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सुंदरकांड

दोहा 17 / 60

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Chaupāī

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥ आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥ अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥ करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥ बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥ अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥ सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥ सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥ तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥

mana saṃtoṣa sunata kapi bānī bhagati pratāpa teja bala sānī āsiṣa dīnhi rāmapriya jānā hohu tāta bala sīla nidhānā ajara amara gunanidhi suta hohū karahu~ bahuta raghunāyaka chohū karahu~ kṛpā prabhu asa suni kānā nirbhara prema magana hanumānā bāra bāra nāesi pada sīsā bolā bacana jori kara kīsā aba kṛtakṛtya bhayau~ maiṃ mātā āsiṣa tava amogha bikhyātā sunahu mātu mohi atisaya bhūkhā lāgi dekhi suṃdara phala rūkhā sunu suta karahiṃ bipina rakhavārī parama subhaṭa rajanīcara bhārī tinha kara bhaya mātā mohi nāhīṃ jauṃ tumha sukha mānahu mana māhīṃ

Dohā

देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु। रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥17॥

dekhi buddhi bala nipuna kapi kaheu jānakīṃ jāhu raghupati carana hṛdaya~ dhari tāta madhura phala khāhu 17

अर्थभक्ति, प्रताप और तेज से सनी कपि की वाणी सुनकर उनका मन संतुष्ट हुआ। उन्हें राम-प्रिय जानकर उन्होंने आशीर्वाद दिया — "हे पुत्र! बल और शील के निधान बनो; अजर, अमर, गुणों के निधि बनो, हे पुत्र; रघुनाथ तुम पर बहुत कृपा करें।" "प्रभु कृपा करें" यह कानों से सुनकर हनुमान जी निर्भर प्रेम में मग्न हो गए। बार-बार चरणों में सिर नवाकर, हाथ जोड़कर बोले — "हे माता! अब मैं कृतकृत्य हो गया; आपका आशीर्वाद अमोघ विख्यात है। हे माता! सुनिए, मुझे बहुत भूख लगी है, ये सुंदर फलवाले वृक्ष देखकर।" "हे पुत्र! वन की रखवाली बड़े बलवान् राक्षस करते हैं।" "हे माता! यदि आप मन में सुख मानें, तो मुझे उनका भय नहीं।" कपि को बुद्धि-बल में निपुण देखकर जानकी जी ने कहा — "जाओ; हे पुत्र! रघुपति के चरण हृदय में धरकर मधुर फल खाओ।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड दोहा 17 का अर्थ क्या है?
भक्ति, प्रताप और तेज से सनी कपि की वाणी सुनकर उनका मन संतुष्ट हुआ। उन्हें राम-प्रिय जानकर उन्होंने आशीर्वाद दिया — "हे पुत्र! बल और शील के निधान बनो; अजर, अमर, गुणों के निधि बनो, हे पुत्र; रघुनाथ तुम पर बहुत कृपा करें।" "प्रभु कृपा करें" यह कानों से सुनकर हनुमान जी निर्भर प्रेम में मग्न हो गए। बार-बार चरणों में सिर नवाकर, हाथ जोड़कर बोले — "हे माता! अब मैं कृतकृत्य हो गया; आपका आशीर्वाद अमोघ विख्यात है। हे माता! सुनिए, मुझे बहुत भूख लगी है, ये सुंदर फलवाले वृक्ष देखकर।" "हे पुत्र! वन की रखवाली बड़े बलवान् राक्षस करते हैं।" "हे माता! यदि आप मन में सुख मानें, तो मुझे उनका भय नहीं।" कपि को बुद्धि-बल में निपुण देखकर जानकी जी ने कहा — "जाओ; हे पुत्र! रघुपति के चरण हृदय में धरकर मधुर फल खाओ।"