शिव महिम्न स्तोत्र — Complete Lyrics
शिव महिम्न स्तोत्र
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।
अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥ १॥
mahimnaḥ pāraṃ te paramaviduṣo yadyasadṛśī
stutirbrahmādīnāmapi tadavasannāstvayi giraḥ |
athā’vācyaḥ sarvaḥ svamatipariṇāmāvadhi gṛṇan
mamāpyeṣa stotre hara nirapavādaḥ parikaraḥ || 1||
हे हर! यदि आपकी महिमा को पूर्ण रूप से न जानने वाले की स्तुति अनुचित है, तो ब्रह्मा आदि देवताओं की वाणी भी आपके विषय में असमर्थ होकर रह जाती है। और यदि सब अपनी-अपनी बुद्धि की सीमा तक ही आपका वर्णन करते हैं, तो इस स्तोत्र में मेरा यह प्रयास भी निर्दोष ही है।
Verse 2
अतीतः पंथानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥ २॥
atītaḥ paṃthānaṃ tava ca mahimā vāṅmanasayoḥ
atadvyāvṛttyā yaṃ cakitamabhidhatte śrutirapi |
sa kasya stotavyaḥ katividhaguṇaḥ kasya viṣayaḥ
pade tvarvācīne patati na manaḥ kasya na vacaḥ || 2||
आपकी महिमा वाणी और मन के मार्ग से परे है; श्रुति भी चकित होकर 'नेति-नेति' कहकर ही उसका संकेत करती है। उस महिमा की स्तुति कौन कर सकता है? वह कितने गुणों वाली है और किसका विषय है? फिर भी आपके इस प्रकट (सगुण) रूप में किसका मन और किसकी वाणी अनुरक्त नहीं होती?
Verse 3
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः
तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता ॥ ३॥
madhusphītā vācaḥ paramamamṛtaṃ nirmitavataḥ
tava brahman kiṃ vāgapi suragurorvismayapadam |
mama tvetāṃ vāṇīṃ guṇakathanapuṇyena bhavataḥ
punāmītyarthe’smin puramathana buddhirvyavasitā || 3||
हे ब्रह्मन्! मधु के समान मीठी और परम अमृतमयी वेदवाणी के रचयिता आपको क्या देवगुरु बृहस्पति की वाणी भी विस्मित कर सकती है? हे त्रिपुरनाशक! मेरी बुद्धि ने तो यही निश्चय किया है कि आपके गुण-कथन के पुण्य से मैं अपनी वाणी को पवित्र कर लूँ।
Verse 4
तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु तनुषु ।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥ ४॥
tavaiśvaryaṃ yattajjagadudayarakṣāpralayakṛt
trayīvastu vyastaṃ tisruṣu guṇabhinnāsu tanuṣu |
abhavyānāmasmin varada ramaṇīyāmaramaṇīṃ
vihantuṃ vyākrośīṃ vidadhata ihaike jaḍadhiyaḥ || 4||
आपका ऐश्वर्य ही जगत् की उत्पत्ति, रक्षा और प्रलय करता है; तीनों वेद इसका वर्णन करते हैं और यह तीन गुणों से भिन्न तीन मूर्तियों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में विभक्त है। फिर भी, हे वरद! कुछ जड़बुद्धि लोग इस पर ऐसे कुतर्क करते हैं जो अधर्मियों को रुचिकर लगें, पर वास्तव में विनाशकारी हैं।
Verse 5
किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसर दुःस्थो हतधियः
कुतर्कोऽयं कांश्चित् मुखरयति मोहाय जगतः ॥ ५॥
kimīhaḥ kiṃkāyaḥ sa khalu kimupāyastribhuvanaṃ
kimādhāro dhātā sṛjati kimupādāna iti ca |
atarkyaiśvarye tvayyanavasara duḥstho hatadhiyaḥ
kutarko’yaṃ kāṃścit mukharayati mohāya jagataḥ || 5||
उसकी क्या इच्छा है, क्या शरीर है, क्या उपाय और क्या आधार है, किस उपादान से वह त्रिभुवन रचता है — तर्क से परे ऐश्वर्य वाले आपके विषय में मूढ़ बुद्धिवालों के ये कुतर्क केवल जगत् को मोहित करने के लिए कुछ वाचालों के मुख से फूटते हैं।
