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भगवद् गीता · अध्याय 13 / 18

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग

Kṣhetra Kṣhetrajña Vibhāg Yog

Yoga through Distinguishing the Field and the Knower of the Field · 35 श्लोक

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अध्याय सारांश

भगवद गीता का तेरवाह अध्याय क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग है। क्षेत्र शब्द का मतलब भूमि और क्षेत्ररक्षण का मतलब क्षेत्र का जानकार है। हमारा भौतिक शरीर क्षेत्र के सामान है और हमारी अमर आत्मा क्षेत्र के जानकार के सामान है। इस अध्याय में, कृष्ण भौतिक शरीर और अमर आत्मा के बीच भेद करते हैं। वह बताते हैं कि भौतिक शरीर अस्थायी और विनाशकारी है जबकि आत्मा स्थायी और शाश्वत है। भौतिक शरीर नष्ट हो सकता है लेकिन आत्मा कभी भी नष्ट नहीं हो सकती। यह अध्याय फिर भगवान का वर्णन करता है, जो की सर्वोच्च आत्मा हैं। सभी व्यक्तिगत आत्माएं सर्वोच्च आत्मा से उत्पन्न हुई हैं। जो स्पष्ट रूप से शरीर, आत्मा और सर्वोच्च आत्मा के बीच अंतर को समझ लेता है वह परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।

अर्जुन उवाच प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥

arjuna uvācha prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva kṣhetraṁ kṣhetra-jñam eva cha etad veditum ichchhāmi jñānaṁ jñeyaṁ cha keśhava

अर्थअर्जुन ने कहा -- हे केशव ! मैं, प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।।

arjunaḥ uvāchaArjun saidprakṛitimmaterial naturepuruṣhamthe enjoyerchaandevaindeedkṣhetramthe field of activitieskṣhetra-jñamthe knower of the fieldevaevenchaalsoetatthisveditumto knowichchhāmiI wishjñānamknowledgejñeyamthe goal of knowledgechaandkeśhavaKrishna, the killer of the demon named Keshi
व्याख्या

गीता की अनेक पाण्डुलिपियों में यह श्लोक नहीं मिलता है? जबकि कुछ अन्य हस्तलिपियों में यह अर्जुन की जिज्ञासा के रूप में दिया हुआ है।प्रकृति और पुरुष भारतीय सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि जी ने जड़ और चेतन तत्त्वों का निर्देश क्रमश प्रकृति और पुरुष इन दो शब्दों से किया है। इन दोनों के संयोग से ही उस सृष्टि का निर्माण हुआ है इन्हें अर्जुन जानना चाहता है।क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ इन दो शब्दों का अर्थ इस अध्याय की प्रस्तावना में स्पष्ट किया गया है।ज्ञान और ज्ञेय इस अध्याय में ज्ञान शब्द से तात्पर्य उस शुद्धान्तकरण से हैं? जिसके द्वारा ही आत्मतत्त्व का अनुभव किया जा सकता है। यह आत्मा ही ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य वस्तु है।अर्जुन की इस जिज्ञासा के उत्तर को जानना सभी साधकों को लाभदायक होगा।

श्री भगवानुवाचइदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥

śhrī-bhagavān uvācha idaṁ śharīraṁ kaunteya kṣhetram ity abhidhīyate etad yo vetti taṁ prāhuḥ kṣhetra-jña iti tad-vidaḥ

अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- हे कौन्तेय ! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसे तत्त्वज्ञ जन, क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।

śhrī-bhagavān uvāchathe Supreme Divine Lord saididamthisśharīrambodykaunteyaArjun, the son of Kuntikṣhetramthe field of activitiesitithusabhidhīyateis termed asetatthisyaḥone whovettiknowstamthat personprāhuḥis calledkṣhetra-jñaḥthe knower of the fielditithustat-vidaḥthose who discern the truth
व्याख्या

पूर्णत्व का अनुभव आत्मरूप से होता है? न कि दृश्य रूप से। हिन्दू ऋषियों का इस विषय में एकमत है कि अन्तर्मुखी होकर आत्मविचार करना ही आत्मबोध तथा उसके साक्षात् अनुभव का साधन मार्ग है। इस अध्याय में आत्मा और उसकी उपाधियों का सुन्दर दार्शनिक पद्धति से विभाजन किया गया है। आत्मानात्मविवेक जनित बोध ही साधक को दर्शायेगा कि किस प्रकार पारमर्थिक सत्य की दृष्टि से जड़ अनात्मा का आत्यन्तिक (सर्वथा) अभाव है।जाग्रत पुरुष ही अपनी किसी एक विशेष मनस्थिति से स्वप्नद्रष्टा बन जाता है? और जब तक स्वप्न बना रहता है तब तक उस स्वप्नद्रष्टा के लिये वह अत्यन्त सत्य प्रतीत होता है। परन्तु जाग जाने पर उस स्वप्न का अभाव हो जाता है? और जाग्रत् पुरुष यह जानता है कि वह स्वप्न उसके ही मन का विभ्रम मात्र था। इसी प्रकार आत्मानुभूति की वास्तविक जागृति में इस दृश्य प्रपंच का अभाव होता है। साधक अपने आत्मस्वरूप से ही आत्मा का अनुभव करता है? जिसमें इस छायारूप जगत् का कोई अस्तित्व ही नहीं है।इस प्रकार? वेदान्त दर्शन के अनुसार विचार करने पर ज्ञात होता है कि समस्त प्राणी दो तत्त्वों से बने हैं। एक तत्त्व है जड़अचेतन और दूसरा है चेतन तत्त्व। प्रस्तुत श्लोक में इन दोनों को परिभाषित किया गया है।यह शरीर क्षेत्र कहलाता है इस यान्त्रिक युग में यह समझना सरल है कि ऊर्जा को व्यक्त होने अथवा कार्य करने के लिए उपयुक्त क्षेत्र की आवश्यकता होती है। तभी वह व्यक्त होकर मानव की सेवा कर सकती है।इंजन के बिना वाष्पशक्ति तथा पंखे के बिना विद्युत् शक्ति हमें क्रमश गति और मन्द समीर प्रदान नहीं कर सकती। इसी प्रकार? जिन शरीरादि उपाधियों के माध्यम से आत्मचैतन्य व्यक्त होता है? उन्हें ही यहाँ क्षेत्र कहा गया है।इसको जो जानता है उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं यह क्षेत्र जड़ पदार्थों से बना हुआ है। तथापि? इसमें चैतन्य की अभिव्यक्ति होने से यह कार्य करता है और विषयों को जानता है। वास्तव में? यह चेतन तत्त्व जो इन उपाधियों से व्यक्त होकर विषयों को प्रकाशित कर रहा है वह क्षेत्रज्ञ है। शास्त्रीय भाषा में कहेंगे कि उपाधि से अवच्छिन्न चैतन्य ही क्षेत्रज्ञ अथवा जीव कहलाता है।जब तक जीव शरीर धारण किये रहता है? उसकी उपस्थिति जानने की प्रवृत्ति से स्पष्ट ज्ञात होती है। इस जिज्ञासा की प्रवृत्ति की मात्रा विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न तारतम्य में हो सकती है। परन्तु? इसके व्यक्त होने को ही हम जीवन का लक्षण मानते हैं। प्राणी की विषय ग्रहण की तथा उनके प्रति अपनी प्रतिक्रियाओं को व्यक्त करने की क्षमता ही जीवन का व्यवहार है? और जब यह ज्ञाता? शरीर का त्याग करके चला जाता है तब हम उस शरीर को मृत घोषित करते हैं। यह ज्ञाता ही क्षेत्रज्ञ है।तद्विद (तत्त्वज्ञजन) यहाँ? भगवान् श्रीकृष्ण हमें आश्वस्त करते हैं कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की ये परिभाषाएं उनकी स्वच्छन्द घोषणा नहीं हैं और न ही ये केवल परिकल्पित अनुमान है? अपितु स्वयं ब्रह्मनिष्ठ ऋषियों द्वारा ही ये प्रमाणित की गई हैं। संक्षेप में? संपूर्ण जड़ जगत् क्षेत्र है? और चैतन्य स्वरूप आत्मा क्षेत्रज्ञ कहा जाता है।क्या इस विषय में केवल इतना ही जानना है नहीं? आगे सुनो

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥

kṣhetra-jñaṁ chāpi māṁ viddhi sarva-kṣhetreṣhu bhārata kṣhetra-kṣhetrajñayor jñānaṁ yat taj jñānaṁ mataṁ mama

अर्थहे भारत ! तुम समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही (वास्तव में) ज्ञान है , ऐसा मेरा मत है।।

kṣhetra-jñamthe knower of the fieldchaalsoapionlymāmmeviddhiknowsarvaallkṣhetreṣhuin individual fields of activitiesbhāratascion of Bharatkṣhetrathe field of activitieskṣhetra-jñayoḥof the knower of the fieldjñānamunderstanding ofyatwhichtatthatjñānamknowledgematamopinionmamamy
व्याख्या

पूर्व श्लोक में यह कहा गया है कि जड़ उपाधियाँ क्षेत्र हैं और इनका अधिष्ठान चैतन्य स्वरूप आत्मा क्षेत्रज्ञ है। यहाँ सबको चकित कर देने वाला कथन है कि समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जानो। यदि? सब क्षेत्रों में ज्ञाता एक ही है ? तो इसका अर्थ यह हुआ कि बहुलता और विविधता केवल जड़ उपाधियों में ही है और उनमें व्यक्त चैतन्य सर्वत्र एक ही है। इस सर्वश्रेष्ठ? सर्वातीत एक सत्य को यहाँ उत्तम पुरुष एक वचन के रूप में निर्देशित किया गया है? क्षेत्रज्ञ मैं हूँ? क्योंकि सभी साधकों को यह इसी रूप में अनुभव करना है कि? वह मैं हूँ? (सोऽहम्)।हम पहले भी इंगित कर चुके हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण गीता का उपदेश योगारूढ़ की स्थिति के विरले क्षणों में कर रहे हैं। वे सर्वव्यापी आत्मस्वरूप से तादात्म्य किये हुये हैं। इस श्लोक का उनका कथन विद्युत् के इस कथन के समान है कि? मैं ही विश्वभर के बल्बों में प्रकाशित हो रही ऊर्जा हूँ।इस सम्पूर्ण विविध नामरूपमय सृष्टि के पीछे विद्यमान एकमेव सत्य का निर्देश करने के पश्चात् भगवान् अपना मत बताते हुये कहते हैं कि क्षेत्रक्षेत्रज्ञ का विवेकजनित ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान कहलाने योग्य है? क्योंकि यही ज्ञान हमें अपने सांसारिक बन्धनों से मुक्त कराने में समर्थ है। इस ज्ञान के अभाव में ही हम जीव भाव के समस्त दुखों को भोग रहे हैं।ज्ञानमार्ग के निष्ठावान् साधकों के लिए यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान उपयोगी और आवश्यक होने के कारण उन्हें उसका विस्तृत अध्ययन करना होगा।

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्।स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु॥

tat kṣhetraṁ yach cha yādṛik cha yad-vikāri yataśh cha yat sa cha yo yat-prabhāvaśh cha tat samāsena me śhṛiṇu

अर्थइसलिये, वह क्षेत्र जो है और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है, और जिस (कारण) से जो (कार्य) हुआ है तथा वह (क्षेत्रज्ञ) भी जो है और जिस प्रभाव वाला है, वह संक्षेप में मुझसे सुनो।।

tatthatkṣhetramfield of activitiesyatwhatchaandyādṛikits naturechaandyat-vikārihow change takes place in ityataḥfrom whatchaalsoyatwhatsaḥhechaalsoyaḥwhoyat-prabhāvaḥwhat his powers arechaandtatthatsamāsenain summarymefrom meśhṛiṇulisten
व्याख्या

भगवान् श्रीकृष्ण न केवल क्षेत्र की वस्तुओं का उल्लेख ही करेंगे? वरन् क्षेत्र के गुण धर्म? उसके विकार तथा कौन से कारण से ऋ़ौन सा कार्य उत्पन्न हुआ है? इसका भी वर्णन करेंगे। उसी प्रकार? क्षेत्रज्ञ का स्वरूप तथा उपाधियों से सम्बद्ध उसके प्रभाव को भी इस अध्याय में बतायेंगे। ये सब? मुझसे संक्षेप में सुनो।अनन्त आत्मा के स्वरूप को दर्शाने वाले विशेषणों को पुन दोहराने मात्र से अथवा उस पर विशेष बल देकर कहने से एक निष्ठावान् साधक को कोई विशेष लाभ भी नहीं होता और न उसके विकास में कोई सहायता मिलती है। जिन कारणों से हमारे जीवन की समस्यायें उत्पन्न होती हैं उनकी ओर से दृष्टि फेर लेने का अर्थ है? समस्या को नहीं सुलझाना। हमारे आसपास का यह जगत्? जिसे हमने ही प्रेक्षित किया है? तथा वे ही प्रक्रियायें जिनके द्वारा हम कार्य करते हुये असंख्य विषयों? भावनाओं और विचारों की विविधता को देखते हैं इन सबका हमें सूक्ष्म निरीक्षण तथा अध्ययन करना चाहिये। इसकी उपेक्षा करने का अर्थ स्वयं को विशाल आवश्यक सारभूत ज्ञान से वंचित रखना है। यह अपनी ही प्रवंचना है।शत्रुओं के विरुद्ध युद्धनीति सम्बन्धी योजना बनाने के लिए शत्रुपक्ष की रणनीति का कमसेकम सामान्य ज्ञान होना आवश्यक होता है। इसी प्रकार? क्षेत्र से युद्ध करके उस पर विजय पाकर उसके बन्धनों से स्वयं को मुक्त करने के लिये यह जानना आवश्यक है कि क्षेत्र क्या है तथा परिस्थिति विशेष में ये उपाधियाँ किस प्रकार कार्य और व्यवहार करती हैं।इस प्रकार? शरीरशास्त्र? जीवशास्त्र? मनोविज्ञान तथा अन्य प्राकृतिक विज्ञान की शाखायें भी जीवन को समझने में अपना योगदान देती हैं। अध्यात्म का ज्ञानमार्ग समस्त लौकिक विज्ञानों का चरम बिन्दु है और उसकी पूर्तिस्वरूप है। इस बात की पुष्टि इसी तथ्य से होती है कि? युद्धभूमि पर भी अर्जुन को इस ज्ञान का उपदेश देते समय? भगवान् इस बात पर बल देने के लिए भूलते नहीं कि इस क्षेत्र का सम्पूर्ण ज्ञान होना महत्व की बात है। इसका हमें सूक्ष्म अध्ययन करना चाहिये।क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के याथात्म्य को देखने? अध्ययन करने और समझने में शिष्य की अभिरुचि उत्पन्न करने के लिए भगवान् इस विषय वस्तु की स्तुति करते हुये कहते हैं

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्िचतैः॥

ṛiṣhibhir bahudhā gītaṁ chhandobhir vividhaiḥ pṛithak brahma-sūtra-padaiśh chaiva hetumadbhir viniśhchitaiḥ

अर्थ(क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विषय में) ऋषियों द्वारा विभिन्न और विविध छन्दों में बहुत प्रकार से गाया गया है, तथा सम्यक् प्रकार से निश्चित किये हुये युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा (अर्थात् ब्रह्म के सूचक शब्दों द्वारा) भी (वैसे ही कहा गया है)।।

