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सुंदरकांड

दोहा 31 / 60

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Chaupāī

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥ नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥ अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥ मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी॥ अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान कीन्ह पयाना॥ नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा॥ बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥ नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं पाव देह बिरहागी। सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥

calata mohi cūḍāmani dīnhī raghupati hṛdaya~ lāi soi līnhī nātha jugala locana bhari bārī bacana kahe kachu janakakumārī anuja sameta gahehu prabhu caranā dīna baṃdhu pranatārati haranā mana krama bacana carana anurāgī kehi aparādha nātha hauṃ tyāgī avaguna eka mora maiṃ mānā bichurata prāna na kīnha payānā nātha so nayananhi ko aparādhā nisarata prāna karihiṃ haṭhi bādhā biraha agini tanu tūla samīrā svāsa jarai chana māhiṃ sarīrā nayana stravahi jalu nija hita lāgī jaraiṃ na pāva deha birahāgī sītā ke ati bipati bisālā binahiṃ kaheṃ bhali dīnadayālā

Dohā

निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति। बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥31॥

nimiṣa nimiṣa karunānidhi jāhiṃ kalapa sama bīti begi caliya prabhu ānia bhuja bala khala dala jīti 31

अर्थ"चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि दी।" रघुपति ने उसे हृदय से लगाकर ले लिया। "हे नाथ! दोनों नेत्रों में जल भरकर जानकी जी ने कुछ वचन कहे — 'अनुज सहित प्रभु के चरण पकड़कर (कहना) — दीनबंधु, प्रणत की पीड़ा हरने वाले; मैं मन-वचन-कर्म से चरणों की अनुरागिनी हूँ — हे नाथ! किस अपराध से मुझे त्यागा? अपना एक अवगुण मैं मानती हूँ — कि बिछुड़ते ही प्राण नहीं निकल गए। पर हे नाथ! वह नेत्रों का अपराध है — वे प्राणों के निकलते हठपूर्वक बाधा डालते हैं। विरह की अग्नि में शरीर रूई है, श्वास वायु; क्षण भर में शरीर जल जाए — पर नेत्र अपने हित (फिर दर्शन) के लिए जल बहाते हैं, इसी से विरहाग्नि में जलता हुआ भी शरीर जल नहीं पाता।'" सीता की विपत्ति अत्यंत विशाल है — हे दीनदयाल! न कहना ही भला। हे करुणानिधि! उनका एक-एक निमिष कल्प-समान बीतता है; हे प्रभु! शीघ्र चलिए और भुजबल से खल-दल को जीतकर उन्हें ले आइए।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 31 का अर्थ क्या है?
"चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि दी।" रघुपति ने उसे हृदय से लगाकर ले लिया। "हे नाथ! दोनों नेत्रों में जल भरकर जानकी जी ने कुछ वचन कहे — 'अनुज सहित प्रभु के चरण पकड़कर (कहना) — दीनबंधु, प्रणत की पीड़ा हरने वाले; मैं मन-वचन-कर्म से चरणों की अनुरागिनी हूँ — हे नाथ! किस अपराध से मुझे त्यागा? अपना एक अवगुण मैं मानती हूँ — कि बिछुड़ते ही प्राण नहीं निकल गए। पर हे नाथ! वह नेत्रों का अपराध है — वे प्राणों के निकलते हठपूर्वक बाधा डालते हैं। विरह की अग्नि में शरीर रूई है, श्वास वायु; क्षण भर में शरीर जल जाए — पर नेत्र अपने हित (फिर दर्शन) के लिए जल बहाते हैं, इसी से विरहाग्नि में जलता हुआ भी शरीर जल नहीं पाता।'" सीता की विपत्ति अत्यंत विशाल है — हे दीनदयाल! न कहना ही भला। हे करुणानिधि! उनका एक-एक निमिष कल्प-समान बीतता है; हे प्रभु! शीघ्र चलिए और भुजबल से खल-दल को जीतकर उन्हें ले आइए।