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भज गोविन्दम् PDF

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भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते । सम्प्राप्ते सन्निहिते काले नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे ॥

Bhaja govindam bhaja govindam govindam bhaja mudhamate Samprapte sannihite kale nahi nahi rakshati dukrinkarane

गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, हे मूढ़ बुद्धि! जब मृत्यु का नियत समय निकट आ जाएगा, तब व्याकरण के नियम ('डुकृञ्करणे') तुम्हारी तनिक भी रक्षा नहीं करेंगे।

मूढ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् । यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥

Mudha jahihi dhanagamatrishnam kuru sadbuddhim manasi vitrishnam Yallabhase nijakarmopattam vittam tena vinodaya chittam

हे मूढ़! धन कमाने की तृष्णा त्याग दे; मन में तृष्णारहित सद्बुद्धि धारण कर। अपने सत्कर्म से जो भी प्राप्त हो, उसी से अपने चित्त को सन्तुष्ट रख।

नारीस्तनभर नाभीदेशं दृष्ट्वा मा गा मोहावेशम् । एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥

Naristanabhara nabhidesham drishtva ma ga mohavesham Etanmamsavasadivikaram manasi vichintaya varam varam

स्त्री के शरीर को देखकर मोह और आवेश में मत पड़; बार-बार मन में विचार कर कि यह तो मांस, चर्बी आदि का ही विकार है।

नलिनीदल गतजलमतितरलं तद्वज्जीवितमतिशय चपलम् । विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥

Nalinidala gatajalamatitaralam tadvajjivitamatishaya chapalam Viddhi vyadhyabhimanagrastam lokam shokahatam cha samastam

कमल के पत्ते पर पड़ी जल की बूँद के समान जीवन अत्यन्त चंचल है। जान ले कि यह समस्त संसार रोग, अभिमान और शोक से ग्रस्त है।

यावद्वित्तोपार्जनसक्तः तावन्निजपरिवारो रक्तः । पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥

Yavadvittoparjanasaktah tavannijaparivaro raktah Pashchajjivati jarjaradehe vartam kopi na prichchhati gehe

जब तक तू धन कमाने में समर्थ है, तभी तक तेरा परिवार तुझसे स्नेह रखता है; बाद में जब शरीर जर्जर हो जाता है, तब घर में कोई तेरा हाल तक नहीं पूछता।

यावत्पवनो निवसति देहे तावत्पृच्छति कुशलं गेहे । गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥

Yavatpavano nivasati dehe tavatprichchhati kushalam gehe Gatavati vayau dehapaye bharya bibhyati tasminkaye

जब तक देह में प्राण-वायु है, तभी तक घर में लोग कुशल पूछते हैं; प्राण निकल जाने और देह के नष्ट होने पर, उसी शरीर से पत्नी भी डरने लगती है।

बालस्तावत्क्रीडासक्तः तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः । वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः परमे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥

Balastavatkridasaktah tarunastavattarunisaktah Vriddhastavachchintasaktah parame brahmani kopi na saktah

बालक खेल में लगा है, युवक युवती में आसक्त है, वृद्ध चिन्ता में डूबा है — पर परब्रह्म में, हाय, कोई भी आसक्त नहीं है।

का ते कान्ता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः । कस्य त्वं कः कुत आयातः तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ॥

Ka te kanta kaste putrah samsaroyamativa vichitrah Kasya tvam kah kuta ayatah tattvam chintaya tadiha bhratah

तेरी पत्नी कौन? तेरा पुत्र कौन? यह संसार अत्यन्त विचित्र है। तू किसका है? कहाँ से आया है? हे भाई! इस तत्त्व का यहाँ विचार कर।

सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम् । निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥

Satsangatve nissangatvam nissangatve nirmohatvam Nirmohatve nishchalatattvam nishchalatattve jivanmuktih

सत्संग से निःसंगता आती है; निःसंगता से निर्मोहता; निर्मोहता से निश्चल तत्त्व; और निश्चल तत्त्व से जीवन्मुक्ति प्राप्त होती है।

वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः । क्षीणे वित्ते कः परिवारः ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥

Vayasi gate kah kamavikarah shushke nire kah kasarah Kshine vitte kah parivarah jnate tattve kah samsarah

यौवन बीत जाने पर कामविकार कहाँ? जल सूख जाने पर सरोवर कहाँ? धन क्षीण होने पर परिवार कहाँ? तत्त्वज्ञान हो जाने पर संसार कहाँ?