Verse 6
अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ।
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥ ६॥
ajanmāno lokāḥ kimavayavavanto’pi jagatāṃ
adhiṣṭhātāraṃ kiṃ bhavavidhiranādṛtya bhavati |
anīśo vā kuryād bhuvanajanane kaḥ parikaro
yato mandāstvāṃ pratyamaravara saṃśerata ime || 6||
हे देवश्रेष्ठ! क्या अवयवों वाले होकर भी ये लोक अजन्मा हो सकते हैं? क्या जगत् की सृष्टि किसी अधिष्ठाता के बिना सम्भव है? आपके अतिरिक्त भला कौन भुवनों की रचना में समर्थ है? फिर भी मन्दबुद्धि लोग आपके विषय में संशय करते हैं।
Verse 7
त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ ७॥
trayī sāṅkhyaṃ yogaḥ paśupatimataṃ vaiṣṇavamiti
prabhinne prasthāne paramidamadaḥ pathyamiti ca |
rucīnāṃ vaicitryādṛjukuṭila nānāpathajuṣāṃ
nṛṇāmeko gamyastvamasi payasāmarṇava iva || 7||
त्रयी (वेद), सांख्य, योग, पाशुपत मत, वैष्णव मत — इन भिन्न-भिन्न मार्गों में लोग अपनी-अपनी रुचि के अनुसार किसी को श्रेष्ठ, किसी को उचित कहते हैं; कोई सीधा चलता है, कोई टेढ़े मार्ग से। परन्तु जैसे समस्त जल अन्ततः सागर में पहुँचते हैं, वैसे ही सब मनुष्यों के परम गन्तव्य एकमात्र आप ही हैं।
Verse 8
महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् ।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥ ८॥
mahokṣaḥ khaṭvāṅgaṃ paraśurajinaṃ bhasma phaṇinaḥ
kapālaṃ cetīyattava varada tantropakaraṇam |
surāstāṃ tāmṛddhiṃ dadhati tu bhavadbhūpraṇihitāṃ
na hi svātmārāmaṃ viṣayamṛgatṛṣṇā bhramayati || 8||
महान् वृषभ, खट्वांग, परशु, मृगचर्म, भस्म, सर्प और कपाल — हे वरद! बस यही आपकी गृहस्थी का साज-सामान है; फिर भी देवता आपकी भृकुटि के संकेत मात्र से सब ऋद्धियाँ पाते हैं। सच है, आत्मा में रमण करने वाले को विषयों की मृगतृष्णा नहीं भटका सकती।
Verse 9
ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याऽध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवन् जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ॥ ९॥
dhruvaṃ kaścit sarvaṃ sakalamaparastvadhruvamidaṃ
paro dhrauvyā’dhrauvye jagati gadati vyastaviṣaye |
samaste’pyetasmin puramathana tairvismita iva
stuvan jihremi tvāṃ na khalu nanu dhṛṣṭā mukharatā || 9||
कोई इस सबको नित्य कहता है, कोई अनित्य; कोई इस जगत् को नित्य-अनित्य दोनों मानता है। हे त्रिपुरमथन! इन परस्पर-विरोधी मतों से मानो विस्मित होकर भी मैं निःसंकोच आपकी स्तुति कर रहा हूँ — सचमुच मेरी यह वाचालता धृष्टता ही है!
Verse 10
तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिञ्चिर्हरिरधः
परिच्छेतुं यातावनिलमनलस्कन्धवपुषः ।
ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ॥ १०॥
tavaiśvaryaṃ yatnād yadupari viriñcirhariradhaḥ
paricchetuṃ yātāvanilamanalaskandhavapuṣaḥ |
tato bhaktiśraddhābharagurugṛṇadbhyāṃ giriśa yat
svayaṃ tasthe tābhyāṃ tava kimanuvṛttirna phalati || 10||
आपके ऐश्वर्य को मापने के लिए ब्रह्मा ऊपर और विष्णु नीचे की ओर यत्नपूर्वक चले, जब आप अग्नि-स्तम्भ रूप में खड़े थे; पर पार न पा सके। अन्त में जब श्रद्धा-भक्ति से भरकर दोनों ने आपकी स्तुति की, तब हे गिरीश! आप स्वयं उनके सम्मुख प्रकट हो गए। क्या आपकी सेवा-भक्ति फलवती नहीं होती?
