अध्याय 18, श्लोक 5
अध्याय 18: Mokṣha Sanyās Yog — मोक्षसंन्यासयोगयज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥
yajña-dāna-tapaḥ-karma na tyājyaṁ kāryam eva tat yajño dānaṁ tapaśh chaiva pāvanāni manīṣhiṇām
यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं है, किन्तु वह नि:सन्देह कर्तव्य है; यज्ञ, दान और तप ये मनीषियों (साधकों) को पवित्र करने वाले हैं।।
पूर्व श्लोक में कथित द्वितीय मत को स्वीकारते हुए भगवान् उस पर विशेष बल देते हैं। यज्ञ? दान और तपरूप कर्म करणीय हैं? त्याज्य नहीं। पूर्व अध्याय में हमने देखा था कि इन कर्मों का सम्यक् आचरण करने पर वे अन्तकरण को शुद्धि प्रदान करते हैं? जो आत्मोन्नति और आत्मसाक्षात्कार के लिए आवश्यक है। अविद्याजनित बन्धनों से मुक्ति पाने के इच्छुक साधकों को श्रद्धा भक्ति पूर्वक यज्ञ? दान और तप का आचरण करना चाहिए। इसके द्वारा वे आन्तरिक शान्ति और संतुलन को प्राप्त कर सकते हैं।आगे कहते हैं