਤਃ। ਯਜ੍ਜ੍ਞਾਤ੍ਵਾ ਨੇਹ ਭੂਯੋऽਨ੍ਯਜ੍ਜ੍ਞਾਤਵ੍ਯਮਵਸ਼ਿष੍ਯਤੇ॥

jñānaṁ te ’haṁ sa-vijñānam idaṁ vakṣhyāmyaśheṣhataḥ yaj jñātvā neha bhūyo ’nyaj jñātavyam-avaśhiṣhyate

अर्थमैं तुम्हारे लिए विज्ञान सहित इस ज्ञान को अशेष रूप से कहूँगा जिसको जानकर यहाँ (जगत् में) फिर और कुछ जानने योग्य (ज्ञातव्य) शेष नहीं रह जाता है।।

ਮਨੁष੍ਯਾਣਾਂ ਸਹਸ੍ਰੇषੁ ਕਸ਼੍ਿਚਦ੍ਯਤਤਿ ਸਿਦ੍ਧਯੇ। ਯਤਤਾਮਪਿ ਸਿਦ੍ਧਾਨਾਂ ਕਸ਼੍ਿਚਨ੍ਮਾਂ ਵੇਤ੍ਤਿ ਤਤ੍ਤ੍ਵਤਃ॥

manuṣhyāṇāṁ sahasreṣhu kaśhchid yatati siddhaye yatatām api siddhānāṁ kaśhchin māṁ vetti tattvataḥ

अर्थसहस्रों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य पूर्णत्व की सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्नशील साधकों में भी कोई ही पुरुष मुझे तत्त्व से जानता है।।

ਭੂਮਿਰਾਪੋऽਨਲੋ ਵਾਯੁਃ ਖਂ ਮਨੋ ਬੁਦ੍ਧਿਰੇਵ ਚ। ਅਹਙ੍ਕਾਰ ਇਤੀਯਂ ਮੇ ਭਿਨ੍ਨਾ ਪ੍ਰਕृਤਿਰष੍ਟਧਾ॥

bhūmir-āpo ’nalo vāyuḥ khaṁ mano buddhir eva cha ahankāra itīyaṁ me bhinnā prakṛitir aṣhṭadhā

अर्थपृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार - यह आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।।

ਅਪਰੇਯਮਿਤਸ੍ਤ੍ਵਨ੍ਯਾਂ ਪ੍ਰਕृਤਿਂ ਵਿਦ੍ਧਿ ਮੇ ਪਰਾਮ੍। ਜੀਵਭੂਤਾਂ ਮਹਾਬਾਹੋ ਯਯੇਦਂ ਧਾਰ੍ਯਤੇ ਜਗਤ੍॥

apareyam itas tvanyāṁ prakṛitiṁ viddhi me parām jīva-bhūtāṁ mahā-bāho yayedaṁ dhāryate jagat

अर्थहे महाबाहो ! यह अपरा प्रकृति है। इससे भिन्न मेरी जीवरूपी पराप्रकृति को जानो, जिससे यह जगत् धारण किया जाता है।।

ਏਤਦ੍ਯੋਨੀਨਿ ਭੂਤਾਨਿ ਸਰ੍ਵਾਣੀਤ੍ਯੁਪਧਾਰਯ। ਅਹਂ ਕृਤ੍ਸ੍ਨਸ੍ਯ ਜਗਤਃ ਪ੍ਰਭਵਃ ਪ੍ਰਲਯਸ੍ਤਥਾ॥

etad-yonīni bhūtāni sarvāṇītyupadhāraya ahaṁ kṛitsnasya jagataḥ prabhavaḥ pralayas tathā

अर्थयह जानो कि समम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से उत्पत्ति वाले हैं। (अत:) मैं सम्पूर्ण जगत् का उत्पत्ति तथा प्रलय स्थान हूँ।।

ਮਤ੍ਤਃ ਪਰਤਰਂ ਨਾਨ੍ਯਤ੍ਕਿਞ੍ਚਿਦਸ੍ਤਿ ਧਨਞ੍ਜਯ। ਮਯਿ ਸਰ੍ਵਮਿਦਂ ਪ੍ਰੋਤਂ ਸੂਤ੍ਰੇ ਮਣਿਗਣਾ ਇਵ॥

mattaḥ parataraṁ nānyat kiñchid asti dhanañjaya mayi sarvam idaṁ protaṁ sūtre maṇi-gaṇā iva

अर्थहे धनंजय ! मुझसे श्रेष्ठ (परे) अन्य किचिन्मात्र वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मुझमें पिरोया हुआ है।।