ṛiṣhibhiḥby great sagesbahudhāin manifold waysgītamsungchhandobhiḥin Vedic hymnsvividhaiḥvariouspṛithakvariouslybrahma-sūtrathe Brahma Sūtrapadaiḥby the hymnschaandevaespeciallyhetu-madbhiḥwith logicviniśhchitaiḥconclusive evidence
व्याख्या

प्रस्तुत अध्याय में जो विवेचन किया जा रहा है वह कोई व्यर्थ का भाषण अथवा श्रीकृष्ण की बुद्धि की कल्पना मात्र नहीं है। यहाँ भगवान् स्वयं ही स्पष्ट कहते हैं कि ऋषियों द्वारा अनुभूत और प्रतिपादित सत्य की ही वे पुनर्घोषणा कर रहे हैं। संक्षेप में? उपनिषदों के प्रतिपाद्य ब्रह्मतत्त्व का ही निरूपण इस अध्याय का विषय है।कोई व्यक्ति प्रश्न कर सकता है कि क्यों हम उपनिषद् के ऋषियों के कथनों को तत्परता से स्वीकार करें ऐसा प्रश्न केवल वे ही लोग कर सकते हैं? जिन्हें ऋषियों के प्रति अश्रद्धा है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि हमे ऋषियों के प्रति महान् आदर और सम्मान नहीं भी हो? तब भी हमें उनके द्वारा प्रतिपादित सत्य को स्वीकारना ही होगा? क्योंकि वे उपनिषद् के? निश्चित किये हुये युक्तियुक्त कथन हैं। उनके कथन कोई बौद्धिक आलेख अथवा दैवी आज्ञायें नहीं हैं? जो साधारण असहाय जनता पर विशेष दैवी अधिकार प्राप्त किसी देवदूत ने थोप दी हों।जब प्रमाण तर्क एवं अनुभव के द्वारा किसी सत्य को सिद्ध किया जाता है? तब किसी भी बुद्धिमान पुरुष को उसके युक्तियुक्त संगत होने के कारण स्वीकारना ही पड़ता है।अर्जुन के मन में रुचि उत्पन्न करने के पश्चात् भगवान् कहते हैं,

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥

mahā-bhūtāny ahankāro buddhir avyaktam eva cha indriyāṇi daśhaikaṁ cha pañcha chendriya-gocharāḥ

अर्थपंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (प्रकृति), दस इन्द्रियाँ, एक मन, इन्द्रियों के पाँच विषय।।

mahā-bhūtānithe (five) great elementsahankāraḥthe egobuddhiḥthe intellectavyaktamthe unmanifested primordial matterevaindeedchaandindriyāṇithe sensesdaśha-ekamelevenchaandpañchafivechaandindriya-go-charāḥthe (five) objects of the senses
व्याख्या

See Commentary under 13.7

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः।एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥

ichchhā dveṣhaḥ sukhaṁ duḥkhaṁ saṅghātaśh chetanā dhṛitiḥ etat kṣhetraṁ samāsena sa-vikāram udāhṛitam

अर्थइच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात (स्थूलदेह), चेतना (अन्त:करण की चेतन वृत्ति) तथा धृति - इस प्रकार यह क्षेत्र विकारों के सहित संक्षेप में कहा गया है।।

ichchhādesiredveṣhaḥaversionsukhamhappinessduḥkhammiserysaṅghātaḥthe aggregatechetanāthe consciousnessdhṛitiḥthe willetatall thesekṣhetramthe field of activitiessamāsenacomprise ofsa-vikāramwith modificationsudāhṛitamare said
व्याख्या

अब यहाँ मुख्य विषय का प्रारम्भ होता है जिसे भगवान् ने पहले केवल यह शरीर कहकर निर्देशित किया था? उस क्षेत्र के तत्त्वों का यहाँ नामोल्लेख करके गणना की गई है।महाभूतानि आकाश? वायु? अग्नि? जल और पृथ्वी ये पंचमहाभूत हैं। ये महाभूत अपने सूक्ष्म रूप में तन्मात्रा कहलाते हैं। इन्हीं तन्मात्राओं के परस्पर मिलन से पाँच स्थूल महाभूत उत्पन्न होते हैं? जिनका निर्देश यहाँ इन्द्रियों के पाँच विषय कहकर किया गया है।अहंकार चैतन्य का उपाधियों के साथ तादात्म्य होने पर अहंभाव या अहंकार की उत्पत्ति होती है। यही उपाधियों द्वारा कर्मों का कर्ता और फलों का भोक्ता बनता है। संसार के सुखदुखादिक इसी के लिए होते हैं।बुद्धि समष्टि की दृष्टि से यहाँ बुद्धि शब्द प्रयुक्त है? जिसे सांख्यदर्शन में महत्तत्त्व कहते हैं। अन्तकरण की निश्चयात्मिका वृत्ति बुद्धि कहलाती है। जीवन में वस्तु की यथार्थता? अनुभवों का शुभ और अशुभ रूप में निर्धारण करना ही बुद्धि का कार्य है।अव्यक्त मनुष्य के मन और बुद्धि जिससे प्रेरित होते हैं? वह अव्यक्त वासनाएं हैं। जगत् में हम जो कर्म करते हैं तथा फल भोगते हैं? उनसे हमारे मन में संस्कार उत्पन्न होते हैं? जो हमारे भावी कर्म? विचार एवं भावनाओं को दिशा प्रदान करते हैं।एक व्यष्टि जीव के समस्त कर्मों का स्रोत उसकी वासनाएं होती हैं। इसलिए स्वाभाविक है कि समष्टि की दृष्टि से सम्पूर्ण चराचर सृष्टि का स्रोत समष्टि वासनाएं ही होनी चाहिए। इसी समष्टि वासना को सांख्यदर्शन में मूलप्रकृति कहा गया है? तो वेदान्त ने इसे माया कहा है। माया या मूलप्रकृति की उपाधि से विशिष्ट परमात्मा ही सृष्टिकर्ता ईश्वर है और वही परमात्मा व्यष्टि वासना की उपाधि (अविद्या) से विशिष्ट जीव बनता है।इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि अव्यक्त ही वह अदृष्ट कारण है? जिससे यह दृश्य जगत् कार्यरूप में व्यक्त हुआ है।दस इन्द्रियाँ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ ही वे कारण हैं? जिनके द्वारा प्रत्येक मनुष्य क्रमश विषय ग्रहण करके अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करता है।एक (मन) प्रस्तुत प्रकरण के सन्दर्भ में एक शब्द से निर्दिष्ट वस्तु मन है। प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय केवल एक ही विषय का ग्रहण करती है। पाँचों इन्द्रियों से सम्बद्ध मन समस्त विषय संवेदनाओं को एकत्र कर बुद्धि के समक्ष निर्णय के लिए प्रस्तुत करता है। तत्पश्चात् उस निर्णय को वह पाँच कर्मेन्द्रियों के द्वारा कार्यान्वित करता है। इस प्रकार? विषय ग्रहण तथा प्रतिक्रिया का व्यक्त होना इन दोनों का कार्य एक मन ही करता है? इसलिए उसे यहाँ एक शब्द से इंगित करते हैं।पाँच इन्द्रियगोचर विषय पंच ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा ग्रहण किये जाने वाले पाँच विषय हैं शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध। यही सम्पूर्ण जगत् है।इस प्रकार? इस श्लोक में सांख्य दर्शन के प्रसिद्ध चौबीस तत्त्वों की गणना की गयी है।क्षेत्र के तत्त्वों को बताने के पश्चात्? भगवान् उसके विकारों को बताते हैं। वे विकार हैं इच्छा? द्वेष? सुख? दुख? स्थूल देह? अन्तकरण वृत्ति तथा धृति अर्थात् धैर्य। संक्षेपत केवल शरीर? इन्द्रियाँ? मन और बुद्धि ही क्षेत्र नहीं है? वरन् उसमें इन उपाधियों द्वारा अनुभूत विषय? भावनाएं और विचार भी समाविष्ट हैं।द्रष्टा से भिन्न जो कुछ भी है? वह सब दृश्य है? क्षेत्र है। इस द्रष्टा आत्मचैतन्य की दृष्टि से जो कुछ भी दृश्य? ज्ञात तथा अनुभूत वस्तु है? वह सब क्षेत्र है। इसे गीता में अत्यन्त संक्षिप्त वाक्य यह शरीर के द्वारा दर्शाया गया है।इस सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करने वाला चैतन्यस्वरूप आत्मा क्षेत्रज्ञ कहलाता है। अविद्या दशा में यह जीव? शरीर आदि क्षेत्र को ही अपना स्वरूप अर्थात् क्षेत्रज्ञ समझता है? इस कारण उसे अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का बोध कराने के लिए? सर्वप्रथम? जड़ और चेतन का विवेक कराना आवश्यक है। इसीलिए? यहाँ क्षेत्र को इतने विस्तार पूर्वक बताया गया है।अब अगले पाँच श्लोकीय प्रकरण में ज्ञान को बताया गया है जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है? यहाँ ज्ञान शब्द से तात्पर्य उस अन्तकरण से है? जो आत्मज्ञान के लिए आवश्यक गुणों से सम्पन्न हो? क्योंकि शुद्ध अन्तकरण के द्वारा ही आत्मा का अनुभव सम्भव होता है। अत? अब प्रस्तुत प्रकरण में भगवान् श्रीकृष्ण बीस गुणों को बताते हैं? जो सदाचार और नैतिक नियम हैं।वे गुण हैं

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥

amānitvam adambhitvam ahinsā kṣhāntir ārjavam āchāryopāsanaṁ śhauchaṁ sthairyam ātma-vinigrahaḥ

अर्थअमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।।

amānitvamhumblenessadambhitvamfreedom from hypocrisyahinsānon-violencekṣhāntiḥforgivenessārjavamsimplicityāchārya-upāsanamservice of the Guruśhauchamcleanliness of body and mindsthairyamsteadfastnessātma-vinigrahaḥself-control
व्याख्या

अमानित्व स्वयं को पूजनीय व्यक्ति समझना मान कहलाता है। उसका अभाव अमानित्व है।अदम्भित्व अपनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन न करने का स्वभाव।अहिंसा शरीर? मन और वाणी से किसी को पीड़ा न पहुँचाना।क्षान्ति किसी के अपराध किये जाने पर भी मन में विकार का न होना क्षान्ति अर्थात् सहनशक्ति है।आर्जव हृदय का सरल भाव? अकुटिलता।आचार्योपासना गुरु की केवल शारीरिक सेवा ही नहीं? वरन् उनके हृदय की पवित्रता और बुद्धि के तत्त्वनिश्चय के साथ तादात्म्य करने का प्रयत्न ही वास्तविक आचार्योपासना है।शौचम् शरीर? वस्त्र? बाह्य वातावरण तथा मन की भावनाओं? विचारों? उद्देश्यों तथा अन्य वृत्तियों की शुद्धि भी इस शब्द से अभिप्रेत है।स्थिरता जीवन के सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दृढ़ निश्चय और एकनिष्ठ प्रयत्न।आत्मसंयम जगत् के साथ व्यवहार करते समय इन्द्रियों तथा मन पर संयम होना।

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥

indriyārtheṣhu vairāgyam anahankāra eva cha janma-mṛityu-jarā-vyādhi-duḥkha-doṣhānudarśhanam

अर्थइन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुख में दोष दर्शन...৷৷.।।

indriya-artheṣhutoward objects of the sensesvairāgyamdispassionanahankāraḥabsence of egotismeva chaand alsojanmaof birthmṛityudeathjarāold agevyādhidiseaseduḥkhaevilsdoṣhafaultsanudarśhanamperception
व्याख्या

इन्द्रियों के विषयों के प्रति वैराग्य इसका अर्थ जगत् से पलायन करना नहीं है। विषयों के साथ रहते हुए भी मन से उनका चिन्तन न करना तथा उनमें आसक्त न होना? यह वैराग्य का अर्थ है। जो व्यक्ति विषयों से दूर भागकर कहीं जंगलों में बैठकर उनका चिन्तन करता रहता है? वह तो अपनी वासनाओं का केवल दमन कर रहा होता है? ऐसे पुरुष को भगवान् ने मिथ्याचारी कहा है।अहंकार का अभाव व्यष्टिगत जीवभाव का उदय केवल तभी होता है? जब हम शरीरादि उपाधियों के साथ तथा उनके अनुभवों के साथ तादात्म्य करते हैं। अपने शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थित होने के लिए आवश्यक पूर्व गुण यह है कि हम इस मिथ्या तादात्म्य को विचार के द्वारा नष्ट कर दें। यह प्रक्रिया भूमि जोतने के पूर्व घासपात को दूर करने के तुल्य ही है।दुखदोषानुदर्शनम् वर्तमान दशा से असन्तुष्टि ही हमें नवीन? श्रेष्ठतर और सुखद स्थिति को प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर सकती है। जब तक किसी राष्ट्र या समाज के लोगों में इस बात की जागरूकता नहीं आती है कि उनकी वर्तमान दशा अत्यन्त घृणित और दुखपूर्ण है? तब तक वे अपने दुखों को भूलकर अपने आप को ही उस दशा में जीने के अनुकूल बना लेते हैं। यही कारण है कि प्रत्येक राजनीतिक नेता या समाज सेवक? सर्वप्रथम? लोगों को उनकी पतित और दरिद्रता की दशा का बोध कराता है। जब लोगों में इस बात की जागरूकता आ जाती है? तब वे उत्साह के साथ? श्रेष्ठतर आनन्द और समृद्ध जीवन जीने का प्रयत्न करने को तत्पर हो ज्ााते हैं।यही पद्धति सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में भी प्रयोज्य है। जब तक साधक को अपने आन्तरिक व्यक्तित्व के बन्धनों का पूर्णतया भान नहीं होता है? तब तक वह स्वनिर्मित दुख के गर्त में पड़ा रहता है? और उससे बाहर आने के लिए कदापि प्रयत्न नहीं करता है। मानव शरीर और मन में अपने आप को परिस्थिति के अनुकूल बना लेने की अद्भुत् क्षमता है। वे अत्यन्त घृणित अवस्था को भी स्वीकार कर लेते हैं यहाँ तक कि उसी में सुख भी अनुभव करने लगते हैं।इसलिए? यहाँ साधक को अपनी वर्तमान दशा के दोषों को विचारपूर्वक देखने का उपदेश दिया गया है। एक बार जब वह अपनी बद्धावस्था को पूर्णतया समझ लेगा? तब उसमें आवश्यक आध्यात्मिक जिज्ञासा? बौद्धिक सार्मथ्य? मानसिक उत्साह और शारीरिक साहस आदि समस्त गुण आ जायेंगे? जिनके द्वारा वह आध्यात्मिक पूर्णता की उपलब्धि सरलता से कर सकेगा।जन्ममृत्युजराव्याधि में दोष का दर्शन प्रत्येक शरीर को ये विकार प्राप्त होते हैं। इनमें से प्रत्येक विकार नयेनये दुखों का स्रोत है। इन समस्त विकारों से प्राप्त होने वाले दुखों के प्रति जागरूकता आ जाने पर वह पुरुष उनसे मुक्ति पाने के लिए अधीर हो जाता है। दुख के विरुद्ध विद्रोह का यह भाव ही वह प्रेरक तत्त्व है? जो साधकों को पूर्णत्व के शिखर तक शीघ्रता से पहुँचने के लिए प्रेरित करता है।आगे कहते हैं

