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सुंदरकांड

दोहा 26 / 60

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Chaupāī

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥ जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥ तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा॥ हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई॥ साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥ जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥ ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा सो तेहि कारन गिरिजा॥ उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥

deha bisāla parama haruāī maṃdira teṃ maṃdira caḍha dhāī jarai nagara bhā loga bihālā jhapaṭa lapaṭa bahu koṭi karālā tāta mātu hā sunia pukārā ehi avasara ko hamahi ubārā hama jo kahā yaha kapi nahiṃ hoī bānara rūpa dhareṃ sura koī sādhu avagyā kara phalu aisā jarai nagara anātha kara jaisā jārā nagaru nimiṣa eka māhīṃ eka bibhīṣana kara gṛha nāhīṃ tā kara dūta anala jehiṃ sirijā jarā na so tehi kārana girijā ulaṭi palaṭi laṃkā saba jārī kūdi parā puni siṃdhu majhārī

Dohā

पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि। जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥26॥

pū~cha bujhāi khoi śrama dhari laghu rūpa bahori janakasutā ke āgeṃ ṭhāḍha bhayau kara jori 26

अर्थदेह विशाल फिर भी अत्यंत हल्की, वे महल से महल पर दौड़कर चढ़ने लगे; नगर जलने लगा, लोग बेहाल हुए, करोड़ों विकराल लपटें झपटने लगीं। "हे तात! हे मात!" — ऐसी पुकार सुनाई दी — "इस अवसर पर हमें कौन उबारे? हमने कहा था यह वानर नहीं; कोई देवता वानर रूप धरे है। साधु के अपमान का ऐसा ही फल है — नगर अनाथ-सा जल रहा है।" उन्होंने एक निमिष में नगर जला दिया; केवल विभीषण का घर (बचा)। जिनके दूत ने अग्नि सिरजी — हे गिरिजा! उसी कारण वह (हनुमान) नहीं जले। उलट-पलटकर सारी लंका जलाकर फिर वे समुद्र में कूद पड़े। पूँछ बुझाकर और थकान मिटाकर, फिर छोटा रूप धरकर, हाथ जोड़कर जानकी जी के आगे खड़े हो गए।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 26 का अर्थ क्या है?
देह विशाल फिर भी अत्यंत हल्की, वे महल से महल पर दौड़कर चढ़ने लगे; नगर जलने लगा, लोग बेहाल हुए, करोड़ों विकराल लपटें झपटने लगीं। "हे तात! हे मात!" — ऐसी पुकार सुनाई दी — "इस अवसर पर हमें कौन उबारे? हमने कहा था यह वानर नहीं; कोई देवता वानर रूप धरे है। साधु के अपमान का ऐसा ही फल है — नगर अनाथ-सा जल रहा है।" उन्होंने एक निमिष में नगर जला दिया; केवल विभीषण का घर (बचा)। जिनके दूत ने अग्नि सिरजी — हे गिरिजा! उसी कारण वह (हनुमान) नहीं जले। उलट-पलटकर सारी लंका जलाकर फिर वे समुद्र में कूद पड़े। पूँछ बुझाकर और थकान मिटाकर, फिर छोटा रूप धरकर, हाथ जोड़कर जानकी जी के आगे खड़े हो गए।