मा कुरु धन यौवन गर्वं हरति निमेषात्कालः सर्वम् । मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा ॥

Ma kuru dhana yauvana garvam harati nimeshatkalah sarvam Mayamayamidamakhilam hitva brahmapadam tvam pravisha viditva

धन, जन और यौवन का गर्व मत कर; काल क्षण भर में इन सबको हर लेता है। इस समस्त मायामय जगत् को त्यागकर, ब्रह्मपद को जानकर उसमें प्रवेश कर।

दिनयामिन्यौ सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः । कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥

Dinayaminyau sayam pratah shishiravasantau punarayatah Kalah kridati gachchhatyayuh tadapi na munchatyashavayuh

दिन-रात, सायं-प्रातः, शिशिर-वसन्त बार-बार आते-जाते हैं; काल क्रीड़ा करता है, आयु बीतती जाती है — फिर भी आशा-रूपी वायु नहीं छोड़ती।

का ते कान्ता धनगतचिन्ता वातुल किं तव नास्ति नियन्ता । त्रिजगति सज्जनसङ्गतिरेका भवति भवार्णवतरणे नौका ॥

Ka te kanta dhanagatachinta vatula kim tava nasti niyanta Trijagati sajjanasangatireka bhavati bhavarnavatarane nauka

हे बावले! पत्नी और धन की यह चिन्ता क्यों? क्या तेरा कोई नियन्ता (मार्गदर्शक) नहीं? तीनों लोकों में सत्संगति ही एकमात्र नौका है जो भवसागर से पार उतारती है।

द्वादश मञ्जरिकाभिरशेषः कथितो वैयाकरणस्यैषः । उपदेशोऽभूद्विद्या निपुणैः श्रीमच्छङ्कर भगवच्छरणैः ॥

Dvadasha manjarikabhirasheshah kathito vaiyakaranasyaishah Upadeshobhudvidya nipunaih shrimachchhankara bhagavachchharanaih

बारह श्लोकों (द्वादश-मञ्जरिका) में कहा गया यह सम्पूर्ण उपदेश, विद्या में निपुण श्रीमद् भगवान् शंकराचार्य के चरणों द्वारा (उस) वैयाकरण को दिया गया।

जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः काषायाम्बर बहुकृतवेषः । पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः ॥

Jatilo mundi lunchhitakeshah kashayambara bahukritaveshah Pashyannapi cha na pashyati mudhah udaranimittam bahukritaveshah

कोई जटाधारी, कोई मुण्डित, कोई केश-लुञ्चित, कोई काषाय वस्त्रों में अनेक वेष धारण किए — मूढ़ देखते हुए भी नहीं देखता; ये अनेक वेष केवल पेट के लिए हैं।

अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम् । वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम् ॥

Angam galitam palitam mundam dashanavihinam jatam tundam Vriddho yati grihitva dandam tadapi na munchatyashapindam

अंग शिथिल, सिर श्वेत, मुख दन्तहीन हो गया; वृद्ध हाथ में लाठी लेकर चलता है — फिर भी वह आशा का पिण्ड नहीं छोड़ता।

अग्रे वह्निः पृष्ठे भानुः रात्रौ चुबुक समर्पित जानुः । करतल भिक्षस्तरुतलवासः तदपि न मुञ्चत्याशापाशः ॥

Agre vahnih prishthe bhanuh ratrau chubuka samarpita januh Karatala bhikshastarutalavasah tadapi na munchatyashapashah

आगे आग, पीठ पीछे सूर्य की धूप; रात में घुटनों को ठोड़ी से लगाए बैठा; हथेली में भिक्षा, वृक्ष के नीचे निवास — फिर भी आशा का फंदा नहीं छूटता।

कुरुते गङ्गासागरगमनं व्रत परिपालनमथवा दानम् । ज्ञानविहीनः सर्वमतेन भजति न मुक्तिं जन्मशतेन ॥