असक्ितरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥

asaktir anabhiṣhvaṅgaḥ putra-dāra-gṛihādiṣhu nityaṁ cha sama-chittatvam iṣhṭāniṣhṭopapattiṣhu

अर्थआसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता।।

asaktiḥnon-attachmentanabhiṣhvaṅgaḥabsence of cravingputrachildrendāraspousegṛiha-ādiṣhuhome, etcnityamconstantchaandsama-chittatvameven-mindednessiṣhṭathe desirableaniṣhṭaundesirableupapattiṣhuhaving obtained
व्याख्या

असक्ति अर्जित की हुयी वस्तुओं से होने वाली सामान्य प्रीति को सक्ति अर्थात् संग कहते हैं। उसका अभाव असक्ति कहलाता है। हमें जो दुख होता है? वह विषयों के कारण नहीं? हमारे उसके साथ के मानसिक संग के कारण होता है। जैसै? अग्नि स्वयं किसी को नहीं जला सकती? जब तक कि कोई उसे स्पर्श न करे।पुत्र? भार्या और गृहादिक में अनभिष्वंग अति स्नेह को अभिष्वंग कहते हैं। अत उसका अभाव ही अनभिष्वंग कहलाता है। जब किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति सामान्य प्रीति बढ़कर आसक्ति का रूप ले लेती है? तब उसे अभिष्वंग कहते हैं। इस आसक्ति का लक्षण है यह है कि मनुष्य को अपनी प्रिय वस्तु या व्यक्ति के साथ इतना तादात्म्य हो जाता है कि उनके सुखदुख उसे अपने ही अनुभव होते हैं। इसका स्पष्ट उदाहरण है पुत्र के प्रति माता की आसक्ति का। इस प्रकार की आसक्ति के कारण व्यक्ति के मन में सदा विक्षेप बना रहता है और वह कार्य करने में भी अकुशल हो जाता है।हमें अपने आन्तरिक व्यक्तित्व के चारों ओर विवेक की ऐसी दीवार खड़ी करनी चाहिये कि ये सभी विक्षेप हमसे दूर रहें और मन का सन्तुलन सदा बना रहे जिसके बिना किसी प्रकार की प्रगति या समृद्धि कदापि संभव नहीं होती।प्रिय और अप्रिय परिस्थितियों में चित्त की समता को सतत अभ्यास करते रहने से प्राप्त किया जा सकता है। यदि मनुष्य अपनी मूढ़ प्रीति और आसक्ति के बन्धनों से मुक्त हो जाये? तो उसे अपने में ही अतिरिक्त शक्ति का भण्डार प्राप्त होता है? जिसका उसे सही दिशा में सदुपयोग करना चाहिये? अन्यथा वही शक्ति आत्मघातक सिद्ध हो सकती है।वह सही दिशा क्या है इसे अगले श्लोक में बताते हैं

मयि चानन्ययोगेन भक्ितरव्यभिचारिणी।विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥

mayi chānanya-yogena bhaktir avyabhichāriṇī vivikta-deśha-sevitvam aratir jana-sansadi

अर्थअनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि।।

mayitoward mechaalsoananya-yogenaexclusively unitedbhaktiḥdevotionavyabhichāriṇīconstantviviktasolitarydeśhaplacessevitvaminclination foraratiḥaversionjana-sansadifor mundane society
व्याख्या

संभवत अर्जुन के क्रियाशील स्वभाव से बाध्य होकर या फिर भगवान् श्रीकृष्ण के समाज सुधारक होने से? जो कुछ भी हो? भगवद्गीता हमें जिस रूप में उपलब्ध है? वह आत्मोपलब्धि के विषय का अत्यन्त व्यावहारिक शास्त्रग्रन्थ है। जब कभी भी गीताचार्य अपने शिष्य को किसी मानसिक या बौद्धिक गुणविशेष को विकसित करने का उपदेश देते हैं तब तत्काल ही वे उसके सम्पादन का व्यावहारिक अभ्यसनीय उपाय भी बताते हैं।यदि कोई साधक पूर्व के तीन श्लोकों में वणिर्त गुणों का स्वयं में विकास करता है? तो वह निश्चित ही अपने आन्तरिक और बाह्य जीवन व्यवहार में बहुत अधिक शक्ति का संचय कर सकता है। यह श्लोक बताता है कि किस प्रकार इस अतिरिक्त शक्ति का वह सही दिशा में सदुपयोग करे? जिससे कि आत्मविकास में उसका लाभ मिल सके।अनन्ययोग से मुझ में अव्यभिचारिणी भक्ति अनन्यता का अर्थ है मन का ध्येय विषय में एकाग्र हो जाना। इसके लिये विजातीय वृत्तियों का सर्वथा त्याग करके ध्येयविषयक वृत्ति को ही बनाये रखने का अभ्यास आवश्यक होता है। ध्यान या भक्ति में इस स्थिरता के नष्ट होने के लिए दो कारण हो सकते हैं या तो साधक के मन की अस्थिरता या फिर ध्येय का ही निश्चित नहीं होना जब तक ये दोनों ही स्थिर नहीं होते? भक्ति या ध्यान सफल नहीं हो सकता। यदि हमारी भक्ति एक मूर्ति से अन्य मूर्ति में परिवर्तित होती रहती है तो एकाग्रता कैसे सम्भव हो सकती है इसलिये? यहाँ कहा गया है कि योग में प्रगति और विकास के लिए अनन्य योग से परमात्मा की भक्ति आवश्यक है। यहाँ लक्ष्य की स्थिरता के विषय में कहा गया है।अविभाजित ध्यान तथा मन में उत्साह के होने पर पर भक्ति में एकाग्रता आना सरल कार्य हो जाता है। अन्यथा मन ही विद्रोह करके स्वकल्पित मिथ्या आकर्षणों में भटकता रह सकता है।ध्यानाभ्यास के समय मन के अत्यन्त निम्न और घृणित कोटि के विषयों में विचरण करने के विषय में जिस प्रतीकात्मक वाक्य का प्रयोग भगवान् ने किया है उससे ही ज्ञात होता है कि वे मन के इस विचरण की कितनी कठोरता से निन्दा करना चाहते हैं। वे कहते हैं कि साधक की परम्परा में अव्यभिचारी भक्ति होनी चाहिये। व्याभिचार का अर्थ है किसी तुच्छ लाभ के लिये अपनी क्षमताओं एवं सुन्दरता का विक्रय करना। ईश्वर में समाहित चित्त ही ध्यान में एकनिष्ठ हो सकता है। यहाँ अव्यभिचारी शब्द से साधक को यह चेतावनी दी जाती है कि उसका ध्यान अनेक देवीदेवताओं अथवा विचारों में न भटके? वरन् चुने हुये ध्येय के साथ एकनिष्ठ रहे।इस प्रकार का सुगठित जीवन तथा ध्यान की स्थिरता तब सम्भव होती है? जब साधक उनके अनुकूल वातावरण में रहता है। इस बात को इन दो गुणों से दर्शाया गया है (क) एकान्तवास का सेवन? तथा? (ख) जनसमुदाय में अरुचि। मनुष्य का मन जितना अधिक शुद्ध एवं भोगों से विरत होता जाता है? उसकी ज्ञान की जिज्ञासा उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है। स्वाभाविक ही है कि फिर वह ज्ञान की पिपासा को शान्त करने के लिए लोगों के समुदाय से दूर जहाँ ज्ञान उपलब्ध हो वहाँ चला जाता है। यह बात कवि? लेखक? वैज्ञानिक आदि लोगों के विषय में भी सत्य है। इन सबको फिर एक ही लक्ष्य दिखाई देता है और इन्हें लौकिक बातों में कोई रुचि नहीं रह जाती।यहाँ जिस समुदाय में अरुचि रखने को कहा गया है वह असंस्कृत? असभ्य? भोगों में आसक्त जनों के समुदाय के सम्बन्ध में कहा गया है? न कि सन्त पुरुषों के संग से। सत्संग तो ज्ञान का साधक होता है बाधक नहीं। एकान्तवास? तथा जनसमुदाय से अरुचि का कोई व्यक्ति यह विपरीत अर्थ न समझे कि यहाँ जगत् से पलायन या समाज से द्वेष करने को कहा,गया है।

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा॥

adhyātma-jñāna-nityatvaṁ tattva-jñānārtha-darśhanam etaj jñānam iti proktam ajñānaṁ yad ato ’nyathā

अर्थअध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है।।

adhyātmaspiritualjñānaknowledgenityatvamconstancytattva-jñānaknowledge of spiritual principlesarthafordarśhanamphilosophyetatall thisjñānamknowledgeitithusproktamdeclaredajñānamignoranceyatwhatataḥto thisanyathācontrary
व्याख्या

ज्ञान को दर्शाने वाले इस प्रकरण के इस अन्तिम श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण दो और गुणों को बताते हैं अध्यात्म ज्ञान में स्थिरता? तथा तत्त्वज्ञानार्थ का दर्शन।आत्मज्ञान में स्थिरता आत्मज्ञान जीवन में अनुभव करके जीने का विषय है? केवल बुद्धि से सीखने का नहीं। यदि आत्मा ही एक सर्वव्यापी पारमार्थिक सत्य है? तब साधक को अपने व्यक्तित्व के सभी स्तरों पर आत्मदृष्टि से रहने का प्रयत्न करना चाहिये। स्वयं को आत्मा जानकर? उसी बोध में स्थित होकर साधक को अपने जीवन के समस्त व्यवहार करने चाहिये। इसके लिये सतत अभ्यास की आवश्यकता होती है।तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् अमानित्वादि गुणों का विकास जिसके निमित्त करने को कहा गया है? वह है तत्त्वज्ञान और उस तत्त्वज्ञान के अर्थ का जो लक्ष्य है ? उसका दर्शन करना। संसार बन्धनों की उपरामता अर्थात् मोक्ष ही वह लक्ष्य है। लक्ष्य का सतत स्मरण करते रहने से साधनाभ्यास में प्रवृत्ति और उत्साह बना रहता है? जो लक्ष्यप्राप्ति में साहाय्यकारी सिद्ध होता है। इस प्रकरण में इन बीस गुणों को ही ज्ञान कहा गया है? क्योंकि ये समस्त गुण आत्मसाक्षात्कार के लिए अनुकूल हैं।उपर्युक्त ज्ञान के द्वारा जानने योग्य ज्ञेय वस्तु क्या है इसके उत्तर में कहते हैं

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते।अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥

jñeyaṁ yat tat pravakṣhyāmi yaj jñātvāmṛitam aśhnute anādi mat-paraṁ brahma na sat tan nāsad uchyate

अर्थमैं उस ज्ञेय वस्तु को स्पष्ट कहूंगा जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त करता है। वह ज्ञेय है - अनादि, परम ब्रह्म, जो न सत् और न असत् ही कहा जा सकता है।।

jñeyamought to be knownyatwhichtatthatpravakṣhyāmiI shall now revealyatwhichjñātvāknowingamṛitamimmortalityaśhnuteone achievesanādibeginninglessmat-paramsubordinate to mebrahmaBrahmannanotsatexistenttatthatnanotasatnon-existentuchyateis called
व्याख्या

पूर्व के पाँच श्लोकों में ज्ञान को बताने के पश्चात्? अब भगवान् ज्ञेय वस्तु को बताने का वचन देते हैं। परन्तु? प्रथम वे इसे जानने का फल बताते हैं? जिसकी कुछ लोग आलोचना करते हैं। किन्तु? यह आलोचना उपयुक्त नहीं है? क्योंकि ज्ञान के फल की स्तुति करने से उसके साधन के अनुष्ठान में प्रवृत्ति? रुचि और उत्साह उत्पन्न होता है।जिसे जानकर? साधक अमृत्व को प्राप्त होता है जड़ पदार्थ का धर्म है मरण। इन जड़ उपाधियों के साथ तादात्म्य के कारण अमरणधर्मा आत्मा इनसे अवच्छिन्न हुआ व्यर्थ ही मिथ्या परिच्छिन्नता और मरण का अनुभव करता है। आत्मानात्मविवेक के द्वारा अपने आत्मस्वरूप को पहचान कर उसमें दृढ़ स्थिति प्राप्त करने से मरण का यह मिथ्या भय समाप्त हो जाता है और अमृतस्वरूप आत्मा के परमानन्द का अनुभव होता है। ऐसे श्रेष्ठतम लक्ष्य को पाने के लिए पूर्व वर्णित गुणों के द्वारा हमको अपने अन्तकरण को साधन सम्पन्न बनाना चाहिए।अनादिमत्परं ब्रह्म किसी नित्य अधिष्ठान के सन्दर्भ में ही किसी वस्तु के अनादि अर्थात् प्रारम्भ की कल्पना और गणना की जा सकती है। जो परमात्मा काल का भी अधिष्ठान है? उसकी उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती।ब्रह्म को न सत् कहा जा सकता है और न असत्। सामान्य दृष्टि से जो वस्तु प्रमाणगोचर होती है? उसे हम सत् कहते हैं। परन्तु जो चैतन्य द्रष्टा है? वह कभी भी इन्द्रिय? मन और बुद्धि का ज्ञेय नहीं हो सकता? इसलिए कहा गया है कि वह सत् नहीं है। चैतन्य तत्त्व समस्त वस्तुओं का प्रकाशक होते हुए स्वयं समस्त अनुभवों के अतीत है।यदि वह सत् नहीं है? तो हम उसे असत् समझ लेगें? इसलिए यहाँ उसका भी निषेध किया गया है। अत्यन्त अभावरूप वस्तु को असत् कहते हैं? जैसे आकाश? पुष्प? बन्ध्यापुत्र इत्यादि। ब्रह्म को असत् नहीं कह सकते. क्योंकि वह सम्पूर्ण जगत् का कारण है। उसका ही अभाव होने पर जगत् की सिद्धि कैसे हो सकती है इसलिए? उपनिषदों में उसे नेति? नेति (यह नहीं) की भाषा में निर्देशित किया गया है।शंकराचार्य जी कहते हैं? जाति और गुण से रहित होने के कारण ब्रह्म को सत् नहीं कहा जा सकता? और समस्त शरीरों में चैतन्य रूप में व्यक्त होने के कारण असत् भी नहीं कहा जा सकता है।सत् अर्थात् वस्तु है यह वृत्ति तथा असत् अर्थात् वस्तु नहीं है यह वृत्ति भी बुद्धि में ही उठती है। जो आत्मचैतन्य इन दोनों वृत्तियों का प्रकाशक है? वह दोनों से ही भिन्न है। इस तथ्य की पुष्टि यहाँ पर की गयी है।उपर्युक्त कथन से कोई व्यक्ति उसे शून्य न समझ ले? इसलिए समस्त प्राणियों की उपाधियों के द्वारा ब्रह्म के अस्तित्व का बोध कराते हुए भगवान् कहते हैं

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥

sarvataḥ pāṇi-pādaṁ tat sarvato ’kṣhi-śhiro-mukham sarvataḥ śhrutimal loke sarvam āvṛitya tiṣhṭhati