Verse 11
अयत्नादासाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहूनभृतरणकण्डूपरवशान् ।
शिरःपद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबलेः
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ॥ ११॥
ayatnādāsādya tribhuvanamavairavyatikaraṃ
daśāsyo yadbāhūnabhṛtaraṇakaṇḍūparavaśān |
śiraḥpadmaśreṇīracitacaraṇāmbhoruhabaleḥ
sthirāyāstvadbhaktestripurahara visphūrjitamidam || 11||
दशमुख रावण ने बिना प्रयास ही तीनों लोकों को निष्कण्टक कर डाला और युद्ध की खुजली से उसकी भुजाएँ फड़कती रहती थीं — यह सब, हे त्रिपुरहर! आपके चरण-कमलों में उसकी उस अविचल भक्ति का ही वैभव था, जिसने अपने दस शीश-कमलों की पंक्ति बलि रूप में चढ़ा दी थी।
Verse 12
अमुष्य त्वत्सेवासमधिगतसारं भुजवनं
बलात् कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः ।
अलभ्यापातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः ॥ १२॥
amuṣya tvatsevāsamadhigatasāraṃ bhujavanaṃ
balāt kailāse’pi tvadadhivasatau vikramayataḥ |
alabhyāpātāle’pyalasacalitāṃguṣṭhaśirasi
pratiṣṭhā tvayyāsīd dhruvamupacito muhyati khalaḥ || 12||
किन्तु जब उसी रावण ने आपकी सेवा से बलिष्ठ हुई उन भुजाओं का पराक्रम आपके ही निवास कैलास पर आज़माना चाहा, तब आपने केवल पैर के अँगूठे का अग्रभाग हिलाया — और उसे पाताल में भी ठौर न मिला। सच है, ऐश्वर्य पाकर दुष्ट मतवाला हो जाता है।
Verse 13
यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं
अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः ।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोः
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥ १३॥
yadṛddhiṃ sutrāmṇo varada paramoccairapi satīṃ
adhaścakre bāṇaḥ parijanavidheyatribhuvanaḥ |
na taccitraṃ tasmin varivasitari tvaccaraṇayoḥ
na kasyāpyunnatyai bhavati śirasastvayyavanatiḥ || 13||
जिस बाणासुर ने तीनों लोकों को अपना सेवक बना लिया और इन्द्र की महान् सम्पदा को भी तुच्छ कर दिया — यह कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि वह आपके चरणों की उपासना में रहता था। हे वरद! आपके आगे झुका हुआ कौन-सा मस्तक उन्नति को प्राप्त नहीं होता?
Verse 14
अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा
विधेयस्याऽऽसीद् यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः ।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवनभयभङ्गव्यसनिनः ॥ १४॥
akāṇḍabrahmāṇḍakṣayacakitadevāsurakṛpā
vidheyasyā’’sīd yastrinayana viṣaṃ saṃhṛtavataḥ |
sa kalmāṣaḥ kaṇṭhe tava na kurute na śriyamaho
vikāro’pi ślāghyo bhuvanabhayabhaṅgavyasaninaḥ || 14||
समुद्र-मन्थन से निकले विष से जब असमय ही ब्रह्माण्ड के नाश की आशंका से देवता और दैत्य व्याकुल हो उठे, तब हे त्रिनयन! दया से आपने उसे पी लिया। कण्ठ में पड़ा वह नीला दाग आपकी शोभा ही बन गया। जगत् के भय को मिटाने के व्यसनी के लिए तो विकार भी श्लाघनीय है।
Verse 15
असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः ॥ १५॥
asiddhārthā naiva kvacidapi sadevāsuranare
nivartante nityaṃ jagati jayino yasya viśikhāḥ |
sa paśyannīśa tvāmitarasurasādhāraṇamabhūt
smaraḥ smartavyātmā na hi vaśiṣu pathyaḥ paribhavaḥ || 15||
कामदेव के बाण देवता, असुर या मनुष्य — कहीं भी अचूक थे, सदा विजयी होकर ही लौटते थे। किन्तु हे ईश! आपको साधारण देवता समझ बैठा, और क्षण भर में भस्म होकर केवल स्मरण-शेष (अनंग) रह गया। जितेन्द्रियों का अपमान कल्याणकारी नहीं होता।
Verse 16
मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद् भुजपरिघरुग्णग्रहगणम् ।
