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शुक्र स्तोत्र PDF

शुक्र स्तोत्र की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

ॐ अश्वध्वजाय विद्महे धनुर्हस्ताय धीमहि । तन्नो शुक्रः प्रचोदयात् ॥

Om Ashvadhvajaya Vidmahe Dhanurhastaya Dhimahi Tanno Shukrah Prachodayat

ॐ। हम अश्वध्वज (शुक्र) को जानें, धनुर्धारी का ध्यान करें; वे शुक्र (शुक्राचार्य/शुक्र ग्रह) हमें प्रेरित करें। (शुक्र गायत्री)

ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः ॥

Om Dram Dreem Draum Sah Shukraya Namah

ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः — शुक्र को नमस्कार। (शुक्र बीज मन्त्र)

नमस्ते भार्गव श्रेष्ठ देव दानवपूजित । वृष्टिरोधप्रकर्तासि वृष्टिकर्ता त्वमेव हि ॥

Namaste Bhargava Shreshtha Deva Danava-pujita Vrishti-rodha-prakartasi Vrishti-karta Tvameva Hi

हे भार्गवश्रेष्ठ! देव और दानव दोनों से पूजित आपको नमस्कार; वर्षा को रोकने वाले और वर्षा करने वाले भी आप ही हैं।

हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् । सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ॥

Hima-kunda-mrinalabham Daityanam Paramam Gurum Sarva-shastra-pravaktaram Bhargavam Pranamamyaham

हिम, कुन्द और मृणाल-सी कान्ति वाले, दैत्यों के परम गुरु, समस्त शास्त्रों के प्रवक्ता — उन भार्गव (शुक्राचार्य) को मैं प्रणाम करता हूँ।

शुक्रः शुक्राम्बरः शुभ्रः शुभदः शुभलक्षणः । शुभ्रांशुः शुभदृष्टिश्च शुभकृच्छुभवर्धनः ॥

Shukrah Shukrambarah Shubhrah Shubhadah Shubha-lakshanah Shubhramshuh Shubha-drishtish-cha Shubha-krich-chhubha-vardhanah

शुक्र, श्वेत वस्त्रधारी, शुभ्र, शुभदायक, शुभ लक्षणों वाले; उज्ज्वल किरणों और शुभ दृष्टि वाले, कल्याणकारी और शुभ की वृद्धि करने वाले।