अध्याय 16, श्लोक 8
अध्याय 16: Daivāsura Sampad Vibhāg Yog — दैवासुरसम्पद्विभागयोगअसत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥
asatyam apratiṣhṭhaṁ te jagad āhur anīśhvaram aparaspara-sambhūtaṁ kim anyat kāma-haitukam
वे कहते हैं कि यह जगत् आश्रयरहित, असत्य और ईश्वर रहित है, यह (स्त्रीपुरुष के) परस्पर कामुक संबंध से ही उत्पन्न हुआ है, और (इसका कारण) क्या हो सकता है?
आसुरी लोगों के वर्णन में हम ऐसे नितान्त संशयी और भौतिकवादी पुरुष को पहचान सकते हैं? जो जीवन की ओर केवल अपनी सीमित बुद्धि के दृष्टिकोण से ही देखता है। इसलिए? स्वाभाविक ही है कि वह न जीवन का कोई चरम लक्ष्य देख पाता है? और न ही इस अनित्य और परस्पर असंबद्ध प्रतीत होने वाली घटनाओं से पूर्ण जगत् का कोई नित्य अधिष्ठान स्वीकार कर पाता है। इन भौतिकवादियों की बुद्धि प्रखर होती है और वे स्वतन्त्र और मौलिक विचार करने में समर्थ होते हैं। इन लोगों को अल्प मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है? जिससे कि वे अपनी सीमित बुद्धि के परे भी देख सकें। इस श्लोक में भौतिकवादी दृष्टिकोण का वर्णन किया गया है।भौतिकवादी वैज्ञानिक पद्धति से जगत् का निरीक्षण और विश्लेषण करते हैं? फिर भी वे उस सत्य को नहीं पहचान पाते? जो इस विश्व को धारण किये हुए है। वे परिवर्तनों को देखतें हैं? और इस सतत परिवर्तन को ही वे जगत् समझ लेते हैं? जिसके लिए किसी नित्य? अविकारी अधिष्ठान का होना वे नहीं मानते हैं। परन्तु? वैज्ञानिक भी अब स्वीकार करते हैं कि नित्य? अपरिवर्तनशील अधिष्ठान के बिना न जगत् में परिवर्तन हो सकता है और न ही वह ज्ञात हो सकता है। परिवर्तन तो एक सापेक्ष घटना मात्र है। एक स्थिर और गतिशून्य पर्दे के बिना चलचित्र का प्रक्षेपण नहीं किया जा सकता और नदी के स्थिर तल के बिना जल का अखण्ड प्रवाह नहीं बना रह सकता। उसी प्रकार अधिष्ठान के बिना आभास नहीं हो सकता। सम्पूर्ण जगत् का यह आश्रय ही सत्य कहलाता है परन्तु आसुरी स्वभाव के लोगों के अनुसार? जगत् निराश्रय है? सत्यरहित है।अनीश्वरम् जगत् का कोई अधिष्ठान नहीं है तब कमसेकम? क्या कोई सर्वज्ञ सर्वशासक है? जो जगत् की घटनाओं को नियन्त्रित करता है भोगवादी लोगों के अनुसार ऐसा कोई नियन्ता और निर्माता नहीं है। न सृष्टिकर्ता है और न पालनकर्ता ही है।इनके मतानुसार यह सम्पूर्ण चराचर जगत् केवल महाभूतों के परम्पर संबंध से उत्पन्न हुआ है और यह संबंध जिस किसी रूप में परिणित होता है? वह केवल संयोग की बात है? और न कि उसके पार्श्व में कोई नियम है। प्राणियों की उत्पत्ति का एकमात्र कारण है? कामवासना। आधुनिक मनोवैज्ञानिक भी इस बात पर बल देते हैं कि कामवासना ही अन्य समस्त वृत्तियों की जननी है? जिसके कारण समस्त घटनाएं घट रही हैं और जीवन की समस्त उपलब्धियाँ संभव,होती हैं।आसुरी लोगों के दृष्टिकोण को दर्शाने के पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण ऐसे लोगों के भाग्य के प्रति सहानुभूति अनुभव करते हुए उनके कर्मों को बताते हैं