अर्थवह सब ओर हाथ-पैर वाला है और सब ओर से नेत्र, शिर और मुखवाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है; वह जगत् में सबको व्याप्त करके स्थित है।।

sarvataḥeverywherepāṇihandspādamfeettatthatsarvataḥeverywhereakṣhieyesśhiraḥheadsmukhamfacessarvataḥeverywhereśhruti-mathaving earslokein the universesarvameverythingāvṛityapervadestiṣhṭhatiexists
व्याख्या

सर्वत पाणिपादम् उत्तम अधिकारी तो आत्मा के निर्गुण स्वरूप को पहचान लेता है? परन्तु मध्यम अधिकारी को अज्ञात और अव्यक्त का बोध? ज्ञात और व्यक्त वस्तुओं के द्वारा कराने में सरलता होती है। यद्यपि प्रणियों के हाथ और पैर जड़ तत्त्व के बने हैं? तथापि वे चेतन और कार्यक्षम प्रतीत हो रहे हैं। इन सबके पीछे इन्हें चेतनता प्रदान करने वाला आत्मतत्त्व सर्वत्र एक ही है। इसीलिए यहाँ कहा गया है कि ब्रह्म समस्त हाथ और पैरों को धारण करने वाला है।इसी प्रकार? समस्त नेत्र? शिर और मुख भी इस चैतन्य के कारण ही स्वव्यापार करने में समर्थ होते हैं। इसलिए आत्मा का निर्देश इस प्रकार करते हैं कि वह सब ओर नेत्र? शिर और मुख वाला है। चैतन्य से धारण किये होने पर ही प्राणियों में विषय ग्रहण तथा विचार करने की क्रियाएं होती रहती हैं। अत चैतन्य ब्रह्म सब ओर से श्रोत वाला कहा गया है।यह सबको व्याप्त करके स्थित है यहाँ जब आत्मा के उपाधियुक्त स्वरूप और प्रभाव को दर्शाया गया है? तो कोई यह मान सकता है कि जहाँ उपाधियाँ हैं? वहीं पर आत्मा का अस्तित्व है और अन्यत्र नहीं। इस प्रकार की विपरीत धारणा को दूर करने के लिए यहाँ पर अत्यन्त उचित ही कहा गया है कि वह परम सत्य सबको व्याप्त करके स्थित है। यह श्लोक वैदिक साहित्य से परिचित विद्यार्थियों को ऋग्वेद के प्रसिद्ध पुरुषसूक्तम् का स्मरण कराता है।भगवान् आगे कहते हैं

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥

sarvendriya-guṇābhāsaṁ sarvendriya-vivarjitam asaktaṁ sarva-bhṛich chaiva nirguṇaṁ guṇa-bhoktṛi cha

अर्थवह समस्त इन्द्रियों के गुणो (कार्यों) के द्वारा प्रकाशित होने वाला, परन्तु (वस्तुत:) समस्त इन्द्रियों से रहित है; आसक्ति रहित तथा गुण रहित होते हुए भी सबको धारणपोषण करने वाला और गुणों का भोक्ता है।।

sarvaallindriyasensesguṇasense-objectsābhāsamthe percieversarvaallindriyasensesvivarjitamdevoid ofasaktamunattachedsarva-bhṛitthe sustainer of allchayetevaindeednirguṇambeyond the three modes of material natureguṇa-bhoktṛithe enjoyer of the three modes of material naturechaalthough
व्याख्या

अनिर्देश्य परम ब्रह्म का आत्मरूप से निर्देश करने की एक विधि यह है कि उसे विरोधाभास की भाषा में इंगित करे। एक वाक्य को सुनकर जब बुद्धि उसके विषय में कोई धारणा बना लेती है? तब दूसरा वाक्य उस धारणा का खण्डन कर देता है। इस प्रकार स्वाभाविक है कि वह बुद्धि कल्पना शून्य होकर अपने निर्विकल्प स्वरूप के अनुभव में स्थित हो जाती है। यह विरोधाभास की भाषा आध्यात्मिक ग्रन्थों की विशेषता है। परन्तु शास्त्रों का सतही अध्ययन करने वाले लोग? शास्त्रोपदेश की विधि के मर्म को न समझ कर? अपने अविश्वास या नास्तिकता को न्यायोचित सिद्ध करने के लिए इस प्रकार के श्लोक उद्धृत करते हैं। यह श्लोक उपनिषद् से लिया गया है।आत्मचैतन्य के सम्बन्ध से ही समस्त इन्द्रियाँ अपनाअपना व्यापार करती हैं। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि उनसे अवच्छिन्न आत्मा ही कार्य करता है तथा वह इन इन्द्रियों से युक्त है। किन्तु विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इन्द्रियाँ भौतिक पदार्थ हैं और नाशवान भी हैं? जबकि उनमें व्यक्त होकर उन्हें चेतनता प्रदान करने वाला आत्मा सनातन और अविकारी है। संक्षेप में? उपाधियों की दृष्टि से आत्मा उनका धारक प्रतीत होता है? किन्तु स्वस्वरूप से वह सर्वेन्द्रिय विवर्जित है।विद्युत् शक्ति न तो बल्ब का प्रकाश है और न हीटर की उष्णता तथापि इन उपकरणों में व्यक्त होकर विद्युत् ही प्रकाश और उष्णता के रूप में प्रतीत होती है।वह असक्त किन्तु सबको धारण करने वाला है ब्रह्म को अनासक्त धारक के रूप में समझ पाना प्रारम्भिक विद्यार्थियों के लिए सरल नहीं है। तथापि अपने देश के महान् आचार्यों द्वारा इसे दृष्टान्तों और उपमाओं के द्वारा समझाने का प्रयत्न किया गया है। कोई भी तरंग सम्पूर्ण समुद्र नहीं है समस्त तरंगे सम्मिलित रूप में भी समुद्र नहीं है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि समुद्र उन तरंगों में आसक्त है? क्योंकि वह तो उन सबका स्वरूप ही है। असक्त होते हुए भी उन सबको धारण करने वाला समुद्र के अतिरिक्त और कोई नहीं होता। कपास सभी वस्त्रों में है? किन्तु वस्त्र कपास नहीं है। तथापि? कपास ही वस्त्र को धारण करने वाला होता है। इसी प्रकार? विविधता की यह सृष्टि चैतन्य ब्रह्म नहीं है? परन्तु ब्रह्म ही सर्वभृत है।वह निर्गुण? किन्तु गुणों का भोक्ता है मनुष्य का मन सदैव सत्त्व? रज और तम इन तीन गुणों के प्रभाव में कार्य करता है। इन तीनों गुणों के प्रभावों को आत्मा सदा प्रकाशित करता रहता है। प्रकाशक प्रकाश्य के धर्मों से मुक्त होने के कारण आत्मा गुणरहित है। किन्तु एक चेतन मन ही इन गुणों का अनुभव कर सकता है? इसलिए यहाँ कहा गया है कि आत्मा स्वयं निर्गुण होते हुए भी मन की उपाधियों के द्वारा गुणों का भोक्ता भी है।इस प्रकार इस श्लोक में आत्मा का सोपाधिक (उपाधि सहित) और निरुपाधिक (उपाधि रहित) इन दोनों दृष्टिकोणों से निर्देश किया गया है।इतना ही नहीं? वरन् एक व्यष्टि उपाधि में व्यक्त आत्मा ही सर्वत्र समस्त प्राणियों में स्थित है

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥

bahir antaśh cha bhūtānām acharaṁ charam eva cha sūkṣhmatvāt tad avijñeyaṁ dūra-sthaṁ chāntike cha tat

अर्थ(वह ब्रह्म) भूत मात्र के अन्तर्बाह्य स्थित है; वह चर है और अचर भी। सूक्ष्म होने से वह अविज्ञेय है; वह सुदूर और अत्यन्त समीपस्थ भी है।।

bahiḥoutsideantaḥinsidechaandbhūtānāmall living beingsacharamnot movingcharammovingevaindeedchaandsūkṣhmatvātdue to subtletytatheavijñeyamincomprehensibledūra-sthamvery far awaychaandantikevery nearchaalsotathe
व्याख्या

परमात्मा की सर्वव्यापकता को यहाँ उपनिषदों की अननुकरणीय शैली में इंगित किया गया है।वह भूतमात्र के अन्तर्बाह्य है सभी व्यष्टि उपाधियों में व्यक्त चेतन तत्त्व सर्वव्यापी है। अन्तर्बाह्य से तात्पर्य है कि जहाँ शरीरादि उपाधियाँ हैं? वहाँ तो वह विशेष रूप से व्यक्त हुआ विद्यमान रहता ही है? परन्तु जहाँ कोई उपाधि नहीं है वहाँ भी वह केवल सत्य रूप से स्थित रहता है। जिस प्रकार? जहाँ रेडियो है वहाँ ध्वनि तरंगों का अस्तित्व स्पष्ट ज्ञात होता है? परन्तु जहाँ रेडियो नहीं है? वहाँ उन तरंगों का अभाव नहीं कहा जा सकता।वह चर है और अचर भी जो अपनी स्वेच्छा से विचरण करता रहता है? वह चर प्राणी है? तथा गतिहीन वस्तु अचर वर्ग में आती है। इस वाक्य का अर्थ इस प्रकार भी किया जाता है कि आत्मतत्त्व अचर होते हुये भी चर है इसका तात्पर्य यह है कि आत्मा सर्वव्यापी होने से स्वस्वरूप की दृष्टि से अचर है? परन्तु वही आत्मा गतिमान् उपाधियों से अवच्छिन्नसा होकर चरवत् प्रतीत होता है। उदाहरणार्थ? किसी गतिमान वाहन में कोई व्यक्ति स्वयं अपने स्थान पर बैठा हुआ (अचर) ही मीलों लम्बी यात्रा तय कर लेता है इस प्रकार? हमारे व्यक्तित्व का सारभूत तत्त्व एक? सनातन व परिपूर्ण है जो अन्तर्बाह्य सर्वत्र व्याप्त है। उसके बिना कोई भी क्रिया संभव नहीं है ? इसलिये वह सभी क्रियाओं में विद्यमान है। वह सत्स्वरूप से सर्वत्र ही स्थित है। तब? फिर क्या कारण है कि हम उसे इन्द्रियों द्वारा नहीं देख सकते? या मन और बुद्धि से अनुभव नहीं कर पाते भगवान् कहते हैं कि? वह अत्यन्त सूक्ष्म होने से अविज्ञेय है।गुणवान् वस्तु स्थूल होती है। जिस वस्तु में अधिक गुण होते हैं वह उतनी ही अधिक स्थूल होती है और एकाधिक इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण की जा सकती है। जैसे? पृथ्वी का ज्ञान पाँचों इन्द्रियों के द्वारा होता है। जबकि वायु का केवल श्रोत्र और स्पर्शेन्द्रिय से। अत पृथ्वी स्थूलतम तत्त्व है और आकाश में केवल शब्द गुण होने से वह सूक्ष्मतम है।कार्य की अपेक्षा कारण सदैव सूक्ष्म होता है। आकाश तत्त्व सृष्ट वस्तु होने से उसका भी कारण होना आवश्यक है। आकाश का भी कारण वह नित्य अधिष्ठान ब्रह्म है जिससे पंच महाभूतों की उत्पत्ति होती है। स्वाभविक ही है कि वह ब्रह्म आकाश से भी सूक्ष्म होने के कारण हमारे उपलब्ध प्रमाणों के द्वारा दृश्य रूप में नहीं जाना जा सकता है वह अविज्ञेय है।वह दूरस्थ और समीपस्थ है एक साकार परिच्छिन्न वस्तु को किसी स्थान विशेष पर यहाँ या वहाँ स्थित बताया जा सकता है। उन वस्तुओं के द्रष्टा की स्थिति से उनकी दूरी नापी जाकर उन्हें दूरस्थ या समीपस्थ कहा जा सकता है। परन्तु जो सर्वव्यापी है वह एक ही समय यहाँ होगा और वहाँ भी होगा और इसलिये वह दूरस्थ और समीपस्थ भी है। इन दो शब्दों की व्याख्या इस प्रकार भी की जा सकती है कि परमात्मा सर्व नामरूपों की उपाधियों से मुक्त दूरस्थ है किन्तु वही परमात्मा इन नामरूपों में भी समीपस्थ है। श्रीशंकराचार्य अपने भाष्य में लिखते हैं कि यह आत्मा अज्ञानियों को अत्यन्त दूर स्थित हुआ भासता है? जबकि ज्ञानी जन तो उसे अत्यन्त समीप से आत्मरूप से ही अनुभव करते हैं।संक्षेप में? विरोधाभास की भाषा की सुन्दरता से युक्त यह श्लोक उन पाठकों को सहसा जगा देता है? जो केवल बौद्धिक ज्ञान से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं। यह श्लोक उन्हें मनन या ध्यान के द्वारा परमात्मा के सर्वव्यापक एवं सर्वातीत स्वरूप का साक्षात् अनुभव करने के लिए प्रेरित करता है।इसी ज्ञेय के विषय में भगवान् आगे कहते है

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥

avibhaktaṁ cha bhūteṣhu vibhaktam iva cha sthitam bhūta-bhartṛi cha taj jñeyaṁ grasiṣhṇu prabhaviṣhṇu cha

अर्थऔर वह अविभक्त है, तथापि वह भूतों में विभक्त के समान स्थित है। वह ज्ञेय ब्रह्म भूतमात्र का भर्ता, संहारकर्ता और उत्पत्ति कर्ता है।।

avibhaktamindivisiblechaalthoughbhūteṣhuamongst living beingsvibhaktamdividedivaapparentlychayetsthitamsituatedbhūta-bhartṛithe sustainer of all beingschaalsotatthatjñeyamto be knowngrasiṣhṇuthe annihilatorprabhaviṣhṇuthe creatorchaand
व्याख्या

यद्यपि विद्युत् सर्वत्र विद्यमान है? तथापि प्रकाश के रूप में वह केवल बल्ब में ही प्रकट होती है। उसी प्रकार आत्मा सर्वगत होते हुए भी जहाँ उपाधियाँ हैं वहीं पर विशेष रूप से प्रकट होता है। एक ही व्यापक आकाश घट और मठ की उपाधियों से घटाकाश और मठाकाश के रूप में प्रतीत होता है।पूर्व के अध्यायों में भी अनेक स्थलों पर वर्णन किया जा चुका है कि किस प्रकार विश्वाधिष्ठान परमात्मा विश्व की उत्पत्ति? स्थिति और संहार का कर्ता है। यहाँ मिट्टी? स्वर्ण? समुद्र और जाग्रतअवस्था के मन के दृष्टान्त स्मरणीय हैं? जो क्रमश घट? आभूषण? तरंग और स्वप्न की उत्पत्ति? स्थिति और लय के कारण होते हैं।यह ज्ञेय वस्तु है। प्रस्तुत प्रकरण के श्लोकों में उस ज्ञेय वस्तु का निर्देशात्मक वर्णन किया गया है? जिसे आत्मरूप से जानने के लिए अमानित्वादि गुणों के पालन से अन्तकरण को सुपात्र बनाने का उपदेश दिया गया था।आत्मतत्त्व हमारे अन्तर्बाह्य सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी यदि अनुभव का विषय नहीं बनता हो? तो वह अन्धकारस्वरूप होगा। ऐसी शंका प्राप्त होने पर कहते हैं कि ऐसा नहीं है? क्योंकि

