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सुंदरकांड

दोहा 29 / 60

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Chaupāī

जौं होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥ एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥ आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥ पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥ नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥ सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ। राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥ फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥

jauṃ na hoti sītā sudhi pāī madhubana ke phala sakahiṃ ki khāī ehi bidhi mana bicāra kara rājā āi gae kapi sahita samājā āi sabanhi nāvā pada sīsā mileu sabanhi ati prema kapīsā pū~chī kusala kusala pada dekhī rāma kṛpā~ bhā kāju biseṣī nātha kāju kīnheu hanumānā rākhe sakala kapinha ke prānā suni sugrīva bahuri tehi mileū kapinha sahita raghupati pahiṃ caleū rāma kapinha jaba āvata dekhā kie~ kāju mana haraṣa biseṣā phaṭika silā baiṭhe dvau bhāī pare sakala kapi carananhi jāī

Dohā

प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज। पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥29॥

prīti sahita saba bheṭe raghupati karunā puṃja pū~chī kusala nātha aba kusala dekhi pada kaṃja 29

अर्थ"यदि सीता की सुधि न पाई होती, तो क्या वे मधुवन के फल खा सकते थे?" इस प्रकार राजा (सुग्रीव) मन में विचार कर ही रहे थे कि वानर समाज सहित आ गए। सबने आकर चरणों में सिर नवाया; कपीश सबसे अत्यंत प्रेम से मिले। उन्होंने कुशल पूछी; "आपके चरण देखकर कुशल है; राम की कृपा से कार्य विशेष रूप से सिद्ध हुआ।" "हे नाथ! हनुमान ने कार्य किया और सब वानरों के प्राण बचाए।" यह सुनकर सुग्रीव उनसे फिर मिले, और वानरों सहित रघुपति के पास चले। राम ने जब वानरों को कार्य किए हुए आते देखा, तब मन में विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिला पर बैठे थे; सब वानर जाकर चरणों में गिर पड़े। करुणापुंज रघुपति सबसे प्रेम सहित मिले और कुशल पूछी; "हे नाथ! अब आपके चरण-कमल देखकर कुशल है।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 29 का अर्थ क्या है?
"यदि सीता की सुधि न पाई होती, तो क्या वे मधुवन के फल खा सकते थे?" इस प्रकार राजा (सुग्रीव) मन में विचार कर ही रहे थे कि वानर समाज सहित आ गए। सबने आकर चरणों में सिर नवाया; कपीश सबसे अत्यंत प्रेम से मिले। उन्होंने कुशल पूछी; "आपके चरण देखकर कुशल है; राम की कृपा से कार्य विशेष रूप से सिद्ध हुआ।" "हे नाथ! हनुमान ने कार्य किया और सब वानरों के प्राण बचाए।" यह सुनकर सुग्रीव उनसे फिर मिले, और वानरों सहित रघुपति के पास चले। राम ने जब वानरों को कार्य किए हुए आते देखा, तब मन में विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिला पर बैठे थे; सब वानर जाकर चरणों में गिर पड़े। करुणापुंज रघुपति सबसे प्रेम सहित मिले और कुशल पूछी; "हे नाथ! अब आपके चरण-कमल देखकर कुशल है।"