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दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् PDF

दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

मौनव्याख्याप्रकटितपरब्रह्मतत्त्वं युवानं वर्षिष्ठान्ते वसदृषिगणैरावृतं ब्रह्मनिष्ठैः । आचार्येन्द्रं करकलितचिन्मुद्रमानन्दरूपं स्वात्मारामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥

maunavyākhyāprakaṭitaparabrahmatattvaṃ yuvānaṃ varṣiṣṭhānte vasadṛṣigaṇairāvṛtaṃ brahmaniṣṭhaiḥ | ācāryendraṃ karakalitacinmudramānandarūpaṃ svātmārāmaṃ muditavadanaṃ dakṣiṇāmūrtimīḍe ||

मैं उन दक्षिणामूर्ति की वन्दना करता हूँ — जो रूप में नित्य-युवा हैं, फिर भी ब्रह्म में स्थित वृद्ध ऋषियों से घिरे बैठे हैं; जो मौन के द्वारा परब्रह्म तत्त्व का उपदेश देते हैं; जो आचार्यों में श्रेष्ठ हैं, जिनका हाथ चिन्मुद्रा में है, जिनका स्वरूप आनन्द है, जो अपने ही आत्मा में रमण करते हैं, और जिनका मुख प्रसन्नता से युक्त है।

विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया । यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ १॥

viśvaṃ darpaṇadṛśyamānanagarītulyaṃ nijāntargataṃ paśyannātmani māyayā bahirivodbhūtaṃ yathā nidrayā | yaḥ sākṣātkurute prabodhasamaye svātmānamevādvayaṃ tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 1||

यह विश्व दर्पण में दिखाई देने वाली नगरी के समान है — जो अपने ही आत्मा के भीतर है, फिर भी माया के कारण बाहर उत्पन्न-सा प्रतीत होता है, जैसे स्वप्न में। जो ज्ञान के जागरण के समय इसे अपने ही अद्वय आत्मा के रूप में साक्षात् अनुभव करते हैं — उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

बीजस्यान्तरिवाङ्कुरो जगदिदं प्राङ्निर्विकल्पं पुनः मायाकल्पितदेशकालकलनावैचित्र्यचित्रीकृतम् । मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ २॥

bījasyāntarivāṅkuro jagadidaṃ prāṅnirvikalpaṃ punaḥ māyākalpitadeśakālakalanāvaicitryacitrīkṛtam | māyāvīva vijṛmbhayatyapi mahāyogīva yaḥ svecchayā tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 2||

यह विश्व प्रकट होने से पूर्व बीज के भीतर छिपे अंकुर के समान निर्विकल्प (अभेद) था; फिर माया द्वारा कल्पित देश और काल के भेद से विचित्र विविधता में रचा जाकर, जिसे वे अपनी इच्छा से प्रकट करते हैं — किसी मायावी अथवा महायोगी के समान। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासते साक्षात्तत्त्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान् । यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवाम्भोनिधौ तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ३॥

yasyaiva sphuraṇaṃ sadātmakamasatkalpārthakaṃ bhāsate sākṣāttattvamasīti vedavacasā yo bodhayatyāśritān | yatsākṣātkaraṇādbhavenna punarāvṛttirbhavāmbhonidhau tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 3||

जिनका स्वयं-प्रकाश चैतन्य, स्वयं सत्स्वरूप होकर, असत् (मिथ्या) पदार्थों को भी सत्-सा भासित करता है; जो 'तत्त्वमसि' इस महान् वेद-वचन के द्वारा अपने आश्रितों को बोध कराते हैं; और जिनका साक्षात्कार होने पर संसार-सागर में पुनः आवृत्ति (पुनर्जन्म) नहीं होती। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभाभास्वरं ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा बहिः स्पन्दते । जानामीति तमेव भान्तमनुभात्येतत्समस्तं जगत् तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ४॥

nānācchidraghaṭodarasthitamahādīpaprabhābhāsvaraṃ jñānaṃ yasya tu cakṣurādikaraṇadvārā bahiḥ spandate | jānāmīti tameva bhāntamanubhātyetatsamastaṃ jagat tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 4||

जिनका ज्ञान (चैतन्य), अनेक छिद्रों वाले घड़े के भीतर रखे महादीप के प्रकाश के समान, नेत्र आदि इन्द्रियों के द्वारों से बाहर स्पन्दित होता है; जब वे ही 'मैं जानता हूँ' इस रूप में प्रकाशित होते हैं, तब यह समस्त जगत् उन्हीं के पीछे (उन्हीं के प्रकाश से) प्रकाशित होता है। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः स्त्रीबालान्धजडोपमास्त्वहमिति भ्रान्ता भृशं वादिनः । मायाशक्तिविलासकल्पितमहा व्यामोहसंहारिणे तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ५॥

dehaṃ prāṇamapīndriyāṇyapi calāṃ buddhiṃ ca śūnyaṃ viduḥ strībālāndhajaḍopamāstvahamiti bhrāntā bhṛśaṃ vādinaḥ | māyāśaktivilāsakalpitamahā vyāmohasaṃhāriṇe tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 5||

'शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ, चंचल बुद्धि अथवा शून्य — यही आत्मा है' — ऐसा स्त्री, बालक, अंधे और जड़ के समान भ्रमित वादी लोग अत्यन्त आग्रह से कहते हैं। माया-शक्ति के विलास से रचे गए इस महान् व्यामोह का संहार करने वाले — उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

राहुग्रस्तदिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादनात् सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् । प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ६॥

rāhugrastadivākarendusadṛśo māyāsamācchādanāt sanmātraḥ karaṇopasaṃharaṇato yo’bhūtsuṣuptaḥ pumān | prāgasvāpsamiti prabodhasamaye yaḥ pratyabhijñāyate tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 6||

राहु से ग्रस्त सूर्य अथवा चन्द्रमा के समान, मनुष्य गहरी निद्रा में इन्द्रियों के उपसंहार से माया से आच्छादित होकर केवल शुद्ध सत्ता-मात्र रह जाता है; और जागने के समय वह 'मैं पहले (सोता हुआ) था' इस प्रकार उस नित्य आत्मा को पहचानता है। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा । स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ७॥

bālyādiṣvapi jāgradādiṣu tathā sarvāsvavasthāsvapi vyāvṛttāsvanuvartamānamahamityantaḥ sphurantaṃ sadā | svātmānaṃ prakaṭīkaroti bhajatāṃ yo mudrayā bhadrayā tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 7||

बाल्य, यौवन, वृद्धावस्था आदि तथा जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति — इन सब बदलती हुई अवस्थाओं में भी जो 'मैं' रूप में निरन्तर भीतर स्फुरित रहता है, उस अपने आत्मा को जो अपने भक्तों के लिए कल्याणकारी (भद्र) मुद्रा के द्वारा प्रकट करते हैं। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसंबन्धतः शिष्याचार्यतया तथैव पितृपुत्राद्यात्मना भेदतः । स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो मायापरिभ्रामितः तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ८॥

viśvaṃ paśyati kāryakāraṇatayā svasvāmisaṃbandhataḥ śiṣyācāryatayā tathaiva pitṛputrādyātmanā bhedataḥ | svapne jāgrati vā ya eṣa puruṣo māyāparibhrāmitaḥ tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 8||

माया से भ्रमित यह पुरुष, स्वप्न में अथवा जाग्रत् में, इस एक ही (आत्मा-रूप) विश्व को कार्य-कारण, स्वामी-सेवक, शिष्य-आचार्य, पिता-पुत्र आदि सम्बन्धों के भेद से अनेक रूपों में विभक्त देखता है। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

भूरम्भांस्यनलोऽनिलोऽम्बरमहर्नाथो हिमांशुः पुमान् इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम् । नान्यत्किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभोः तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ९॥

bhūrambhāṃsyanalo’nilo’mbaramaharnātho himāṃśuḥ pumān ityābhāti carācarātmakamidaṃ yasyaiva mūrtyaṣṭakam | nānyatkiñcana vidyate vimṛśatāṃ yasmātparasmādvibhoḥ tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 9||

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और जीव (पुरुष) — इन आठ रूपों (अष्टमूर्ति) के रूप में ही यह चराचर जगत् प्रतीत होता है; विचार करने वालों के लिए उन सर्वव्यापक परम तत्त्व से भिन्न और कुछ भी नहीं है। उन गुरुस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।

सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिन् स्तवे तेनास्य श्रवणात्तदर्थमननाद्ध्यानाच्च सङ्कीर्तनात् । सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः ततः सिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम् ॥ १०॥

sarvātmatvamiti sphuṭīkṛtamidaṃ yasmādamuṣmin stave tenāsya śravaṇāttadarthamananāddhyānācca saṅkīrtanāt | sarvātmatvamahāvibhūtisahitaṃ syādīśvaratvaṃ svataḥ tataḥ siddhyettatpunaraṣṭadhā pariṇataṃ caiśvaryamavyāhatam || 10||

इस स्तोत्र में 'सब कुछ आत्मा ही है' (सर्वात्मत्व) यह तत्त्व स्पष्ट किया गया है; अतः इसके श्रवण, अर्थ-मनन, ध्यान और संकीर्तन से सर्वात्मत्व की महान् विभूति सहित ईश्वरत्व स्वयं ही प्राप्त होता है, और उसके पश्चात् अष्टधा प्रकट होने वाला अबाधित ऐश्वर्य भी सिद्ध हो जाता है।

वटविटपिसमीपे भूमिभागे निषण्णं सकलमुनिजनानां ज्ञानदातारमारात् । त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिदेवं जननमरणदुःखच्छेददक्षं नमामि ॥

vaṭaviṭapisamīpe bhūmibhāge niṣaṇṇaṃ sakalamunijanānāṃ jñānadātāramārāt | tribhuvanagurumīśaṃ dakṣiṇāmūrtidevaṃ jananamaraṇaduḥkhacchedadakṣaṃ namāmi ||

मैं उन दक्षिणामूर्ति देव को नमस्कार करता हूँ — जो वटवृक्ष के समीप भूमि पर विराजमान हैं, जो समस्त एकत्रित मुनिजनों को ज्ञान प्रदान करते हैं, जो तीनों लोकों के ईश और गुरु हैं, तथा जन्म-मरण के दुःख का छेदन करने में दक्ष (निपुण) हैं।