ਰਸੋऽਹਮਪ੍ਸੁ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਪ੍ਰਭਾਸ੍ਮਿ ਸ਼ਸ਼ਿਸੂਰ੍ਯਯੋਃ। ਪ੍ਰਣਵਃ ਸਰ੍ਵਵੇਦੇषੁ ਸ਼ਬ੍ਦਃ ਖੇ ਪੌਰੁषਂ ਨृषੁ॥

raso ’ham apsu kaunteya prabhāsmi śhaśhi-sūryayoḥ praṇavaḥ sarva-vedeṣhu śhabdaḥ khe pauruṣhaṁ nṛiṣhu

अर्थहे कौन्तेय ! जल में मैं रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सब वेदों में प्रणव (ँ़कार) हूँ तथा आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ।।

ਪੁਣ੍ਯੋ ਗਨ੍ਧਃ ਪृਥਿਵ੍ਯਾਂ ਤੇਜਸ਼੍ਚਾਸ੍ਮਿ ਵਿਭਾਵਸੌ। ਜੀਵਨਂ ਸਰ੍ਵਭੂਤੇषੁ ਤਪਸ਼੍ਚਾਸ੍ਮਿ ਤਪਸ੍ਵਿषੁ॥

puṇyo gandhaḥ pṛithivyāṁ cha tejaśh chāsmi vibhāvasau jīvanaṁ sarva-bhūteṣhu tapaśh chāsmi tapasviṣhu

अर्थपृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ; सम्पूर्ण भूतों में जीवन हूँ और तपस्वियों में मैं तप हूँ।।

ਬੀਜਂ ਮਾਂ ਸਰ੍ਵਭੂਤਾਨਾਂ ਵਿਦ੍ਧਿ ਪਾਰ੍ਥ ਸਨਾਤਨਮ੍। ਬੁਦ੍ਧਿਰ੍ਬੁਦ੍ਧਿਮਤਾਮਸ੍ਮਿ ਤੇਜਸ੍ਤੇਜਸ੍ਵਿਨਾਮਹਮ੍॥

bījaṁ māṁ sarva-bhūtānāṁ viddhi pārtha sanātanam buddhir buddhimatām asmi tejas tejasvinām aham

अर्थहे पार्थ ! सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज (कारण) मुझे ही जानो; मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।।

ਬਲਂ ਬਲਵਤਾਂ ਚਾਹਂ ਕਾਮਰਾਗਵਿਵਰ੍ਜਿਤਮ੍। ਧਰ੍ਮਾਵਿਰੁਦ੍ਧੋ ਭੂਤੇषੁ ਕਾਮੋऽਸ੍ਮਿ ਭਰਤਰ੍षਭ॥

balaṁ balavatāṁ chāhaṁ kāma-rāga-vivarjitam dharmāviruddho bhūteṣhu kāmo ’smi bharatarṣhabha

अर्थहे भरत श्रेष्ठ ! मैं बलवानों का कामना तथा आसक्ति से रहित बल हूँ और सब भूतों में धर्म के अविरुद्ध अर्थात् अनुकूल काम हूँ।।

ਯੇ ਚੈਵ ਸਾਤ੍ਤ੍ਵਿਕਾ ਭਾਵਾ ਰਾਜਸਾਸ੍ਤਾਮਸਾਸ਼੍ਚ ਯੇ। ਮਤ੍ਤ ਏਵੇਤਿ ਤਾਨ੍ਵਿਦ੍ਧਿ ਨਤ੍ਵਹਂ ਤੇषੁ ਤੇ ਮਯਿ॥

ye chaiva sāttvikā bhāvā rājasās tāmasāśh cha ye matta eveti tān viddhi na tvahaṁ teṣhu te mayi

अर्थजो भी सात्त्विक (शुद्ध), राजसिक (क्रियाशील) और तामसिक (जड़) भाव हैं, उन सबको तुम मेरे से उत्पन्न हुए जानो; तथापि मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं।।

ਤ੍ਰਿਭਿਰ੍ਗੁਣਮਯੈਰ੍ਭਾਵੈਰੇਭਿਃ ਸਰ੍ਵਮਿਦਂ ਜਗਤ੍। ਮੋਹਿਤਂ ਨਾਭਿਜਾਨਾਤਿ ਮਾਮੇਭ੍ਯਃ ਪਰਮਵ੍ਯਯਮ੍॥

tribhir guṇa-mayair bhāvair ebhiḥ sarvam idaṁ jagat mohitaṁ nābhijānāti māmebhyaḥ param avyayam

