अध्याय 8, श्लोक 12
अध्याय 8: Akṣhar Brahma Yog — अक्षरब्रह्मयोगसर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥
लिप्यंतरण
sarva-dvārāṇi sanyamya mano hṛidi nirudhya cha mūrdhnyādhāyātmanaḥ prāṇam āsthito yoga-dhāraṇām
अर्थ
सब (इन्द्रियों के) द्वारों को संयमित कर मन को हृदय में स्थिर करके और प्राण को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में स्थित हुआ।।
शब्दार्थ
sarva-dvārāṇi — all gatessanyamya — restrainingmanaḥ — the mindhṛidi — in the heart regionnirudhya — confiningcha — andmūrdhni — in the headādhāya — establishātmanaḥ — of the selfprāṇam — the life breathāsthitaḥ — situated (in)yoga-dhāraṇām — the yogic concentration
व्याख्या
See Commentary under 8.13.
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद् गीता 8.12 का अर्थ क्या है?▼
सब (इन्द्रियों के) द्वारों को संयमित कर मन को हृदय में स्थिर करके और प्राण को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में स्थित हुआ।।
यह श्लोक भगवद् गीता के किस अध्याय का है?▼
यह श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 8 (Akṣhar Brahma Yog — Path of the Eternal God) का 12वाँ श्लोक है।