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥ १६॥
mahī pādāghātād vrajati sahasā saṃśayapadaṃ
padaṃ viṣṇorbhrāmyad bhujaparigharugṇagrahagaṇam |
muhurdyaurdausthyaṃ yātyanibhṛtajaṭātāḍitataṭā
jagadrakṣāyai tvaṃ naṭasi nanu vāmaiva vibhutā || 16||
आपके पदाघात से पृथ्वी सहसा संशय में पड़ जाती है; आपकी परिघ-सी भुजाओं से ग्रह-गण आहत होकर विष्णुलोक काँप उठता है; आपकी खुली जटाओं की मार से स्वर्ग के तट व्याकुल हो जाते हैं — देखिए, जगत् की रक्षा के लिए ही आप नृत्य करते हैं, पर आपकी यह विभुता उलटी ही प्रतीत होती है! ऐश्वर्य सचमुच विषम वस्तु है।
Verse 17
वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते ।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति
अनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ॥ १७॥
viyadvyāpī tārāgaṇaguṇitaphenodgamaruciḥ
pravāho vārāṃ yaḥ pṛṣatalaghudṛṣṭaḥ śirasi te |
jagaddvīpākāraṃ jaladhivalayaṃ tena kṛtamiti
anenaivonneyaṃ dhṛtamahima divyaṃ tava vapuḥ || 17||
आकाश में व्याप्त, तारागणों से गुँथी फेन-राशि से शोभित जो दिव्य नदी पृथ्वी को द्वीप बनाकर सागर की मेखला पहनाती है, वही आपके मस्तक पर जल की एक बूँद-सी दिखाई देती है। इसी से अनुमान कीजिए कि आपका दिव्य शरीर कितना महान् और विराट है।
Verse 18
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो
रथाङ्गे चन्द्रार्कौ रथचरणपाणिः शर इति ।
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर विधिः
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ॥ १८॥
rathaḥ kṣoṇī yantā śatadhṛtiragendro dhanuratho
rathāṅge candrārkau rathacaraṇapāṇiḥ śara iti |
didhakṣoste ko’yaṃ tripuratṛṇamāḍambara vidhiḥ
vidheyaiḥ krīḍantyo na khalu paratantrāḥ prabhudhiyaḥ || 18||
पृथ्वी रथ, ब्रह्मा सारथी, मेरु पर्वत धनुष, चन्द्र-सूर्य रथ के पहिये और स्वयं विष्णु बाण — तृणवत् त्रिपुर को जलाने के लिए यह सारा आडम्बर क्यों? प्रभु की संकल्प-शक्ति किसी साधन के अधीन नहीं; वे तो अपनी आज्ञाकारी वस्तुओं से केवल क्रीड़ा कर रहे थे।
Verse 19
हरिस्ते साहस्रं कमल बलिमाधाय पदयोः
यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ॥ १९॥
hariste sāhasraṃ kamala balimādhāya padayoḥ
yadekone tasmin nijamudaharannetrakamalam |
gato bhaktyudrekaḥ pariṇatimasau cakravapuṣaḥ
trayāṇāṃ rakṣāyai tripurahara jāgarti jagatām || 19||
विष्णु प्रतिदिन आपके चरणों में सहस्र कमल चढ़ाते थे; एक दिन एक कमल कम पड़ा तो उन्होंने अपना नेत्र-कमल ही निकालकर अर्पित कर दिया। भक्ति का वही उमड़ा हुआ वेग चक्र (सुदर्शन) बनकर उनके हाथ में परिणत हुआ, जिससे हे त्रिपुरहर! वे तीनों लोकों की रक्षा में जागते रहते हैं।
Verse 20
क्रतौ सुप्ते जाग्रत् त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते ।
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥ २०॥
kratau supte jāgrat tvamasi phalayoge kratumatāṃ
kva karma pradhvastaṃ phalati puruṣārādhanamṛte |
atastvāṃ samprekṣya kratuṣu phaladānapratibhuvaṃ
śrutau śraddhāṃ badhvā dṛḍhaparikaraḥ karmasu janaḥ || 20||
यज्ञ समाप्त होकर सो जाता है, पर कर्म और फल का योग कराने के लिए आप जागते रहते हैं; पुरुष (ईश्वर) की आराधना के बिना नष्ट हुआ कर्म भला कैसे फल देता? इसलिए आपको यज्ञ-फल का प्रतिभू (गारंटी देने वाला) देखकर ही लोग वेद में श्रद्धा रखकर दृढ़ संकल्प से कर्मों में लगते हैं।
Verse 21
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां
ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः ।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफलविधानव्यसनिनः