Kurute gangasagaragamanam vrata paripalanamathava danam Jnanavihinah sarvamatena bhajati na muktim janmashatena

कोई गंगासागर की यात्रा करे, व्रत पाले अथवा दान दे — फिर भी ज्ञान से रहित होने पर, समस्त मतों के अनुसार, सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं पाता।

सुरमन्दिर निवासः शय्या भूतलमजिनं वासः । सर्व परिग्रह भोगत्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः ॥

Suramandira nivasah shayya bhutalamajinam vasah Sarva parigraha bhogatyagah kasya sukham na karoti viragah

देव-मन्दिर में निवास, शय्या के रूप में भूमि, वस्त्र के रूप में मृगचर्म — समस्त परिग्रह और भोग का त्याग: ऐसा वैराग्य किसे सुख नहीं देता?

योगरतो वा भोगरतो वा सङ्गरतो वा सङ्गविहीनः । यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं नन्दति नन्दति नन्दत्येव ॥

Yogarato va bhogarato va sangarato va sangavihinah Yasya brahmani ramate chittam nandati nandati nandatyeva

योग में रत हो या भोग में, संग में हो या संगरहित — जिसका चित्त ब्रह्म में रमता है, वही आनन्दित होता है, आनन्दित होता है, सचमुच आनन्दित होता है।

भगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गाजल लवकणिका पीता । सकृदपि येन मुरारिसमर्चा क्रियते तस्य यमेन न चर्चा ॥

Bhagavadgita kinchidadhita gangajala lavakanika pita Sakridapi yena murarisamarcha kriyate tasya yamena na charcha

जिसने भगवद्गीता का थोड़ा भी अध्ययन किया, गंगाजल की एक बूँद भी पी, और एक बार भी मुरारि की अर्चना की — उससे यम (मृत्यु) कोई विवाद नहीं करता।

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् । इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुरारे ॥

Punarapi jananam punarapi maranam punarapi jananijathare shayanam Iha samsare bahudustare kripayapare pahi murare

फिर जन्म, फिर मृत्यु, फिर माता के गर्भ में शयन — यह संसार पार करना अत्यन्त कठिन है। हे मुरारे! अपनी अपार कृपा से मेरी रक्षा कीजिए।

रथ्याचर्पट विरचित कन्थः पुण्यापुण्य विवर्जित पन्थः । योगी योगनियोजित चित्तः रमते बालोन्मत्तवदेव ॥

Rathyacharpata virachita kanthah punyapunya vivarjita panthah Yogi yoganiyojita chittah ramate balonmattavadeva

गली के चिथड़ों से बनी गुदड़ी पहने, पुण्य-पाप से परे मार्ग पर चलते हुए, योग में चित्त लगाए योगी बालक अथवा उन्मत्त के समान विचरता है।

कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः का मे जननी को मे तातः । इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥

Kastvam koham kuta ayatah ka me janani ko me tatah Iti paribhavaya sarvamasaram vishvam tyaktva svapnavicharam

तू कौन है? मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? मेरी माता कौन, पिता कौन? इस प्रकार विचार कर, और इस समस्त संसार को स्वप्न-सा असार जानकर त्याग दे।

त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः व्यर्थं कुप्यसि मय्यसहिष्णुः । भव समचित्तः सर्वत्र त्वं वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम् ॥

Tvayi mayi chanyatraiko vishnuh vyartham kupyasi mayyasahishnuh Bhava samachittah sarvatra tvam vanchhasyachiradyadi vishnutvam

तुझमें, मुझमें और सर्वत्र एक ही विष्णु हैं। तू व्यर्थ ही असहिष्णु होकर मुझ पर क्रोध करता है। यदि शीघ्र विष्णुत्व पाना चाहता है तो सर्वत्र समचित्त हो जा।

शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ । सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ॥

Shatrau mitre putre bandhau ma kuru yatnam vigrahasandhau Sarvasminnapi pashyatmanam sarvatrotsrija bhedajnanam

शत्रु, मित्र, पुत्र या बन्धु से विग्रह या सन्धि का प्रयत्न मत कर। सबमें आत्मा को देखकर, सर्वत्र भेद के अज्ञान को त्याग दे।

कामं क्रोधं लोभं मोहं त्यक्त्वाऽऽत्मानं पश्यति सोऽहम् । आत्मज्ञानविहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥

Kamam krodham lobham moham tyaktvatmanam pashyati soham Atmajnanavihina mudhah te pachyante narakanigudhah

काम, क्रोध, लोभ और मोह को त्यागकर मनुष्य आत्मा को 'सोऽहम्' रूप में देखता है। आत्मज्ञान से रहित मूढ़ नरकों में गुप्त रूप से पीड़ित किए जाते हैं।

गेयं गीता नामसहस्रं ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम् । नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥

Geyam gita namasahasram dhyeyam shripati rupamajasram Neyam sajjana sange chittam deyam dinajanaya cha vittam

गीता और (विष्णु-)सहस्रनाम गाने योग्य हैं; श्रीपति के रूप का निरन्तर ध्यान करना चाहिए; चित्त को सत्संग में लगाना चाहिए; और धन दीन-जनों को देना चाहिए।

सुखतः क्रियते कामाभोगः पश्चादन्त शरीरे रोगः । यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् ॥

Sukhatah kriyate kamabhogah pashchadanta sharire rogah Yadyapi loke maranam sharanam tadapi na munchati papacharanam

सुखपूर्वक भोग किया जाता है — पर बाद में, हाय! शरीर में रोग लग जाता है। यद्यपि संसार में मरण ही सबका अन्त है, फिर भी मनुष्य पापाचरण नहीं छोड़ता।

अर्थमनर्थं भावय नित्यं नास्तिततः सुखलेशः सत्यम् । पुत्रादपि धनभाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः ॥

Arthamanartham bhavaya nityam nastitatah sukhaleshah satyam Putradapi dhanabhajam bhitih sarvatraisha vihita ritih

सदा विचार कर कि धन अनर्थकारी है; सत्य तो यह है कि उसमें सुख का लेश भी नहीं। धनवानों को अपने पुत्र से भी भय रहता है — सर्वत्र यही रीति है।

प्राणायामं प्रत्याहारं नित्यानित्य विवेकविचारम् । जाप्यसमेतसमाधिविधानं कुर्ववधानं महदवधानम् ॥

Pranayamam pratyaharam nityanitya vivekavicharam Japyasametasamadhividhanam kurvavadhanam mahadavadhanam

प्राणायाम, प्रत्याहार, नित्य-अनित्य का विवेक-विचार, और जप-सहित समाधि का अनुष्ठान — इन्हें बड़ी सावधानी से, बड़ी एकाग्रता से कर।

गुरुचरणाम्बुज निर्भरभक्तः संसारादचिराद्भव मुक्तः । सेन्द्रियमानस नियमादेवं द्रक्ष्यसि निजहृदयस्थं देवम् ॥

Gurucharanambuja nirbharabhaktah samsaradachiradbhava muktah Sendriyamanasa niyamadevam drakshyasi nijahridayastham devam

गुरु के चरण-कमलों में पूर्ण भक्ति रखने वाला बनकर संसार से शीघ्र मुक्त हो जा। इस प्रकार इन्द्रिय और मन के संयम से तू अपने हृदय में स्थित देव का दर्शन करेगा।

मूढः कश्चन वैयाकरणो डुःकृङ्करणाध्ययनधुरीणः । श्रीमच्छङ्कर भगवच्छिष्यैः बोधित आसीच्छोधित करणः ॥

Mudhah kashchana vaiyakarano duhkrinkaranadhyayanadhurinah Shrimachchhankara bhagavachchhishyaih bodhita asichchhodhita karanah

कोई मूढ़ वैयाकरण व्याकरण के नियमों ('डुकृङ्करण') के अध्ययन में लीन था; श्रीमद् भगवान् शंकराचार्य के शिष्यों ने उसे समझाकर उसकी बुद्धि शुद्ध (सही) कर दी।

भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढमते । नामस्मरणादन्यमुपायं नहि पश्यामो भवतरणे ॥

Bhaja govindam bhaja govindam govindam bhaja mudhamate Namasmaranadanyamupayam nahi pashyamo bhavatarane

गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, हे मूढ़ बुद्धि! भवसागर से पार होने के लिए, नाम-स्मरण के अतिरिक्त हम कोई और उपाय नहीं देखते।