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥

jyotiṣhām api taj jyotis tamasaḥ param uchyate jñānaṁ jñeyaṁ jñāna-gamyaṁ hṛidi sarvasya viṣhṭhitam

अर्थ(वह ब्रह्म) ज्योतियों की भी ज्योति और (अज्ञान) अन्धकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञान (चैतन्यस्वरूप) ज्ञेय और ज्ञान के द्वारा जानने योग्य (ज्ञानगम्य) है। वह सभी के हृदय में स्थित है।।

jyotiṣhāmin all luminarieapiandtatthatjyotiḥthe source of lighttamasaḥthe darknessparambeyonduchyateis said (to be)jñānamknowledgejñeyamthe object of knowledgejñāna-gamyamthe goal of knowledgehṛidiwithin the heartsarvasyaof all living beingsviṣhṭhitamdwells
व्याख्या

ब्रह्म ही वह एक चैतन्यस्वरूप प्रकाश है? जिसके द्वारा सभी बौद्धिक ज्ञान अन्तर्प्रज्ञा और अनुभव प्रकाशित होते हैं। उसके कारण ही हमें अपने विविध ज्ञानों तथा अनुभवों का बोध या भान होता है? इसलिए उसकी तुलना प्रकाश या ज्योति से की जाती है। केवल हमारे नेत्र के समक्ष होने से ही बाह्य वस्तुओं का हमें दर्शन नहीं हो सकता वरन् किसी बाह्य प्रकाश से उनका प्रकाशित होना भी आवश्यक होता है। इस लौकिक अनुभव को दृष्टान्त स्वरूप मानें? तो यह भी स्वीकार करना होगा कि हमारी आन्तरिक भावनाओं और विचारों को भी प्रकाशित करने वाला कोई अन्तर्प्रकाश होना चाहिए? अन्यथा इन वृत्तियों का हमें बोध ही नहीं हो सकता था। अन्तकरण की वृत्तिय्ाों के इस प्रकाशक को ही स्वयं प्रकाश आत्मा? या आत्मज्योति कहा जाता है। इस चैतन्य को प्रकाश या ज्योति कहना आध्यात्मिक शास्त्र की परम्परा है।वेदान्त अध्ययन के प्रारम्भिक काल में? शास्त्रीय भाषा से अनभिज्ञ होने के कारण? जिज्ञासु साधकगण प्रकाश शब्द से लौकिक प्रकाश ही समझते हैं। परन्तु यह धारणा यथार्थ नहीं है? क्योंकि लौकिक प्रकाश तो दृश्यवर्ग में आता है? जबकि आत्मा तो सर्वद्रष्टा है। अत? दृश्यप्रकाश आत्मा नहीं हो सकता और न आत्मा इस प्रकाश के समान हो सकता है। इसलिए? यह आवश्यक हो जाता है कि गुरु? इस आत्मप्रकाश या आत्मज्योति जैसे शब्दों का वास्तविक तात्पर्य स्पष्ट करें।ज्योतियों की ज्योति द्रष्टा को लक्षित करने के लिए सर्वप्रथम सम्पूर्ण दृश्यवर्ग का निषेध करना होगा? अर्थात् वे आत्मा नहीं हैं? यह सिद्ध करना होगा। प्रकाश के जो स्रोत सूर्य? चन्द्रमा? तारागण? विद्युत् और अग्नि हमें ज्ञात हैं? उनमें किसी में भी आत्मा को प्रकाशित करने की सार्मथ्य नहीं है। उसके समक्ष ये सब निष्प्रभ हो जाते हैं। इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण उस आत्मा को ज्योतियों की ज्योति कहते हैं? जो सभी लौकिक दृश्य ज्योतियों को भी प्रकाशित करती है स्वयं प्रकाश कहे जाने वाले इस सूर्य का हमें भान तक नहीं होता? यदि चैतन्यतत्त्व इसे प्रकाशित न कर रहा होता। संसार के सुख और दुख से हम केवल तभी प्रभावित होते हैं जब हमें उनका भान होता है। और यह भान केवल चैतन्य के प्रकाश से ही सम्भव है। इसलिए? चैतन्य को सम्पूर्ण दृश्य वर्ग का प्रकाशक कहा गया है।वह अन्धकार के परे है इतना अधिक स्पष्ट करने पर भी? लौकिक प्रकाश के ज्ञान का संस्कार शिष्य की बुद्धि में अत्यन्त दृढ़ होने के कारण वह फिर उसे प्रकाश की सापेक्ष धारणा के रूप में ही ग्रहण करता है। हम बाह्य प्रकाश को अन्धकार के विरोधी के रूप में ही जानते और समझते हैं। सूर्य के लिए प्रकाश शब्द का कोई अर्थ नहीं है? क्योंकि सूर्य को अन्धकार ज्ञात ही नहीं है अत? आत्मा के पारमार्थिक चैतन्यस्वरूप को दर्शाने के लिए यहाँ कहा गया है कि वह अन्धकार की कल्पना के भी परे है।यह चैतन्य का प्रकाश ऐसा सूक्ष्म है कि वह प्रकाश और अन्धकार दोनों को ही प्रकाशित करता है। उसका किसी से कोई विरोध नहीं है। भगवान् के इस कथन का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि आत्मा वह प्रकाश है? जो हमारे अन्तकरण की ज्ञान (प्रकाश) और अज्ञान (अन्धकार) इन दोनों ही वृत्तियों का प्रकाशक है परन्तु वह स्वयं इन दोनों से ही असंस्पृष्ट रहता है।इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में तीन शब्दों ज्ञान? ज्ञेय और ज्ञानगम्य के द्वारा इस आत्मा या ब्रह्म का ही निर्देश किया गया है। वह ब्रह्म ज्ञान अर्थात् चैतन्यस्वरूप है ब्रह्म ही जानने योग्य ज्ञेय वस्तु है? क्योंकि उसके ज्ञान से ही संसार निवृत्ति हो सकती है। यह ब्रह्म ज्ञानगम्य है अर्थात् अमानित्वादि गुणों से सम्पन्न शुद्ध अन्तकरण के द्वारा अनुभव गम्य है।वह सबके हृदय में स्थित है यदि कोई ऐसा अनन्तस्वरूप चैतन्य तत्त्व है? जो सर्वाभासक है और जिसके बिना जीवन का कोई अस्तित्व ही नहीं है? तो निश्चित ही वह जानने योग्य है। उसे प्राप्त करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य हो सकता है। उसका अन्वेषण कहाँ करें कौनसी तीर्थयात्रा पर हमें जाना होगा क्या हम ऐसी साहसिक यात्रा के सक्षम हैं सामान्यत? लोग ऐसे ही प्रश्न पूछते हैं? जिससे यह ज्ञात होता है कि वे आत्मा को अपने से भिन्न कोई वस्तु समझते हैं? जिसकी प्राप्ति किसी देशान्तर या कालान्तर में होने की उनकी धारणा होती है। ऐसी समस्त विपरीत धारणाओं की निवृत्ति के लिए यहाँ स्पष्ट और साहसिक घोषणा की गयी है कि वह अनन्त परमात्मा सबके हृदय में ही स्थित है।दार्शनिक दृष्टि से? हृदय शब्द का अर्थ शुद्ध मन से होता है? जो समस्त आदर्श और पवित्र भावनाओं का उदय स्थान माना जाता है। आन्तरिक शुद्धि के इस वातावरण में? जब बुद्धि उस पारमार्थिक आत्मतत्त्व का ध्यान करती है? जो सर्वातीत होते हुए सर्वव्यापक भी है? तब वह स्वयं ही आत्मस्वरूप बन जाती है। यही आत्मानुभूति है। इसीलिए? हृदय को आत्मा का निवास स्थान माना गया है। स्वहृदय में स्थित आत्मा का अनुभव ही अनन्त ब्रह्म का अनुभव है? क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है।इस प्रकरण का उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥

iti kṣhetraṁ tathā jñānaṁ jñeyaṁ choktaṁ samāsataḥ mad-bhakta etad vijñāya mad-bhāvāyopapadyate

अर्थइस प्रकार, (मेरे द्वारा) क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को संक्षेपत: कहा गया। इसे तत्त्व से जानकर (विज्ञाय) मेरा भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।

itithuskṣhetramthe nature of the fieldtathāandjñānamthe meaning of knowledgejñeyamthe object of knowledgechaanduktamrevealedsamāsataḥin summarymat-bhaktaḥmy devoteeetatthisvijñāyahaving understoodmat-bhāvāyamy divine natureupapadyateattain
व्याख्या

अब तक? गीतोपदेश में जो कुछ विवेचन किया गया है? वह वस्तुत वैदिक सिद्धांत का ही प्रतिपादन है। महाभूतों से प्रारम्भ होकर धृति पर्यन्त क्षेत्र है। अमानित्वादि से तत्त्वज्ञानार्थ दर्शन तक ज्ञान का वर्णन है। और तत्पश्चात् के श्लोकों में ज्ञेय वस्तु का निर्देश किया गया है।अब? प्रश्न यह है कि इस ज्ञान का उत्तम अधिकारी कौन है भगवान् कहते हैं? जो मेरा भक्त है? वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। परन्तु यह भक्ति केवल भावुकतापूर्ण प्रेम ही नहीं है। जिसने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विवेक द्वारा यह स्वानुभव प्राप्त किया है कि एक वासुदेव ही भूतमात्र में क्षेत्रज्ञ के रूप में विराजमान हैं? वही साधक उत्तम भक्त है जो मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ही वर्णन? अगले श्लोक में? प्रकृति और पुरुष के रूप में किया जा रहा है

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्॥

prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva viddhy anādī ubhāv api vikārānśh cha guṇānśh chaiva viddhi prakṛiti-sambhavān

अर्थप्रकृति और पुरुष इन दोनों को ही तुम अनादि जानो। और तुम यह भी जानो कि सभी विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं।।

prakṛitimmaterial naturepuruṣhamthe individual soulschaandevaindeedviddhiknowanādībeginninglessubhaubothapiandvikārāntransformations (of the body)chaalsoguṇānthe three modes of naturechaandevaindeedviddhiknowprakṛitimaterial energysambhavānproduced by
व्याख्या

इसके पूर्व सातवें अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी दो प्रकृतियों अपरा और परा का वर्णन करते हुए कहा था कि ये दोनों प्रकृतियाँ ही सृष्टि की योनि अर्थात् कारण हैं। इन दोनों का ही निर्देश यहाँ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के रूप में किया गया है।उक्त विचार को ही दूसरी शब्दावली में बताते हुए भगवान् कहते हैं कि प्रकृति (क्षेत्र) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ) दोनों ही अनादि हैं। ये दोनों ही परमात्मा के ही दो रूप हैं। परमेश्वर नित्य है? इसलिए उसके इन दो रूपों का भी अनादि होना? उचित ही है। प्रकृति और पुरुष ही परस्पर सम्बन्ध के द्वारा इस जगत् की उत्पत्ति? स्थिति और लय के कारण हैं। इस प्रकार? यद्यपि संसार के कारण ये दोनों हैं? तथापि इनका अधिष्ठान ज्योतियों की ज्योतिस्वरूप ब्रह्म ही है।भगवान् आगे कहते हैं कि समस्त देह? इन्द्रिय? मन और बुद्धि ये विकार और सुखदुख? मोहादिक ये गुण जिनका वर्णन गीता में ही आगे किया जाने वाला है प्रकृति से उत्पन्न होते हैं और आत्मा स्वयं अविकारी रहते हुए इन विकारों को प्रकाशित करता है।प्रकृति से उत्पन्न वे गुण और विकार क्या हैं सुनो

कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥

kārya-kāraṇa-kartṛitve hetuḥ prakṛitir uchyate puruṣhaḥ sukha-duḥkhānāṁ bhoktṛitve hetur uchyate

अर्थकार्य और कारण के उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और पुरुष सुख-दु:ख के भोक्तृत्व में हेतु कहा जाता है।।

kāryaeffectkāraṇacausekartṛitvein the matter of creationhetuḥthe mediumprakṛitiḥthe material energyuchyateis said to bepuruṣhaḥthe individual soulsukha-duḥkhānāmof happiness and distressbhoktṛitvein experiencinghetuḥis responsibleuchyateis said to be
व्याख्या

कार्य और कारण के कर्तृत्व में हेतु प्रकृति है यहाँ प्रयुक्त कार्य शब्द से ये तेरह तत्त्व सूचित किये गये हैं पंचमहाभूत? पंच ज्ञानेन्द्रियाँ? मन? बुद्धि और अहंकार। समष्टि पंचतत्त्वों के जो शब्द स्पर्शादि पंच गुण हैं? वे ही व्यष्टि में पंच ज्ञानेन्द्रियों के रूप में स्थित हैं। इसका विवेचन हम पूर्व में भी कर चुके हैं।पाँचो इन्द्रियाँ भिन्नभिन्न विषय ग्रहण करती हैं? जिनका एकत्रीकरण करना मन का कार्य है। तत्पश्चात् अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए एक ऐसे तत्त्व की आवश्यकता होती है? जो ग्रहण किये गये विषय के स्वरूप को समझकर अपनी प्रतिक्रिया को निश्चित करे। और वह तत्त्व है बुद्धि। अब? इन सब क्रियाओं विषय ग्रहण? उनके एकत्रीकरण और निर्णय में एक अहंभाव सतत बना रहता है? जैसे मैं देखता हूँ? मैं निर्णय लेता हूँ इत्यादि। यह अहंभाव ही अहंकार कहलाता है? जो आत्मा के इन इन्द्रियादि उपाधियों के साथ तादात्म्य के कारण उत्पन्न होता है। ये तेरह तत्त्व यहाँ कार्य शब्द से सूचित किये गये हैं।यह सम्पूर्ण कार्य जगत् व्यक्त है? और इनका अव्यक्त रूप ही कारण कहलाता है। ये कार्य और कारण प्रकृति ही हैं।पुरुष सुखदुख का भोक्ता है जो चेतन तत्त्व इस कार्यकारण रूप प्रकृति को प्रकाशित करता है? वह आत्मा या पुरुष है।यहाँ आत्मा को पुरुष के रूप में सुखदुख का भोक्ता कहा गया है? वह उसका औपाधिक रूप है? वास्तविक नहीं। सुख और दुख हमारे मन की प्रतिक्रियायें हैं। अनुकूल परस्थितियों में इष्ट की प्राप्ति होने पर सुख और अनिष्ट की प्राप्ति से दुख होता है। प्रत्येक अनुभव उसके अन्तिम विश्लेषण में सुख या दुख के रूप में ही निश्चित किया जाता है। चैतन्य ही इन सब अनुभवों को प्रकाशित करता है? जिसके बिना अनुभवधारा रूप यह जीवन ही सम्भव नहीं हो सकता है। इसलिए? यहाँ कहा गया है कि पुरुष सुखदुख के भोग का हेतु है। क्षेत्र की उपाधि में क्षेत्रज्ञ के रूप में कार्य कर रहा आत्मा ही संसार का भोक्ता बनता है। जो व्यक्ति सूर्य की प्रखर धूप में खड़ा रहेगा उसे सूर्य का ताप सहन करना होगा? यदि वह व्यक्ति सघन छाया में चला जाता है? तो उसे शीतलता का आनन्दानुभव होगा।इस श्लोक में पुरुष को सुखदुखरूप संसार का भोक्ता कहा गया है। इस संसार का कारण क्या है उत्तर में भगवाने कहते हैं