ध्रुवं कर्तुं श्रद्धा विधुरमभिचाराय हि मखाः ॥ २१॥
kriyādakṣo dakṣaḥ kratupatiradhīśastanubhṛtāṃ
ṛṣīṇāmārtvijyaṃ śaraṇada sadasyāḥ suragaṇāḥ |
kratubhraṃśastvattaḥ kratuphalavidhānavyasaninaḥ
dhruvaṃ kartuṃ śraddhā vidhuramabhicārāya hi makhāḥ || 21||
क्रिया-कुशल स्वयं दक्ष यज्ञपति था — प्रजाओं का अधीश्वर; ऋषिगण ऋत्विज थे और देवगण सदस्य — फिर भी, हे शरणदाता! आपके प्रति श्रद्धा से रहित वह यज्ञ आपके द्वारा ध्वस्त हुआ। यज्ञ-फल के विधाता का तिरस्कार करने वाले यज्ञ अपने कर्ताओं का ही नाश कर देते हैं।
Verse 22
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद् भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥ २२॥
prajānāthaṃ nātha prasabhamabhikaṃ svāṃ duhitaraṃ
gataṃ rohid bhūtāṃ riramayiṣumṛṣyasya vapuṣā |
dhanuṣpāṇeryātaṃ divamapi sapatrākṛtamamuṃ
trasantaṃ te’dyāpi tyajati na mṛgavyādharabhasaḥ || 22||
जब प्रजापति काम के वश होकर अपनी ही पुत्री के पीछे दौड़े — वह मृगी बनकर भागी और वे मृग रूप धारण कर पीछे लगे — तब आपने व्याध (शिकारी) बनकर धनुष हाथ में लिया; आपके बाण से बिंधे वे भागकर आकाश में जा छिपे (मृगशिरा नक्षत्र बने)। आज भी वे भयभीत-से वहीं टँगे हैं — आपका वह व्याध-रोष उन्हें अब भी नहीं छोड़ता।
Verse 23
स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरतदेहार्धघटनात्
अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः ॥ २३॥
svalāvaṇyāśaṃsā dhṛtadhanuṣamahnāya tṛṇavat
puraḥ pluṣṭaṃ dṛṣṭvā puramathana puṣpāyudhamapi |
yadi straiṇaṃ devī yamaniratadehārdhaghaṭanāt
avaiti tvāmaddhā bata varada mugdhā yuvatayaḥ || 23||
अपने रूप-सौन्दर्य पर भरोसा रखने वाले, धनुष चढ़ाए कामदेव को आपने क्षण भर में तृण की भाँति जलाकर भस्म कर दिया — और यह पार्वती के नेत्रों के सामने हुआ। फिर भी यदि देवी, आपके अर्धांग में स्थान पाने के कारण, आपको अपने आकर्षण के वश में मानती हैं, तो हे वरद! सचमुच युवतियाँ भोली ही होती हैं।
Verse 24
श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः
चिताभस्मालेपः स्रगपि नृकरोटीपरिकरः ।
अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मङ्गलमसि ॥ २४॥
śmaśāneṣvākrīḍā smarahara piśācāḥ sahacarāḥ
citābhasmālepaḥ sragapi nṛkaroṭīparikaraḥ |
amaṅgalyaṃ śīlaṃ tava bhavatu nāmaivamakhilaṃ
tathāpi smartṝṇāṃ varada paramaṃ maṅgalamasi || 24||
श्मशान में क्रीड़ा, पिशाच संगी-साथी, चिता की भस्म का लेप, नर-मुण्डों की माला — हे स्मरहर! आपका सारा आचरण भले ही अमंगलमय कहलाए; तो भी, हे वरद! जो आपका स्मरण करते हैं, उनके लिए आप परम मंगल ही हैं।
Verse 25
मनः प्रत्यक् चित्ते सविधमविधायात्तमरुतः
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमदसलिलोत्सङ्गतिदृशः ।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये
दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान् ॥ २५॥
manaḥ pratyak citte savidhamavidhāyāttamarutaḥ
prahṛṣyadromāṇaḥ pramadasalilotsaṅgatidṛśaḥ |
yadālokyāhlādaṃ hrada iva nimajyāmṛtamaye
dadhatyantastattvaṃ kimapi yaminastat kila bhavān || 25||
जो यमी (संयमी योगी) प्राणों को वश में कर, मन को हृदय में स्थिर कर अन्तर्मुख होकर देखते हैं — रोमांचित शरीर और आनन्द के आँसुओं से छलकते नेत्र लिए मानो अमृत के सरोवर में डूबकर जिस अन्तस्तत्त्व का अनुभव कर धन्य होते हैं — वह तत्त्व निश्चय ही आप ही हैं।
Verse 26
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहः
त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च ।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत् त्वं न भवसि ॥ २६॥
tvamarkastvaṃ somastvamasi pavanastvaṃ hutavahaḥ
tvamāpastvaṃ vyoma tvamu dharaṇirātmā tvamiti ca |
paricchinnāmevaṃ tvayi pariṇatā bibhrati giraṃ
na vidmastattattvaṃ vayamiha tu yat tvaṃ na bhavasi || 26||
तुम सूर्य हो, तुम चन्द्र हो, तुम वायु हो, तुम अग्नि हो; तुम जल हो, तुम आकाश हो, तुम पृथ्वी हो और तुम ही आत्मा हो — इस प्रकार लोग एक-एक परिच्छिन्न रूप में आपका वर्णन करते हैं। किन्तु हम तो वह तत्त्व ही नहीं जानते, जो आप नहीं हैं।
Verse 27
त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरान्
अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति ।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः
समस्तव्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥ २७॥
trayīṃ tisro vṛttīstribhuvanamatho trīnapi surān
akārādyairvarṇaistribhirabhidadhat tīrṇavikṛti |
turīyaṃ te dhāma dhvanibhiravarundhānamaṇubhiḥ
samastavyastaṃ tvāṃ śaraṇada gṛṇātyomiti padam || 27||
तीनों वेद, तीन अवस्थाएँ (जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति), तीनों लोक और तीनों देवताओं को 'अ', 'उ', 'म्' — इन तीन वर्णों से कहता हुआ, और अपनी सूक्ष्म ध्वनि (अनुस्वार-नाद) से आपके तुरीय धाम का स्पर्श करता हुआ — हे शरणदाता! ॐ यह पद आपको अंशतः भी और समग्र रूप में भी कहता है।
Verse 28
भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहान्
तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ।
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि
प्रियायास्मैधाम्ने प्रणिहितनमस्योऽस्मि भवते ॥ २८॥
bhavaḥ śarvo rudraḥ paśupatirathograḥ sahamahān
tathā bhīmeśānāviti yadabhidhānāṣṭakamidam |
amuṣmin pratyekaṃ pravicarati deva śrutirapi
priyāyāsmaidhāmne praṇihitanamasyo’smi bhavate || 28||
भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, सहमहान्, भीम और ईशान — आपके इस आठ नामों के समूह में से एक-एक पर श्रुति भी विचार करती रहती है। उस प्रिय धाम-स्वरूप आपको मैं प्रणिपातपूर्वक नमस्कार करता हूँ।
Verse 29
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमः
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः ।
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः
नमः सर्वस्मै ते तदिदमतिसर्वाय च नमः ॥ २९॥
namo nediṣṭhāya priyadava daviṣṭhāya ca namaḥ
namaḥ kṣodiṣṭhāya smarahara mahiṣṭhāya ca namaḥ |
namo varṣiṣṭhāya trinayana yaviṣṭhāya ca namaḥ
namaḥ sarvasmai te tadidamatisarvāya ca namaḥ || 29||
हे वनप्रिय! अत्यन्त निकटवर्ती को नमस्कार, और अत्यन्त दूरस्थ को भी नमस्कार; हे स्मरहर! सूक्ष्म से सूक्ष्म को नमस्कार, और महान् से महान् को भी नमस्कार; हे त्रिनयन! सबसे पुरातन को नमस्कार, और नित्य-नवीन (युवा) को भी नमस्कार; जो सर्व हैं उन्हें नमस्कार, और जो सर्व से भी परे हैं उन्हें भी नमस्कार।
Verse 30
बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबलतमसे तत् संहारे हराय नमो नमः ।
जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥ ३०॥
bahularajase viśvotpattau bhavāya namo namaḥ
prabalatamase tat saṃhāre harāya namo namaḥ |
janasukhakṛte sattvodriktau mṛḍāya namo namaḥ
pramahasi pade nistraiguṇye śivāya namo namaḥ || 30||
विश्व की उत्पत्ति के लिए रजोगुण-प्रधान 'भव' को बारम्बार नमस्कार; उसके संहार के लिए तमोगुण-प्रधान 'हर' को बारम्बार नमस्कार; जीवों के सुख के लिए सत्त्वगुण-प्रधान 'मृड' को बारम्बार नमस्कार; और तीनों गुणों से परे, परम प्रकाशमय पद-स्वरूप 'शिव' को बारम्बार नमस्कार।