अर्थत्रिगुणों से उत्पन्न इन भावों (विकारों) से सम्पूर्ण जगत् (लोग) मोहित हुआ इन (गुणों) से परे अव्यय स्वरूप मुझे नहीं जानता है।।

ਦੈਵੀ ਹ੍ਯੇषਾ ਗੁਣਮਯੀ ਮਮ ਮਾਯਾ ਦੁਰਤ੍ਯਯਾ। ਮਾਮੇਵ ਯੇ ਪ੍ਰਪਦ੍ਯਨ੍ਤੇ ਮਾਯਾਮੇਤਾਂ ਤਰਨ੍ਤਿ ਤੇ॥

daivī hyeṣhā guṇa-mayī mama māyā duratyayā mām eva ye prapadyante māyām etāṁ taranti te

अर्थयह दैवी त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है। परन्तु जो मेरी शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।।

ਮਾਂ ਦੁष੍ਕृਤਿਨੋ ਮੂਢਾਃ ਪ੍ਰਪਦ੍ਯਨ੍ਤੇ ਨਰਾਧਮਾਃ। ਮਾਯਯਾਪਹृਤਜ੍ਞਾਨਾ ਆਸੁਰਂ ਭਾਵਮਾਸ਼੍ਰਿਤਾਃ॥

na māṁ duṣhkṛitino mūḍhāḥ prapadyante narādhamāḥ māyayāpahṛita-jñānā āsuraṁ bhāvam āśhritāḥ

अर्थदुष्कृत्य करने वाले, मूढ, नराधम पुरुष मुझे नहीं भजते हैं; माया के द्वारा जिनका ज्ञान हर लिया गया है, वे आसुरी भाव को धारण किये रहते हैं।।

ਚਤੁਰ੍ਵਿਧਾ ਭਜਨ੍ਤੇ ਮਾਂ ਜਨਾਃ ਸੁਕृਤਿਨੋऽਰ੍ਜੁਨ। ਆਰ੍ਤੋ ਜਿਜ੍ਞਾਸੁਰਰ੍ਥਾਰ੍ਥੀ ਜ੍ਞਾਨੀ ਭਰਤਰ੍षਭ॥

chatur-vidhā bhajante māṁ janāḥ sukṛitino ’rjuna ārto jijñāsur arthārthī jñānī cha bharatarṣhabha

अर्थहे भरत श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्म करने वाले (सुकृतिन:) आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी ऐसे चार प्रकार के लोग मुझे भजते हैं।।

ਤੇषਾਂ ਜ੍ਞਾਨੀ ਨਿਤ੍ਯਯੁਕ੍ਤ ਏਕਭਕ੍ਿਤਰ੍ਵਿਸ਼ਿष੍ਯਤੇ। ਪ੍ਰਿਯੋ ਹਿ ਜ੍ਞਾਨਿਨੋऽਤ੍ਯਰ੍ਥਮਹਂ ਮਮ ਪ੍ਰਿਯਃ॥

teṣhāṁ jñānī nitya-yukta eka-bhaktir viśhiṣhyate priyo hi jñānino ’tyartham ahaṁ sa cha mama priyaḥ

अर्थउनमें भी मुझ से नित्ययुक्त, अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी श्रेष्ठ है, क्योंकि ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।।

ਉਦਾਰਾਃ ਸਰ੍ਵ ਏਵੈਤੇ ਜ੍ਞਾਨੀ ਤ੍ਵਾਤ੍ਮੈਵ ਮੇ ਮਤਮ੍। ਆਸ੍ਥਿਤਃ ਹਿ ਯੁਕ੍ਤਾਤ੍ਮਾ ਮਾਮੇਵਾਨੁਤ੍ਤਮਾਂ ਗਤਿਮ੍॥

udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me matam āsthitaḥ sa hi yuktātmā mām evānuttamāṁ gatim

अर्थ(यद्यपि) ये सब उत्कृष्ट हैं, परन्तु ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है, क्योंकि वह स्थिर बुद्धि ज्ञानी अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें अच्छी प्रकार स्थित है।।

ਬਹੂਨਾਂ ਜਨ੍ਮਨਾਮਨ੍ਤੇ ਜ੍ਞਾਨਵਾਨ੍ਮਾਂ ਪ੍ਰਪਦ੍ਯਤੇ। ਵਾਸੁਦੇਵਃ ਸਰ੍ਵਮਿਤਿ ਮਹਾਤ੍ਮਾ ਸੁਦੁਰ੍ਲਭਃ॥

bahūnāṁ janmanām ante jñānavān māṁ prapadyate vāsudevaḥ sarvam iti sa mahātmā su-durlabhaḥ