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥

puruṣhaḥ prakṛiti-stho hi bhuṅkte prakṛiti-jān guṇān kāraṇaṁ guṇa-saṅgo ’sya sad-asad-yoni-janmasu

अर्थप्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। इन गुणों का संग ही इस पुरुष (जीव) के शुभ और अशुभ योनियों में जन्म लेने का कारण है।।

puruṣhaḥthe individual soulprakṛiti-sthaḥseated in the material energyhiindeedbhuṅktedesires to enjoyprakṛiti-jānproduced by the material energyguṇānthe three modes of naturekāraṇamthe causeguṇa-saṅgaḥthe attachment (to three guṇas)asyaof itssat-asat-yoniin superior and inferior wombsjanmasuof birth
व्याख्या

यद्यपि पूर्ण पुरुष परमात्मा का कोई संसार नहीं है? तथापि प्रकृति से उत्पन्न उपाधियों से अविच्छिन्नसा हुआ वह भोक्ता भाव को प्राप्त होता है। यही प्रकृतिस्थ पुरुष है।शीतउष्ण? रागद्वेष? सुखदुख आदि गुण जड़ प्रकृति (क्षेत्र) के धर्म हैं। किन्तु उपाधियों के साथ अहंभाव से तादात्म्य होने के कारण यह पुरुष उसे अपने ही धर्म मानकर व्यर्थ ही दुखों को भोगता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पुरुष का दुख प्रकृति के कारण नहीं? वरन् उसके साथ हुए तादात्म्य के कारण है।प्रकृति के गुणों के साथ अत्याधिक आसक्ति हो जाने के कारण यह पुरुष असंख्य शुभ और अशुभ? उत्तम और अधम योनियों में जन्म लेता रहता है। ये असंख्य जन्म उसे उन वासनाओं के अनुसार प्राप्त होते हैं? जिन्हें वह जगत् में कार्य करते और फल भोगते हुए अर्जित करता रहता है।इस प्रकार? पारमार्थिक दृष्टि से सच्चिदानन्द स्वरूप होते हुए भी अविद्यावशात् यह पुरुष कर्ता? भोक्ता? सुखी? दुखी? इहलोक परलोकगामी संसारी जीव बन जाता है आत्म अज्ञान और प्रकृतिजनित गुणों से आसक्ति ही पुरुष के सांसारिक दुख का कारण है। अत संसार की आत्यन्तिक निवृत्ति के लिए जो ज्ञानमार्ग है? उसके दो अंग हैं विवेक और वैराग्य। साधक को चाहिए कि वह विवेक के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करे और वैराग्य के द्वारा मिथ्या आसक्ति का त्याग करे।अगले श्लोक में परमात्मा का ही साक्षात् निर्देश करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं

उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥

upadraṣhṭānumantā cha bhartā bhoktā maheśhvaraḥ paramātmeti chāpy ukto dehe ’smin puruṣhaḥ paraḥ

अर्थपरम पुरुष ही इस देह में उपद्रष्टा, अनुमन्ता ,भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा कहा जाता है।।

upadraṣhṭāthe witnessanumantāthe permitterchaandbhartāthe supporterbhoktāthe transcendental enjoyermahā-īśhvaraḥthe ultimate controllerparama-ātmāSuperme Soulitithatcha apiand alsouktaḥis saiddehewithin the bodyasminthispuruṣhaḥ paraḥthe Supreme Lord
व्याख्या

इस भ्रमित दुखी क्षेत्रज्ञ पुरुष से भिन्न? क्षेत्रोपाधि से असंस्पृष्ट शुद्ध परम पुरुष है। प्रत्येक प्रतिबिम्ब के अस्तित्व के लिये एक बिम्बभूत सत्य वस्तु की आवश्यकता होती है। प्रतिबिम्ब की स्थिति दर्पण या जल आदि की सतह पर निर्भर करती है? किन्तु बिम्बभूत सत्यवस्तु को उस सतह का स्पर्श तक नहीं होता। जैसे? चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब पात्र के जल पर निर्भर करता है? किन्तु चन्द्रमा अपने प्रकाशस्वरूप में ही स्थित रहता है।चित्स्वरूप आत्मा क्षेत्र की उपाधि से क्षेत्रज्ञ बनता है। इससे सिद्ध होता है कि आत्मा अपने स्वरूप से निरुपाधिक अर्थात् सर्व उपाधिरहित है।,इस श्लोक में? वैज्ञानिक पद्धति से अध्ययन और विश्लेषण करने की दृष्टि से? भगवान् श्रीकृष्ण उक्त दो प्रकार के पुरुषों सोपाधिक और निरुपाधिक का निर्देश करते हैं। यहाँ इस बात का स्मरण रहे कि वस्तुत पुरुष एक ही है।यहाँ विभिन्न नामों के द्वारा एक ही परमात्मा को इंगित किया गया है। ये विभिन्न नाम जीव की मनस्थिति अर्थात् अज्ञान आवरण की सघनता और विरलता की दृष्टि से दिये गये हैं। आत्मस्वरूप के विषय में पूर्ण अज्ञानी तथा रागद्वेषादि वृत्तियों से पूर्ण मन वाले व्यक्ति में आत्मा मानो केवल उपद्रष्टा बनकर रहता है अर्थात इस पुरुष के अपराधपूर्ण कार्यों को भी साक्षीभाव से प्रकाशित मात्र करता है वैसे भी आत्मा सममस्त प्राणियों की वृत्तियों का उपद्रष्टा मात्र है। परन्तु जब उस व्यक्ति का चित्त कुछ मात्रा में शुद्ध होता है और वह सत्कर्म में प्रवृत्त हौता है? तब परमात्मा मानो अनुमन्ता बनता है? अर्थात् उसके सत्कर्मों को अपनी अनुमति प्रदान करता है।अन्तकरण के और अधिक शुद्ध होने पर वह व्यक्ति जब अपने दिव्य स्वरूप के प्रति जागरूक हो जाता है तब ईश्वर उसके कर्मों को पूर्ण करने वाला भर्ता बन जाता है। अर्पण की भावना से किये गये कर्मों में ईश्वर की कृपा से सफलता ही प्राप्त होती है। ऐसा प्रतीत होता है? मानो? ईश्वर उस साधक के अल्प प्रयत्नों को भी पूर्णता प्रदान करता है।जब वह साधक अपने अहंकार को भुलाकर पूर्णतया योगयुक्त हो जाता है? तब ऐसे व्यक्ति के हृदय में आत्मा ही भोक्ता बनी प्रतीत होती है। इस श्लोक की समाप्ति इस कथन के साथ होती है कि आत्मा ही महेश्वर है। वही इस देह में परम पुरुष है।प्रकृति और पुरुष के तत्त्व को जानने वाले साधक के विषय में कहते हैं कि

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैःसह।सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥

ya evaṁ vetti puruṣhaṁ prakṛitiṁ cha guṇaiḥ saha sarvathā vartamāno ’pi na sa bhūyo ’bhijāyate

अर्थइस प्रकार पुरुष और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य जानता है, वह सब प्रकार से रहता हुआ (व्यवहार करता हुआ) भी पुन: नहीं जन्मता है।।

yaḥwhoevamthusvettiunderstandpuruṣhamPuruṣhprakṛitimthe material naturechaandguṇaiḥthe three modes of naturesahawithsarvathāin every wayvartamānaḥsituatedapialthoughnanotsaḥtheybhūyaḥagainabhijāyatetake birth
व्याख्या

अब तक किये गये विवेचन का सारांश यह है कि पुरुष स्वस्वरूप से नित्यमुक्त होते हुए भी प्रकृति के साथ तादात्म्य के कारण जीव बनकर संसार के दुखों को भोगता है। इसी तादात्म्य के कारण उत्पन्न वासनाओं के अनुरूप विभिन्न योनियों में उसे जन्म लेना पड़ता है।परन्तु? जो साधक साधन सम्पन्न होकर गुरु के उपदेश से प्रकृति? पुरुष उनके परस्पर सम्बन्ध तथा प्रकृति के विविध प्रकार के प्रभाव रखने वाले गुणों को तत्त्वत जान लेता है? वही वास्तव में ज्ञानी पुरुष है? जो सदा के लिए संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।किसी वस्तु को पूर्णत जानने के लिए हमें उससे विलग रहना चाहिए। यदि हम स्वयं ही किसी परिस्थिति में उलझे हुए हों? तो हम उसका वस्तुनिष्ठ अध्ययन नहीं कर सकते। अत प्रकृति के विकारों (देहादि) और गुणों (सुखदुखादि) को जानने के लिए हमें उन सबका द्रष्टा बनकर स्थित होना चाहिए? तभी हम सर्वाधिष्ठान परमात्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं। इस अनन्तस्वरूप ब्रह्म को अपने आत्मस्वरूप से जानने का अर्थ ही अविद्या को नष्ट करना है। ऐसे पूर्ण ज्ञानी पुरुष का पुन प्रकृति के साथ मिथ्या तादात्म्य होने के लिए कोई कारण ही नहीं रह जाता है। इसलिए यहाँ भगवान् कहते हैं कि? सब प्रकार से रहते हुए भी उसका पुन जन्म नहीं होता है। इसका अभिप्राय यह है कि ज्ञानी पुरुष जगत् में कर्म करता हुआ भी सामान्य मनुष्यों के समान नईनई वासनाओं को उत्पन्न करके उनके बन्धन में नहीं आता है क्योंकि उसका अहंकार सर्वथा नष्ट हो चुका होता है।ब्रह्मवित् ब्रह्म ही बन जाता है और उसके समस्त कर्म नष्ट हो जाते हैं यह सभी उपनिषदों के द्वारा प्रतिपादित सत्य है।अब? आत्मदर्शन के लिए अनेक उपाय बताते हैं

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥

dhyānenātmani paśhyanti kechid ātmānam ātmanā anye sānkhyena yogena karma-yogena chāpare

अर्थकोई पुरुष ध्यान के अभ्यास से आत्मा को आत्मा (हृदय) में आत्मा (शुद्ध बुद्धि) के द्वारा देखते हैं; अन्य लोग सांख्य योग के द्वारा तथा कोई साधक कर्मयोग से (आत्मा को देखते हैं )।।

dhyānenathrough meditationātmaniwithin one’s heartpaśhyantipercievekechitsomeātmānamthe Supreme soulātmanāby the mindanyeotherssānkhyenathrough cultivation of knowledgeyogenathe yog systemkarma-yogenaunion with God with through path of actionchaandapareothers
व्याख्या

सर्वोपाधिविनिर्मुक्त आत्मा का शुद्ध स्वरूप में अनुभव करना ही आध्यात्मिक साधना का अन्तिम लक्ष्य है? जिसके सम्पादन के लिए अनेक उपाय? विकल्प यहाँ बताये गये हैं। मानव का व्यक्तित्व सुगठन उसी स्थिति से प्रारम्भ होना चाहिए जहाँ वर्तमान काल में मनुष्य स्वयं को पाता है। क्रमबद्ध पाठों के बिना कोई भी शिक्षा सफल नहीं हो सकती।अत्यन्त अशुद्ध एवं चंचल मन के व्यक्ति के आत्मविकास के लिए भी अनुकूल साधन का होना आवश्यक है। पूर्णत्व के सिद्धांत को केवल बौद्धिक स्तर पर समझने से ही आत्मिक उन्नति नहीं हो सकती। ज्ञान के अनुरूप ही व्यक्ति का जीवन होने पर वास्तविक विकास संभव होता। इसलिए? अपने वैचारिकजीवन को नियन्त्रित करने तथा पुनर्शिक्षा के द्वारा उसे सही दिशा प्रदान करने में साधक को विवेक तथा उत्साह से पूर्ण सक्रिय साधना का अभ्यास करने की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति को आत्मोन्नति के इस मार्ग में कठिनाई का अनुभव होता है।विभिन्न प्रकार एवं स्तर के मनुष्यों के विकास के लिए? प्राचीनकाल के महान् ऋषियों नेविभिन्न साधन मार्गों को खोज निकाला? जिन सबका साध्य एक ही है। प्रत्येक मार्ग के अनुयायी के लिए वही मार्ग सबसे उपयुक्त है। किसी एक मार्ग को अन्यों की अपेक्षा श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता है। एक औषधालय में अनेक औषधियाँ रखी होती हैं प्रत्येक औषधि किसी रोग विशेष के लिए होती है और उस रोग से पीड़ित रोगी के लिए स्वास्थ्यलाभ होने तक वही औषधि सर्वोत्तम होती है।विभिन्न साधकों में प्रतीयमान भेद उनके मानसिक सन्तुलन और बौद्धिक क्षमता के भेद के कारण होता है। शास्त्रीय भाषा में इसे अन्तकरण की अशुद्धि कहते हैं। वे सब साधन? जिनके द्वारा चित्तशुद्धि प्राप्त होती है? बहिरंग साधन या गौण साधन कहलाते हैं। चित्त के शुद्ध होने पर आत्मसाक्षात्कार का अन्तरंग या साक्षात् साधन ध्यान है।कोई पुरुष ध्यान के द्वारा आत्मा को देखते हैं ध्यान के विषय में शंकराचार्य जी लिखते हैं कि शब्दादि विषयों से श्रोत्रादि इन्द्रियों को मन में उपरत करके मन को चैतन्यस्वरूप आत्मा में एकाग्र करके चिन्तन करना ध्यान कहलाता है। इस चिन्तन में ध्येयविषयक वृत्तिप्रवाह तैलधारा के समान अखण्ड और अविरल बना रहता है। स्वाभाविक है कि यह मार्ग उन उत्तम साधकों के लिए हैं? जिनका हृदय और विवेक समान रूप से विकसित होता है।आत्मा को देखने का अर्थ नेत्रों से रूपवर्ण देखना नहीं है? अन्यथा यह तो वेदान्त के सिद्धांत का ही खंडन हो जायेगा। आत्मा तो द्रष्टा है? दृश्य नहीं। अत? आत्मदर्शन से तात्पर्य स्वस्वरूपानुभूति से है। वह अनुभव करतलामलक के दर्शन के समान स्पष्ट और सन्देह रहित होने के कारण यह कहने की प्रथा पड़ गयी कि वे आत्मा को देखते हैं।आत्मा के द्वारा आत्मा को देखते हैं शंकराचार्य जी इस भाग के भाष्य में कहते हैं ध्यान के द्वारा आत्मा में अर्थात् ध्यान से सुसंस्कृत हुए अन्तकरण के द्वारा देखते हैं। शुद्धांतकरण में ही आत्मा का स्पष्ट अनुभव होता है।किसी को इस बात पर आश्चर्य़ हो सकता है कि यहाँ बुद्धि और अन्तकरण (मन) के लिए भी आत्मा शब्द का ही प्रयोग क्यों किया गया है इसका कारण यह है कि जब साधक को अपने पारमार्थिक सत्यस्वरूप का अनुभव होता है? तब उस सत्य की दृष्टि से मन? बुद्धि आदि का कोई पृथक अस्तित्व नहीं रह जाता है। सब आत्मस्वरूप ही बन जाते हैं। सभी तरंगें? फेन आदि समुद्र के अतिरिक्त कुछ नहीं है। स्वप्नद्रष्टा? स्वप्न जगत् और स्वप्न के अनुभव ये सब वस्तुत जाग्रत्पुरुष का मन ही है। इसी दृष्टि से हमारे आध्यात्मिक ग्रन्थों में हमारे व्यक्तित्व के बाह्यतम पक्ष शरीरादि को भी आत्मा शब्द से निर्देशित किया गया है।उपर्युक्त ध्यानयोग का मार्ग विवेक और वैराग्य से सुसम्पन्न उत्तम अधिकारियों के ही उपयुक्त है। अत मध्यम प्रकार के साधकों के लिए उपायान्तर बताते हैं।सांख्य योग विवेक के होते हुए भी वैराग्य की कमी होने के कारण जिन साधकों का मन ध्यान में स्थिर नहीं हो पाता और उनका तादात्म्य मन में उठने वाली वृत्तियों के साथ हो जाता है? उनको सांख्य योग का अभ्यास करने को कहा गया है। क्रमबद्ध युक्तियुक्त विचार का वह मार्ग जिसके द्वारा? हम किसी निश्चित सिद्धांत पर पहुँचते हैं? जो कभी प्रमाणान्तर या युक्ति से अन्यथा सिद्ध नहीं हो सकता अर्थात् अकाट्य रहता है? सांख्य योग कहलाता है।इस साधना के अभ्यास में साधक को इस ज्ञान को दृढ़ बनाये रखना चाहिए कि मन में उठने वाली ये वृत्तियाँ सत्व? रज और तमोगुण के कार्यरूप हैं तथा दृश्य हैं मैं इनका साक्षी इन से भिन्न और नित्य हूँ। इस प्रकार? मन का ध्यान वृत्तियों से हटकर साक्षी में स्थिर हो जाने पर अन्य वृत्तियाँ स्वत लीन हो जायेंगी और निर्विकल्प आत्मा का बोधमात्र रह जायेगा।कर्मयोग जिन पुरुषों के अन्तकरण में वासनाओं की प्रचुरता होती है? वे अध्ययनरूप सांख्ययोग का पालन नहीं कर सकते हैं और उनके लिए ध्यानयोग का प्रश्न ही नहीं उठता है। ऐसे साधकों के लिए प्रथम वासना क्षय के उपाय के रूप में कर्मयोग का उपदेश दिया जाता है जिसका गीता के तीसरे अध्याय में विशद् वर्णन किया गया है। अहंकार और स्वार्थ को त्यागकर ईश्वरार्पण की भावना से कर्म करने से पूर्वसंचित वासनाओं का क्षय हो जाता है और नई वासनाएं उत्पन्न नहीं होतीं। इस प्रकार? चित्त के शुद्ध होने पर आत्मज्ञान की जिज्ञासा जागृत होने पर वह व्यक्ति शास्त्राध्ययन के (सांख्य योग) योग्य बन जाता है। तत्पश्चात् विवेक और वैराग्य के दृढ़ होने पर ध्यान योग के द्वारा अध्यात्म साधना के सर्वोच्च शिखर ब्रह्मात्मैक्यबोध को प्राप्त हो जाता है।संक्षेप में? सत्त्वगुणप्रधान व्यक्ति के लिए ध्यानयोग उपयुक्त है। रजोगुण का आधिक्य और सत्त्वगुण की न्यूनता से युक्त पुरुष के लिए सांख्य योग है और सर्वथा रजोगुण प्रधान पुरुष के लिए कर्मयोग का साधन है।तब फिर? तमोगुण प्रधान अर्थात् जिसमें विचारशक्ति का अभाव हो? ऐसे व्यक्ति के लिए कौन सा उपाय है भगवान् बताते हैं कि