Verse 31
कृशपरिणतिचेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
क्व च तव गुणसीमोल्लङ्घिनी शश्वदृद्धिः ।
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्
वरद चरणयोस्ते वाक्यपुष्पोपहारम् ॥ ३१॥
kṛśapariṇaticetaḥ kleśavaśyaṃ kva cedaṃ
kva ca tava guṇasīmollaṅghinī śaśvadṛddhiḥ |
iti cakitamamandīkṛtya māṃ bhaktirādhād
varada caraṇayoste vākyapuṣpopahāram || 31||
कहाँ क्लेश के वश में पड़ी मेरी यह क्षीण-परिणति वाली चित्तवृत्ति, और कहाँ गुणों की सीमा का सदा उल्लंघन करती हुई आपकी अनन्त ऋद्धि! इस विचार से मैं चकित और भयभीत था; किन्तु भक्ति ने मुझे ढाढ़स बँधाया, और हे वरद! मैंने आपके चरणों में वाक्य-पुष्पों का यह उपहार चढ़ा दिया।
Verse 32
असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे
सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥ ३२॥
asitagirisamaṃ syāt kajjalaṃ sindhupātre
surataruvaraśākhā lekhanī patramurvī |
likhati yadi gṛhītvā śāradā sarvakālaṃ
tadapi tava guṇānāmīśa pāraṃ na yāti || 32||
यदि काला पर्वत (अंजनगिरि) काजल (स्याही) बने, समुद्र दवात, कल्पवृक्ष की शाखा लेखनी और पृथ्वी पत्र — और स्वयं शारदा (सरस्वती) उन्हें लेकर सर्वकाल लिखती रहें — तो भी, हे ईश! आपके गुणों का पार नहीं पाया जा सकता।
Verse 33
असुरसुरमुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दुमौलेः
ग्रथितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य ।
सकलगणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः
रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार ॥ ३३॥
asurasuramunīndrairarcitasyendumauleḥ
grathitaguṇamahimno nirguṇasyeśvarasya |
sakalagaṇavariṣṭhaḥ puṣpadantābhidhānaḥ
ruciramalaghuvṛttaiḥ stotrametaccakāra || 33||
इस प्रकार असुरों, देवताओं और मुनीन्द्रों से पूजित, चन्द्रमौलि, गुणों में गुँथी महिमा वाले किन्तु स्वयं निर्गुण उन ईश्वर का यह सुन्दर स्तोत्र समस्त गन्धर्वगणों में श्रेष्ठ पुष्पदन्त नामक गन्धर्व ने मनोहर और गम्भीर छन्दों में रचा।
Verse 34
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान् यः ।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र
प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च ॥ ३४॥
aharaharanavadyaṃ dhūrjaṭeḥ stotrametat
paṭhati paramabhaktyā śuddhacittaḥ pumān yaḥ |
sa bhavati śivaloke rudratulyastathā’tra
pracurataradhanāyuḥ putravān kīrtimāṃśca || 34||
जो मनुष्य शुद्ध चित्त से, परम भक्तिपूर्वक धूर्जटि (शिव) के इस निर्दोष स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करता है, वह (मरणोपरान्त) शिवलोक में जाकर शिव के तुल्य हो जाता है, और इस लोक में प्रचुर धन, दीर्घ आयु, पुत्र और कीर्ति से सम्पन्न होता है।
Verse 35
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः ।
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥ ३५॥
maheśānnāparo devo mahimno nāparā stutiḥ |
aghorānnāparo mantro nāsti tattvaṃ guroḥ param || 35||
महेश से बढ़कर कोई देवता नहीं; महिम्न-स्तोत्र से बढ़कर कोई स्तुति नहीं; 'अघोर' (शिव-नाम) से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं; और गुरु से परे कोई तत्त्व नहीं है।
Verse 36
दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः ।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ३६॥
dīkṣā dānaṃ tapastīrthaṃ jñānaṃ yāgādikāḥ kriyāḥ |
mahimnastava pāṭhasya kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm || 36||
