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गीता ध्यानम् PDF

गीता ध्यानम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

ॐ पार्थाय प्रतिबोधितां भगवता नारायणेन स्वयं व्यासेन ग्रथितां पुराणमुनिना मध्ये महाभारतम्। अद्वैतामृतवर्षिणीं भगवतीमष्टादशाध्यायिनीम् अम्ब त्वामनुसन्दधामि भगवद्गीते भवद्वेषिणीम्॥

Om Parthaya Pratibodhitam Bhagavata Narayanena Svayam Vyasena Grathitam Purana-Munina Madhye Mahabharatam Advaitamrita-Varshinim Bhagavatim Ashtadasha-Adhyayinim Amba Tvam Anusandadhami Bhagavad-Gite Bhava-Dveshinim

हे भगवद्गीते! जिसके द्वारा स्वयं भगवान नारायण (कृष्ण) ने अर्जुन को ज्ञान दिया, जिसे व्यास ने महाभारत के मध्य में पिरोया, जो अद्वैत-अमृत बरसाने वाली, अठारह अध्यायों वाली है — हे माता, संसार-बंधन का नाश करने वाली, मैं तुम्हारा ध्यान करता हूँ।

नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र। येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः॥

Namostu Te Vyasa Vishala-Buddhe Phullaravinda-Yatapatra-Netra Yena Tvaya Bharata-Taila-Purnah Prajvalito Jnanamayah Pradipah

हे विशाल बुद्धि वाले, कमल-से नेत्रों वाले व्यास! आपको नमस्कार, जिन्होंने महाभारत-रूपी तेल से भरा ज्ञान का दीपक प्रज्वलित किया।

प्रपन्नपारिजाताय तोत्रवेत्रैकपाणये। ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः॥

Prapanna-Parijataya Totra-Vetraika-Panaye Jnana-Mudraya Krishnaya Gitamrita-Duhe Namah

समस्त उपनिषद् गौएँ हैं, कृष्ण ग्वाला उन्हें दुहते हैं, अर्जुन बछड़ा है, और बुद्धिमान जन गीता-रूपी महान अमृत-दुग्ध का पान करते हैं।

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥

Sarvopanishado Gavo Dogdha Gopala-Nandanah Partho Vatsah Sudhir Bhokta Dugdham Gitamritam Mahat

वसुदेव के पुत्र, कंस और चाणूर का मर्दन करने वाले, देवकी के परमानन्द, जगद्गुरु कृष्ण को मैं नमस्कार करता हूँ।

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

Vasudeva-Sutam Devam Kamsa-Chanura-Mardanam Devaki-Paramanandam Krishnam Vande Jagad-Gurum

जिनकी कृपा गूँगे को वाचाल और लँगड़े को पर्वत लाँघने वाला बना देती है — उन परमानन्द माधव को मैं वन्दन करता हूँ।

भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला शल्यग्राहवती कृपेण वहनी कर्णेन वेलाकुला। अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी सोत्तीर्णा खलु पाण्डवै रणनदी कैवर्तकः केशवः॥

Bhishma-Drona-Tata Jayadratha-Jala Gandhara-Nilotpala Shalya-Grahavati Kripena Vahani Karnena Velakula Ashvatthama-Vikarna-Ghora-Makara Duryodhana-Avartini Sottirna Khalu Pandavai Rana-Nadi Kaivartakah Keshavah

पाराशर्यवचः सरोजममलं गीतार्थगन्धोत्कटं नानाख्यानककेसरं हरिकथासंबोधनाबोधितम्। लोके सज्जनषट्पदैरहरहः पेपीयमानं मुदा भूयाद्भारतपङ्कजं कलिमलप्रध्वंसि नः श्रेयसे॥

Parasharya-Vachah Sarojam Amalam Gitartha-Gandhotkatam Nana-Khyanaka-Kesaram Hari-Katha-Sambodhana-Abodhitam Loke Sajjana-Shatpadair Aharahah Pepiyamanam Muda Bhuyad Bharata-Pankajam Kali-Mala-Pradhvamsi Nah Shreyase

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्। यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥

Mukam Karoti Vachalam Pangum Langhayate Girim Yat-Kripa Tam Aham Vande Paramananda-Madhavam

यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैः वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः। ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः॥

Yam Brahma Varunendra-Rudra-Marutah Stunvanti Divyaih Stavaih Vedaih Sanga-Pada-Kramopanishadair Gayanti Yam Samagah Dhyana-Avasthita-Tad-Gatena Manasa Pashyanti Yam Yogino Yasyantam Na Viduh Surasura-Gana Devaya Tasmai Namah