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते।तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥

anye tv evam ajānantaḥ śhrutvānyebhya upāsate te ’pi chātitaranty eva mṛityuṁ śhruti-parāyaṇāḥ

अर्थपरन्तु, अन्य लोग जो स्वयं इस प्रकार न जानते हुए, दूसरों से (आचार्यों से) सुनकर ही उपासना करते हैं, वे श्रुतिपरायण (अर्थात् श्रवण ही जिनके लिए परम साधन है) लोग भी मृत्यु को नि:सन्देह तर जाते हैं।।

anyeotherstustillevamthusajānantaḥthose who are unaware (of spiritual paths)śhrutvāby hearinganyebhyaḥfrom othersupāsatebegin to worshiptetheyapialsochaandatitaranticross overevaevenmṛityumdeathśhruti-parāyaṇāḥdevotion to hearing (from saints)
व्याख्या

उत्तम और मध्यम अधिकारियों के लिए उपयुक्त मार्गों को बताने के पश्चात् अब मन्द बुद्धि साधकों के लिए गीताचार्य एक उपाय बताते हैं।अन्यों से श्रवण कुछ ऐसे भी लोग होते हैं? जो ध्यान? सांख्य और कर्मयोग इन तीनों में से किसी एक को भी करने में असमर्थ होते हैं। उनके विकास के लिए एकमात्र उपाय यह है कि उनको किसी आचार्य से,पूजा या उपासना के विषय में श्रवण कर तदनुसार ईश्वर की आराधना करनी चाहिए।वे भी मृत्यु को तर जाते हैं जगत् में यह देखा जाता है कि जिनकी बुद्धि मन्द होती है? उनमें श्रद्धा का आधिक्य होता है। अत? यदि ऐसे मन्दबुद्धि साधक श्रद्धापूर्वक उपदिष्ट प्रकार से उपासना करें? तो वे भी इस अनित्य मृत्युरूप संसार को पार करके नित्य तत्त्व का अनुभव कर सकते हैं। देह के अन्त को ही मृत्यु नहीं समझना चाहिए। यह शब्द उसके व्यापक अर्थ में यहाँ प्रयुक्त किया गया है। अनित्य? अनात्म उपाधियों के साथ तादात्म्य करने से हम भी उनके परिवर्तनों से प्रभावित होते रहते हैं। यह परिवर्तन का दुखपूर्ण अनुभव ही मृत्यु कहलाता है। इनसे भिन्न नित्य अविकारी आत्मा को जानना ही मृत्यु को तर जाना है? अर्थात् सभी परिवर्तनों में अविचलित और अप्रभावित रहना है श्री शंकराचार्य कहते हैं कि स्वयं विवेकरहित होते हुए भी केवल परोपदेश के श्रवण से ही यदि ये साधक मोक्ष को प्राप्त होते हैं? तो फिर प्रमाणपूर्वक विचार के प्रति स्वतन्त्र विवेकी साधकों के विषय में कहना ही क्या है कि वे मोक्ष को प्राप्त करते हैं।इन सब साधनों के द्वारा हमें कौन से साध्य का सम्पादन करना है इस पर कहते हैं

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥

yāvat sañjāyate kiñchit sattvaṁ sthāvara-jaṅgamam kṣhetra-kṣhetrajña-sanyogāt tad viddhi bharatarṣhabha

अर्थहे भरत श्रेष्ठ ! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर जंगम (चराचर) वस्तु उत्पन्न होती है, उस सबको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुई जानो।।

yāvatwhateversañjāyatemanifestingkiñchitanythingsattvambeingsthāvaraunmovingjaṅgamammovingkṣhetrafield of activitieskṣhetra-jñaknower of the fieldsanyogātcombination oftatthatviddhiknowbharata-ṛiṣhabhabest of the Bharatas
व्याख्या

क्षेत्र (प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (पुरुष) इन दोनों में ही स्वतन्त्र रूप से कोई एक ही तत्त्व इस चराचर जगत् का कारण नहीं है। इन दोनों के संयोग से जगत् उत्पन्न होता है परन्तु इन दोनों का संयोग वास्तविक नहीं? वरन् अन्योन्य धर्म अध्यासरूप है।अध्यास की प्रक्रिया में विद्यमान अधिष्ठान पर भ्रान्ति से किसी अन्य वस्तु की ही कल्पना की जाती है? जैसे स्तम्भ में प्रेत का अध्यास। इस प्रकार के अध्यास में? भ्रान्त व्यक्ति स्तम्भ में वस्तुत अविद्यमान प्रेत के रूप? गुण और क्रियाओं को देखता है। यह स्तम्भ पर प्रेत के धर्म का अध्यास है। इसी प्रकार? स्वयं अविद्यमान होते हुए भी जो प्रेत उस व्यक्ति को सद्रूप अर्थात् है इस रूप में प्रतीत हो रहा होता है? उसकी सत्ता वस्तुत स्तम्भ की ही होती है। यह है स्तम्भ के अस्तित्व के धर्म का प्रेत पर आरोप। गुणों के इस परस्पर अध्यास के कारण विचित्र बात यह होती है कि व्यक्ति को मिथ्या प्रेत तो दिखाई पड़ता है? परन्तु सत्य स्तम्भ नहीं मन की यह विचित्र युक्ति अध्यास कहलाती है। शुद्ध चैतन्य में क्षेत्र का सर्वथा अभाव है। क्षेत्र की अपनी न सत्ता है और न चेतनता। परन्तु? परस्पर विचित्र संयोग से इस चराचर जगत् की उत्पत्ति हुई प्रतीत होती है।इस अध्यास के कार्य को हम अपने में ही अनुभव कर सकते हैं। विचार करने पर विविधता पूर्ण सृष्टि निवृत्त हो जाती है और हमें यह ज्ञात होता है कि ब्रह्म ही वह परम सत्य अधिष्ठान है? जिस पर प्रकृति और पुरुष की क्रीड़ा हो रही है।उदाहरणार्थ? कोई एक व्यक्ति सामान्यत शान्त प्रकृति का है। परन्तु यदाकदा उसके मन में प्रबल कामना का उदय होता है। उस कामना से तादात्म्य करने के फलस्वरूप वह व्यक्ति कामुक बनकर ऐसा निन्द्य कर्म करता है? जिसका उसे पश्चात्ताप होता है इस उदाहरण में? कामना? कामुक व्यक्ति? पश्चात्ताप इन सबका अस्तित्व उस व्यक्ति में ही निहित होता है। यद्यपि वे उसमें हैं? किन्तु वस्तुत वह उसमें नहीं होता क्योंकि? उनके बिना भी उस व्यक्ति का अस्तित्व बना रहता है। तथापि? उस कामना वृत्ति से तादात्म्य करके वह पश्चात्ताप के योग्य कर्मों का कर्ता बन जाता है। इसी प्रकार? आत्मा परिपूर्ण होने के कारण उसमें क्षेत्र या अनात्मा की संभावना रहती है। प्रकृति को व्यक्त कर उसके साथ तादात्म्य से वह जीवरूप पुरुष बन जाता है। यह पुरुष मिथ्या आसक्तियों के द्वारा अपने संसार को बनाये रखता है। इस स्थिति में स्वयं को मुक्त कर अपने पूर्ण स्वरूप का साक्षात्कार करने का यही उपाय है कि हम आत्मा और अनात्मा का प्रमाण पूर्वक विवेक करें और प्रकृति से विलग होकर उसके कार्यों के साक्षी बनकर रहें।विवेक द्वारा प्राप्त सम्यक् दर्शन को अगले श्लोक में बताते हैं

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥

samaṁ sarveṣhu bhūteṣhu tiṣhṭhantaṁ parameśhvaram vinaśhyatsv avinaśhyantaṁ yaḥ paśhyati sa paśhyati

अर्थजो पुरुष समस्त नश्वर भूतों में अनश्वर परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।

samamequallysarveṣhuin allbhūteṣhubeingstiṣhṭhan-tamaccompanyingparama-īśhvaramSupreme Soulvinaśhyatsuamongst the perishableavinaśhyantamthe imperishableyaḥwhopaśhyatiseesaḥtheypaśhyatiperceive
व्याख्या

जिस अधिष्ठान पर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के परस्पर मिथ्या तादात्म्य की क्रीड़ा और परिणामत दुखपूर्ण संसार की प्रतीति होती है? वह एक परमेश्वर ही है? जो भूतमात्र में समभाव से स्थित है? जैसे समस्त तरंगों में जल होता है।नश्वर भूतों में अनश्वर केवल सतही दृष्टि से निरीक्षण करने वाले पुरुष को जगत् में निरन्तर परिवर्तन होता दिखाई देगा। वस्तुएं स्वभावत परिवर्तित होती रहती हैं और उनके परस्पर के सम्बन्ध भी। परिवर्तन होना यह वैषयिक और वैचारिक दोनों ही जगतों का स्थायी धर्म है। इस जगत् की तुलना से कहा गया है कि इन सबमें वह परमेश्वर नित्य और अविकारी अधिष्ठान है? जिसके कारण ये सब परिवर्तन जाने जाते हैं।जन्म? वृद्धि? व्याधि? क्षय और मृत्यु ये वे विकार हैं? जो प्रत्येक अनित्य वस्तु को प्राप्त होते हैं। जिसकी उत्पत्ति हुई हो? उसे ही आगे के विकारों से भी गुजरना पड़ेगा। यहाँ परमेश्वर को अविनाशी कहकर उसके पूर्व के विकारों का भी अभाव सूचित किया गया है। यह अविनाशी चैतन्य ही नाश का प्रकाशक और जगत् का आधार है? जैसे रूपान्तरित होने वाले आभूषणों का आधार स्वर्ण है।वह पुरुष जो इस सम और अविनाशी परमेश्वर को समस्त विषम और विनाशी भूतों में पहचानता है? वही पुरुष वास्तव में उसे देखता है जिसे देखना चाहिए। यहाँ देखने से तात्पर्य आत्मानुभव से है।भौतिक जगत् की वस्तुएं इन्द्रियगोचर होती हैं? जब कि भावनाओं और विचारों का ज्ञान क्रमश मन और बुद्धि से होता है। इसी प्रकार आत्मबोध भी आध्यात्मिक ज्ञानचक्षु से होता है? चर्मचक्षु से नहीं। जैसे हमारे नेत्र विचारों को नहीं देख सकते वैसे ही मन और बुद्धि आत्मा को नहीं देख सकते। स्थूल के द्वारा सूक्ष्म का दर्शन नहीं हो सकता। सूक्ष्मतम आत्मा समस्त उपाधियों से अतीत है।जो (इस समतत्त्व को) देखता है? वही (वास्तव में) देखता है यह कथन वेदान्त की विशेष वाक्यशैली है? जो अत्यन्त प्रभावपूर्ण है। सभी लोग देखते हैं? परन्तु पारमार्थिक सत्य को नहीं। उनके इस विपरीत दर्शन से ही उनके प्रमाणों (ज्ञान के कारणों) में दोष का अस्तित्व सिद्ध होता है। विभ्रम और वस्तु का अन्यथा दर्शन? मिथ्या कल्पनाएं और विक्षेप ये सब वस्तु के यथार्थ स्वरूप को आच्छादित कर देते हैं। इसलिए? योगेश्वर श्रीकृष्ण विशेष बल देकर कहते हैं कि जो पुरुष इस सम सत्य को देखता है वही वास्तव में देखता है। शेष लोग तो भ्रान्ति में पड़े रहते हैं।अब यथोक्त सम्यक् दर्शन श्रेष्ठ फल को दर्शाकर उसकी स्तुति करते हैं

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्॥

samaṁ paśhyan hi sarvatra samavasthitam īśhvaram na hinasty ātmanātmānaṁ tato yāti parāṁ gatim