अर्थबहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है।।

ਕਾਮੈਸ੍ਤੈਸ੍ਤੈਰ੍ਹृਤਜ੍ਞਾਨਾਃ ਪ੍ਰਪਦ੍ਯਨ੍ਤੇऽਨ੍ਯਦੇਵਤਾਃ। ਤਂ ਤਂ ਨਿਯਮਮਾਸ੍ਥਾਯ ਪ੍ਰਕृਤ੍ਯਾ ਨਿਯਤਾਃ ਸ੍ਵਯਾ॥

kāmais tais tair hṛita-jñānāḥ prapadyante ’nya-devatāḥ taṁ taṁ niyamam āsthāya prakṛityā niyatāḥ svayā

अर्थभोगविशेष की कामना से जिनका ज्ञान हर लिया गया है, ऐसे पुरुष अपने स्वभाव से प्रेरित हुए अन्य देवताओं को विशिष्ट नियम का पालन करते हुए भजते हैं।।

ਯੋ ਯੋ ਯਾਂ ਯਾਂ ਤਨੁਂ ਭਕ੍ਤਃ ਸ਼੍ਰਦ੍ਧਯਾਰ੍ਚਿਤੁਮਿਚ੍ਛਤਿ। ਤਸ੍ਯ ਤਸ੍ਯਾਚਲਾਂ ਸ਼੍ਰਦ੍ਧਾਂ ਤਾਮੇਵ ਵਿਦਧਾਮ੍ਯਹਮ੍॥

yo yo yāṁ yāṁ tanuṁ bhaktaḥ śhraddhayārchitum ichchhati tasya tasyāchalāṁ śhraddhāṁ tām eva vidadhāmyaham

अर्थजो-जो (सकामी) भक्त जिस-जिस (देवता के) रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस (भक्त) की मैं उस ही देवता के प्रति श्रद्धा को स्थिर करता हूँ।।

ਤਯਾ ਸ਼੍ਰਦ੍ਧਯਾ ਯੁਕ੍ਤਸ੍ਤਸ੍ਯਾਰਾਧਨਮੀਹਤੇ। ਲਭਤੇ ਤਤਃ ਕਾਮਾਨ੍ਮਯੈਵ ਵਿਹਿਤਾਨ੍ ਹਿ ਤਾਨ੍॥

sa tayā śhraddhayā yuktas tasyārādhanam īhate labhate cha tataḥ kāmān mayaiva vihitān hi tān

अर्थवह (भक्त) उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उससे मेरे द्वारा विधान किये हुये इच्छित भोगों को नि:सन्देह प्राप्त करता है।।

ਅਨ੍ਤਵਤ੍ਤੁ ਫਲਂ ਤੇषਾਂ ਤਦ੍ਭਵਤ੍ਯਲ੍ਪਮੇਧਸਾਮ੍। ਦੇਵਾਨ੍ਦੇਵਯਜੋ ਯਾਨ੍ਤਿ ਮਦ੍ਭਕ੍ਤਾ ਯਾਨ੍ਤਿ ਮਾਮਪਿ॥

antavat tu phalaṁ teṣhāṁ tad bhavatyalpa-medhasām devān deva-yajo yānti mad-bhaktā yānti mām api

अर्थपरन्तु उन अल्प बुद्धि पुरुषों का वह फल नाशवान् होता है। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।

ਅਵ੍ਯਕ੍ਤਂ ਵ੍ਯਕ੍ਿਤਮਾਪਨ੍ਨਂ ਮਨ੍ਯਨ੍ਤੇ ਮਾਮਬੁਦ੍ਧਯਃ। ਪਰਂ ਭਾਵਮਜਾਨਨ੍ਤੋ ਮਮਾਵ੍ਯਯਮਨੁਤ੍ਤਮਮ੍॥

avyaktaṁ vyaktim āpannaṁ manyante mām abuddhayaḥ paraṁ bhāvam ajānanto mamāvyayam anuttamam

अर्थबुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम (सर्वोत्तम) अव्यय परम भाव को न जानते हुए मुझ अव्यक्त को व्यक्त मानते हैं।।