दीक्षा, दान, तप, तीर्थ, ज्ञान और याग आदि क्रियाएँ — ये सब मिलकर भी इस महिम्न-स्तोत्र के पाठ की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं।
Verse 37
कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः
शशिधरवरमौलेर्देवदेवस्य दासः ।
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्यदिव्यं महिम्नः ॥ ३७॥
kusumadaśananāmā sarvagandharvarājaḥ
śaśidharavaramaulerdevadevasya dāsaḥ |
sa khalu nijamahimno bhraṣṭa evāsya roṣāt
stavanamidamakārṣīd divyadivyaṃ mahimnaḥ || 37||
कुसुमदशन (पुष्पदन्त) नाम का गन्धर्व समस्त गन्धर्वों का राजा और सुन्दर चन्द्रकलाधारी देवाधिदेव शिव का सेवक था। अपराध के कारण प्रभु के रोष से वह अपनी महिमा से गिर गया; तभी उसने शिव की महिमा का यह दिव्यातिदिव्य स्तोत्र रचा।
Verse 38
सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्गमोक्षैकहेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्यचेताः ।
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥ ३८॥
suragurumabhipūjya svargamokṣaikahetuṃ
paṭhati yadi manuṣyaḥ prāñjalirnānyacetāḥ |
vrajati śivasamīpaṃ kinnaraiḥ stūyamānaḥ
stavanamidamamoghaṃ puṣpadantapraṇītam || 38||
स्वर्ग और मोक्ष के एकमात्र हेतु देवगुरु शिव की पूजा करके जो मनुष्य हाथ जोड़कर, एकाग्र चित्त से पुष्पदन्त-रचित इस अमोघ स्तोत्र का पाठ करता है, वह किन्नरों से स्तुति किया जाता हुआ शिव के समीप पहुँच जाता है।
Verse 39
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्वभाषितम् ।
अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम् ॥ ३९॥
āsamāptamidaṃ stotraṃ puṇyaṃ gandharvabhāṣitam |
anaupamyaṃ manohāri sarvamīśvaravarṇanam || 39||
गन्धर्व (पुष्पदन्त) द्वारा कहा गया, अनुपम, मनोहारी और सम्पूर्णतः ईश्वर का वर्णन करने वाला यह पुण्यमय स्तोत्र यहाँ समाप्त हुआ।
Verse 40
इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्करपादयोः ।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥ ४०॥
ityeṣā vāṅmayī pūjā śrīmacchaṅkarapādayoḥ |
arpitā tena deveśaḥ prīyatāṃ me sadāśivaḥ || 40||
इस प्रकार यह वाङ्मयी पूजा श्रीशंकर के चरणों में अर्पित है। देवेश सदाशिव मुझ पर सदा प्रसन्न हों।
Verse 41
तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर ।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ॥ ४१॥
tava tattvaṃ na jānāmi kīdṛśo’si maheśvara |
yādṛśo’si mahādeva tādṛśāya namo namaḥ || 41||
हे महेश्वर! मैं आपका तत्त्व नहीं जानता कि आप कैसे हैं; किन्तु हे महादेव! आप जैसे भी हैं, उसी स्वरूप को मेरा बारम्बार नमस्कार है।
Verse 42
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते ॥ ४२॥
ekakālaṃ dvikālaṃ vā trikālaṃ yaḥ paṭhennaraḥ |
sarvapāpavinirmuktaḥ śiva loke mahīyate || 42||
जो मनुष्य दिन में एक बार, दो बार या तीन बार इसका पाठ करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर शिवलोक में महिमा को प्राप्त होता है।
Verse 43
श्री पुष्पदन्तमुखपङ्कजनिर्गतेन
स्तोत्रेण किल्बिषहरेण हरप्रियेण ।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥ ४३॥
śrī puṣpadantamukhapaṅkajanirgatena
stotreṇa kilbiṣahareṇa harapriyeṇa |
kaṇṭhasthitena paṭhitena samāhitena
suprīṇito bhavati bhūtapatirmaheśaḥ || 43||
श्री पुष्पदन्त के मुख-कमल से निकला हुआ, पापों को हरने वाला, हर (शिव) का प्रिय यह स्तोत्र — जो इसे कण्ठस्थ करता है अथवा एकाग्र मन से पाठ करता है — उस पर भूतपति महेश परम प्रसन्न होते हैं।
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