एकश्लोकी PDF
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किं ज्योतिस्तवभानुमानहनि मे रात्रौ प्रदीपादिकं स्यादेवं रविदीपदर्शनविधौ किं ज्योतिराख्याहि मे । चक्षुस्तस्य निमीलनादिसमये किं धीर्धियो दर्शने किं तत्राहमतो भवान्परमकं ज्योतिस्तदस्मि प्रभो ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ एकश्लोकी सम्पूर्णा ॥
kiṃ jyotistavabhānumānahani me rātrau pradīpādikaṃ syādevaṃ ravidīpadarśanavidhau kiṃ jyotirākhyāhi me | cakṣustasya nimīlanādisamaye kiṃ dhīrdhiyo darśane kiṃ tatrāhamato bhavānparamakaṃ jyotistadasmi prabho || iti śrīmatparamahaṃsaparivrājakācāryasya śrīgovindabhagavatpūjyapādaśiṣyasya śrīmacchaṅkarabhagavataḥ kṛtau ekaślokī sampūrṇā ||
आदि शंकराचार्य का एक-श्लोकीय संवाद, जो आत्मा को उस प्रकाश रूप में इंगित करता है जिससे सब जाना जाता है — "तेरा प्रकाश क्या है? दिन में सूर्य, रात में दीप… और दीप किस प्रकाश से दिखता है? — वही मैं हूँ।"