ਨਾਹਂ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਃ ਸਰ੍ਵਸ੍ਯ ਯੋਗਮਾਯਾਸਮਾਵृਤਃ। ਮੂਢੋऽਯਂ ਨਾਭਿਜਾਨਾਤਿ ਲੋਕੋ ਮਾਮਜਮਵ੍ਯਯਮ੍॥

nāhaṁ prakāśhaḥ sarvasya yoga-māyā-samāvṛitaḥ mūḍho ’yaṁ nābhijānāti loko mām ajam avyayam

अर्थअपनी योगमाया से आवृत्त मैं सबको प्रत्यक्ष नहीं होता हूँ। यह मोहित लोक (मनुष्य) मुझ जन्मरहित, अविनाशी को नहीं जानता है।।

ਵੇਦਾਹਂ ਸਮਤੀਤਾਨਿ ਵਰ੍ਤਮਾਨਾਨਿ ਚਾਰ੍ਜੁਨ। ਭਵਿष੍ਯਾਣਿ ਭੂਤਾਨਿ ਮਾਂ ਤੁ ਵੇਦ ਕਸ਼੍ਚਨ॥

vedāhaṁ samatītāni vartamānāni chārjuna bhaviṣhyāṇi cha bhūtāni māṁ tu veda na kaśhchana

अर्थहे अर्जुन ! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा भविष्य में होने वाले भूतमात्र को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझे कोई भी पुरुष नहीं जानता हैं।।

ਇਚ੍ਛਾਦ੍ਵੇषਸਮੁਤ੍ਥੇਨ ਦ੍ਵਨ੍ਦ੍ਵਮੋਹੇਨ ਭਾਰਤ। ਸਰ੍ਵਭੂਤਾਨਿ ਸਂਮੋਹਂ ਸਰ੍ਗੇ ਯਾਨ੍ਤਿ ਪਰਨ੍ਤਪ॥

ichchhā-dveṣha-samutthena dvandva-mohena bhārata sarva-bhūtāni sammohaṁ sarge yānti parantapa

अर्थहे परन्तप भारत ! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वमोह से भूतमात्र उत्पत्ति काल में ही संमोह (अविवेक) को प्राप्त होते हैं।।

ਯੇषਾਂ ਤ੍ਵਨ੍ਤਗਤਂ ਪਾਪਂ ਜਨਾਨਾਂ ਪੁਣ੍ਯਕਰ੍ਮਣਾਮ੍। ਤੇ ਦ੍ਵਨ੍ਦ੍ਵਮੋਹਨਿਰ੍ਮੁਕ੍ਤਾ ਭਜਨ੍ਤੇ ਮਾਂ ਦृਢਵ੍ਰਤਾਃ॥

yeṣhāṁ tvanta-gataṁ pāpaṁ janānāṁ puṇya-karmaṇām te dvandva-moha-nirmuktā bhajante māṁ dṛiḍha-vratāḥ

अर्थपरन्तु जिन पुण्यकर्मी पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे द्वन्द्वमोह से निर्मुक्त और दृढ़वती पुरुष मुझे भजते हैं।।

ਜਰਾਮਰਣਮੋਕ੍षਾਯ ਮਾਮਾਸ਼੍ਰਿਤ੍ਯ ਯਤਨ੍ਤਿ ਯੇ। ਤੇ ਬ੍ਰਹ੍ਮ ਤਦ੍ਵਿਦੁਃ ਕृਤ੍ਸ੍ਨਮਧ੍ਯਾਤ੍ਮਂ ਕਰ੍ਮ ਚਾਖਿਲਮ੍॥

jarā-maraṇa-mokṣhāya mām āśhritya yatanti ye te brahma tadviduḥ kṛitsnam adhyātmaṁ karma chākhilam

अर्थजो मेरे शरणागत होकर जरा और मरण से मुक्ति पाने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं।।

ਸਾਧਿਭੂਤਾਧਿਦੈਵਂ ਮਾਂ ਸਾਧਿਯਜ੍ਞਂ ਯੇ ਵਿਦੁਃ। ਪ੍ਰਯਾਣਕਾਲੇऽਪਿ ਮਾਂ ਤੇ ਵਿਦੁਰ੍ਯੁਕ੍ਤਚੇਤਸਃ॥

sādhibhūtādhidaivaṁ māṁ sādhiyajñaṁ cha ye viduḥ prayāṇa-kāle ’pi cha māṁ te vidur yukta-chetasaḥ

अर्थजो पुरुष अधिभूत और अधिदैव तथा अधियज्ञ के सहित मुझे जानते हैं, वे युक्तचित्त वाले पुरुष अन्तकाल में भी मुझे जानते हैं।।