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सुंदरकांड

दोहा 24 / 60

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Chaupāī

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥ बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥ मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥ उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥ सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि हरहुँ मूढ़ कर प्राना॥ सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए। नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध मारिअ दूता॥ आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥ सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर॥

jadapi kahi kapi ati hita bānī bhagati bibeka birati naya sānī bolā bihasi mahā abhimānī milā hamahi kapi gura baḍa gyānī mṛtyu nikaṭa āī khala tohī lāgesi adhama sikhāvana mohī ulaṭā hoihi kaha hanumānā matibhrama tora pragaṭa maiṃ jānā suni kapi bacana bahuta khisiānā begi na harahu~ mūḍha kara prānā sunata nisācara mārana dhāe sacivanha sahita bibhīṣanu āe nāi sīsa kari binaya bahūtā nīti birodha na māria dūtā āna daṃḍa kachu karia gosā~ī sabahīṃ kahā maṃtra bhala bhāī sunata bihasi bolā dasakaṃdhara aṃga bhaṃga kari paṭhaia baṃdara

Dohā

कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ। तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥24॥

kapi keṃ mamatā pū~cha para sabahi kahau~ samujhāi tela bori paṭa bā~dhi puni pāvaka dehu lagāi 24

अर्थयद्यपि कपि ने भक्ति, विवेक, वैराग्य और नीति से सनी अत्यंत हितकारी वाणी कही, फिर भी महा-अभिमानी (रावण) हँसकर बोला — "हमें बड़ा ज्ञानी गुरु कपि मिला! रे खल! तेरी मृत्यु निकट आ गई है, जो तू मुझे सीख देने लगा, रे अधम।" "उलटा होगा," हनुमान जी बोले, "तेरी मतिभ्रम मैं प्रकट जानता हूँ।" कपि के वचन सुनकर (रावण) बहुत खिसियाया — "इस मूढ़ के प्राण शीघ्र क्यों न हर लूँ?" जब निशाचर मारने दौड़े, तब विभीषण मंत्रियों सहित आए और सिर नवाकर बहुत विनय की — "दूत को मारना नीति-विरुद्ध है। हे स्वामी! कुछ और दंड कीजिए।" सबने कहा — "भला मंत्र है, भाई।" यह सुनकर दशकंधर हँसकर बोला — "वानर को अंग-भंग करके भेज दो। कपि की ममता पूँछ पर होती है — सबको समझाकर कहता हूँ: उसे तेल में डुबाए कपड़े से बाँधकर फिर आग लगा दो।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 24 का अर्थ क्या है?
यद्यपि कपि ने भक्ति, विवेक, वैराग्य और नीति से सनी अत्यंत हितकारी वाणी कही, फिर भी महा-अभिमानी (रावण) हँसकर बोला — "हमें बड़ा ज्ञानी गुरु कपि मिला! रे खल! तेरी मृत्यु निकट आ गई है, जो तू मुझे सीख देने लगा, रे अधम।" "उलटा होगा," हनुमान जी बोले, "तेरी मतिभ्रम मैं प्रकट जानता हूँ।" कपि के वचन सुनकर (रावण) बहुत खिसियाया — "इस मूढ़ के प्राण शीघ्र क्यों न हर लूँ?" जब निशाचर मारने दौड़े, तब विभीषण मंत्रियों सहित आए और सिर नवाकर बहुत विनय की — "दूत को मारना नीति-विरुद्ध है। हे स्वामी! कुछ और दंड कीजिए।" सबने कहा — "भला मंत्र है, भाई।" यह सुनकर दशकंधर हँसकर बोला — "वानर को अंग-भंग करके भेज दो। कपि की ममता पूँछ पर होती है — सबको समझाकर कहता हूँ: उसे तेल में डुबाए कपड़े से बाँधकर फिर आग लगा दो।"