अर्थनिश्चय ही, वह पुरुष सर्वत्र सम भाव से स्थित परमेश्वर को समान हुआ आत्मा (स्वयं) के द्वारा आत्मा (स्वयं) का नाश नहीं करता है, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।।

samamequallypaśhyanseehiindeedsarvatraeverywheresamavasthitamequally presentīśhvaramGod as the Supreme soulnado nothinastidegradeātmanāby one’s mindātmānamthe selftataḥtherebyyātireachparāmthe supremegatimdestination
व्याख्या

वेदान्त हमें जगत् से पलायन नहीं सिखाता? बल्कि वह इस दृश्यमान जगत् का पुनर्मूल्यांकन करने का उपदेश देता है। सामान्यत जगत् की ओर देखने की हमारी दृष्टि हमारे प्रिय विचारों एवं भावनाओं से रंजित होती है। स्पष्ट है कि उस स्थिति में हम जगत् को यथार्थ रूप में नहीं देखते। इस अज्ञान की दृष्टि का त्यागकर ज्ञान की दृष्टि से विश्व को देखने का अर्थ वर्तमान काल के सुस्त और उदास? दुखी कुरूप जगत् में ही पूर्णता और आनन्द? दिव्यता और पवित्रता का दर्शन करना है। दुर्व्यवस्थित प्रमाणों के द्वारा परमार्थ सत्य का विपरीत दर्शन ही यह जगत् है? जो द्रष्टा जीव को ही पीड़ित करता रहता है।उपाधियों के साथ तादात्म्य करके जीवभाव को प्राप्त आत्मा जब देखता है? तब उसे नानाविध सृष्टि दिखाई देती है। भ्रान्तिजनित यह जगत् कभी उसे खिसियाते और नृत्य करते हुए तो कभी चीखते और हुंकारते हुए प्रतीत होता है। इन सब दुखपूर्ण परिवर्तनों के मध्य ही पारमार्थिक सत्य स्वरूप को पहचानने से ही सभी विक्षेपों? अर्थहीन लक्ष्यों और परिश्रमों की समाप्ति हो सकती है? क्योंकि वह परमेश्वर ही सर्वत्र समान रूप से स्थित देखता है। ज्ञान के अपने इस अनुभव के कारण फिर ज्ञानी पुरुष को कोई दुख अथवा भय नहीं होता। मिथ्या प्रेत के अधिष्ठान स्तम्भ को पहचान लेने पर पूर्व का भय और दुख समाप्त हो जाता है।वह अपने द्वारा अपना नाश नहीं करता है पूर्व में भी भगवान् श्रीकृष्ण ने स्पष्ट वर्णन किया है कि किस प्रकार हम अपने शत्रु या मित्र बन जाते हैं। जब हमारा निम्नस्तर का अहंकारकेन्द्रित व्यक्तित्व या मन हमारी उच्चतर ज्ञानवती बुद्धि के मार्गदर्शनानुसार कार्य करने के लिए उपलब्ध नहीं होता? तब वह मन हमारा शत्रु बन जाता है। यदि वाहन के ऊपर हमारा नियन्त्रण न रहे? तो वह वाहन हमारी सेवा करने के स्थान पर हमारे नाश का ही कारण बन जाता है। जिस पुरुष ने सर्वत्र रमण कर रहे परमात्मा का दर्शन कर लिया है? उसका मन कभी भी अपनी दुष्ट छाया से परमात्मा के वैभव को आच्छादित नहीं कर सकता।इससे वह परम गति को प्राप्त होता है आत्मअज्ञान तथा तज्जनित मिथ्याज्ञान के कारण हमारे शुद्ध आत्मस्वरूप पर आवरण पड़ा रहता है। इस अविद्या के कारण मनुष्य न केवल अपने स्वरूप को नहीं जानता? वरन् स्वरूप से सर्वथा भिन्न देहादि अनात्म उपाधियों को ही अपना स्वरूप मान लेता है। परिणामत उसका व्यवहार अनुचित और जीवन का लक्ष्य अधिकाधिक विषयोपभोग के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। इस लक्ष्य को पाने के लिये वह ऐसे हीन कर्म करता है? जो स्वयं के लिये और समाज के लिये भी दुखकारक और हानिकारक होते हैं। वह किसी भी स्थान पर परमात्मा की महानता और कीर्ति का दर्शन नहीं कर सकता। परन्तु? जब वह विवेक वैराग्यादि साधनों से सम्पन्न होकर आत्मबोध प्राप्त करता है? तब अज्ञानसहित मिथ्याज्ञान की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है? और वह परम गति को प्राप्त होता है।सभी जीवों के गुण और कर्मों में भेद दिखाई देने के कारण यह मानना होगा कि आत्माएं अनेक हैं? एक नहीं। इस मत का खण्डन करते हुये भगवान् कहते हैं

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति॥

prakṛityaiva cha karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśhaḥ yaḥ paśhyati tathātmānam akartāraṁ sa paśhyati

अर्थजो पुरुष समस्त कर्मों को सर्वश: प्रकृति द्वारा ही किये गये देखता है तथा आत्मा को अकर्ता देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।

prakṛityāby material natureevatrulychaalsokarmāṇiactionskriyamāṇāniare performedsarvaśhaḥallyaḥwhopaśhyatiseetathāalsoātmānam(embodied) soulakartāramactionlesssaḥtheypaśhyatisee
व्याख्या

विभिन्न मोटर कम्पनियों के द्वारा निर्मित विभिन्न अश्वशक्ति की असंख्य कारों में से प्रत्येक वाहन का कार्य सम्पादन विशिष्ट होता है। इससे हम यह नहीं कह सकते कि इन कारों में प्रयुक्त पेट्रोल विभिन्न क्षमताओं का है। बल्ब अनेक हैं? परन्तु विद्युत् तो एक ही है। ये दृष्टान्त इस श्लोक में व्यक्त किये गये आत्मैकत्व के सिद्धान्त को भली भाँति स्पष्ट करते हैं।सब कर्म आत्मा की केवल उपस्थिति में प्रकृति से उत्पन्न उपाधियों के द्वारा ही किये जाते हैं। अब विभिन्न व्यक्तियों के कर्मों में जो भेद है? वह उनके विभिन्न शुभाशुभ संस्कारों और इच्छाओं के कारण है? आत्मा के कारण नहीं। केवल क्षेत्र या क्षेत्रज्ञ में कोई कर्म नहीं होते हैं।आत्मा अकर्ता है कर्म करने के लिये शरीरादि कारणों की और मन में इच्छा की आवश्यकता होती है? परन्तु आत्मा सर्वव्यापी? निराकार और सर्व उपाधि रहित होने से उसमें कोई कर्म ही नहीं हो सकते? तो फिर वह कर्ता कैसे हो सकता है आत्मा के अकर्तृत्व के विषय में अन्य कारण भी आगे प्रस्तुत किये जायेंगे।जो प्रकृति की क्रियाओं में आत्मा को अकर्ता जानता है? वही पुरुष वास्तव में तत्त्व को देखता है। उपाधियों के अभाव में समस्त जीवों के गुणों और कर्मों की विलक्षणता का अभाव होकर केवल परमात्मा ही स्वस्वरूप में अवस्थित रह जाता है।पुन? ज्ञानी पुरुष के सम्यक् दर्शन को दूसरे शब्दों में बताते हुये कहते हैं

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥

yadā bhūta-pṛithag-bhāvam eka-stham anupaśhyati tata eva cha vistāraṁ brahma sampadyate tadā

अर्थयह पुरुष जब भूतों के पृथक् भावों को एक (परमात्मा) में स्थित देखता है तथा उस (परमात्मा) से ही यह विस्तार हुआ जानता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।।

yadāwhenbhūtaliving entitiespṛithak-bhāvamdiverse varietyeka-sthamsituated in the same placeanupaśhyatiseetataḥthereafterevaindeedchaandvistāramborn frombrahmaBrahmansampadyate(they) attaintadāthen
व्याख्या

किसी वस्तु या घटना के वैज्ञानिक अध्ययन की पूर्णता उसके बौद्धिक विश्लेषण तथा प्रायोगिक प्रत्यक्षीकरण से ही होती है।जब भौतिक विज्ञान में यह ज्ञात होता है कि परमाणु पदार्थ की इकाई है? तब इस ज्ञान के साथ यह भी समझना चाहिए कि ये परमाणु ही विभिन्न संख्या एवं प्रकारों में संयोजित होकर असंख्य रूप और गुणों वाली वस्तुओं के इस जगत् की रचना करते हैं। इसी प्रकार समस्त नाम और रूपों के पीछे एक आत्मतत्त्व ही सत्य है? यह जानना मात्र आंशिक ज्ञान है। ज्ञान की पूर्णता तो इसमें होगी कि जब हम यह भी जानेंगे कि इस एक आत्मा से विविधता की यह सृष्टि किस प्रकार प्रकट हुई है।जिस प्रकार? समुद्र को जानने वाला पुरुष असंख्य और विविध तरंगों का अस्तित्व एक समुद्र में ही देखता है? इसी प्रकार आत्मज्ञानी पुरुष भी भूतों के पृथक्पृथक् भाव को एक परमात्मा में ही स्थित देखता है। समस्त तरंगें समुद्र का ही विस्तार होती हैं। ज्ञानी पुरुष का भी यही अनुभव होता है कि एक आत्मा से ही इस सृष्टि का विस्तार हुआ है। स्वस्वरूपानुभूति के इन पवित्र क्षणों में ज्ञानी पुरुष स्वयं ब्रह्म बनकर यह अनुभव करता है कि एक ही आत्मतत्त्व अन्तर्बाह्य सबको व्याप्त और आलिंगन किए है? सबका पोषण करते हुए स्थित है न केवल गहनगम्भीर और असीमअनन्त में वह स्थित है? वरन् सभी सतही नाम और रूपों में भी वह व्याप्त है।स्वयं आत्मस्वरूप बनकर ही आत्मा का अनुभव होता है। जिसने यह पूर्णत जान लिया है कि स्वहृदय में स्थित आत्मा ही सर्वत्र भूतमात्र में स्थित आत्मा (ब्रह्म) है तथा किस प्रकार अविद्या के आवरण के कारण विविध नामरूपों में सत्य का दीप्तिमान स्वरूप आवृत हो जाता है? वही पुरुष तत्त्वज्ञ और सम्यक्दर्शी कहा जाता है। उस अनुभव में वह स्वयं उपाधियों से परे ब्रह्म से तादात्म्य को प्राप्त होता है।एक ही आत्मा के समस्त देहों में स्थित होने से उसे भी उपाधियों के दोष प्राप्त होते होंगे। ऐसी शंका के निवारण के लिए भगवान् कहते हैं

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥

anāditvān nirguṇatvāt paramātmāyam avyayaḥ śharīra-stho ’pi kaunteya na karoti na lipyate

अर्थहे कौन्तेय ! अनादि और निर्गुण होने से यह परमात्मा अव्यय है। शरीर में स्थित हुआ भी, वस्तुत:, वह न (कर्म) करता है और न (फलों से) लिप्त होता है।।

anāditvātbeing without beginningnirguṇatvātbeing devoid of any material qualitiesparamathe Supremeātmāsoulayamthisavyayaḥimperishableśharīra-sthaḥdwelling in the bodyapialthoughkaunteyaArjun, the the son of Kuntinaneitherkarotiactsnanorlipyateis tainted
व्याख्या

यद्यपि चैतन्य आत्मा के सान्निध्य मात्र से देहेन्द्रियादि उपाधियाँ स्वक्रियाओं में प्रवृत्त होती हैं? तथापि आत्मा सदा अकर्त्ता ही रहता है। शास्त्रों के इस प्रतिपादन को समझना वेदान्त के प्रारम्भिक विद्यार्थियों को कठिन प्रतीत होता है। इसलिए? उपनिषदों के ऋषियों ने विशेष परिश्रमपूर्वक हमें यह समझाने का प्रयत्न किया है कि किस प्रकार एकमेव अद्वितीय? परिपूर्ण सर्वव्यापी परमात्मा अकर्ता है। पहले भीगीता में कहा जा चुका है कि आत्मा क्षेत्र के साथ तादात्म्य करके जीवरूपक्षेत्रज्ञ बन जाता है? जो कर्मों का कर्ता और फलों का भोक्ता है।शरीरों में स्थित होने पर भी आत्मा के दोषमुक्तत्व को सिद्ध करने के लिए यहाँ कुछ हेतु दिये गये हैं। जब एक न्यायाधीश श्रीगोपाल राव किसी हत्यारे अपराधी को मृत्युदण्ड सुनाते हैं? तब उसकी मृत्यु का पातक न्यायाधीश को प्रभावित नहीं कर सकता। श्रीगोपाल राव न्यायालय में न्यायाधीश के पद पर आसीन होकर निर्णय देते हैं? न कि अपनी व्यक्तिगत क्षमता में।अनादि जिस वस्तु का कारण होता है? उसी का प्रारम्भ भी हो सकता है। प्रारम्भ रहित का अर्थ कारणरहित होगा। परम सत्य वह है जिससे सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है। अत परमात्मा कारण रहित कारण होने से अनादि कहा गया है। इसी कारण से वह अव्यय? अविनाशी भी है।निर्गुण गुणवान् वस्तु ही विकारी होती है। हमने देखा कि जगत्कारण परमात्मा अविकारी है? अत उसका निर्गुण होना भी आवश्यक है।यह परमात्मा अव्यय है जगत्कारण? अनादि और निर्गुण होने से परमात्मा का अव्ययत्व सिद्ध हो जाता है।यह परमात्मा अपने सान्निध्य मात्र से जड़ उपाधियों को चेतनवत् व्यवहार करने में सक्षम करता है? परन्तु वह स्वयं किसी प्रकार की क्रिया नहीं,करता।उपर्युक्त सिद्धांत वेदान्त के कुछ सूक्ष्म सिद्धांतों में से एक है? और दुर्बल मति के विद्यार्थियों को प्राय इसे समझने में कठिनाई अनुभव होती है। यद्यपि यह वेदान्त साहित्य का कठिन भाग माना गया है? तथापि प्रयत्नपूर्वक इस पर मनन करने से सन्देह और कठिनाई दूर हो सकती हैं।उपाधियों के सभी निषिद्ध और आसुरी कर्मों में भी आत्मा के अकर्तृत्वऔर निर्गुणत्व को दर्शाने के लिए? भगवान् कुछ दृष्टान्त देते हैं

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते॥

yathā sarva-gataṁ saukṣhmyād ākāśhaṁ nopalipyate sarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate

अर्थजिस प्रकार सर्वगत आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र देह में स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।।

yathāassarva-gatamall-pervadingsaukṣhmyātdue to subtletyākāśhamthe spacenanotupalipyateis contaminatedsarvatraeverywhereavasthitaḥsituateddehethe bodytathāsimilarlyātmāthe soulnanotupalipyateis contaminated
व्याख्या

यहाँ प्रकृति और पुरुष के सम्बन्ध को दर्शाने के लिए आकाश का दृष्टान्त दिया गया है। अवकाशात् आकाश? अर्थात् जो वस्तुओं को रहने के लिए स्थान प्रदान करे वह आकाश है। पंचमहाभूतों में यह सूक्ष्मतम है? और इस कारण से सर्वगत है। सूक्ष्म आकाश उसमें स्थित सभी स्थूल वस्तुओं को व्याप्त किये हुए है? किन्तु उनमें से कोई भी वस्तु उसे मर्यादित या अपने दोष से लिप्त नहीं कर सकती।परमात्मा आकाश का भी कारण होने से उससे भी सूक्ष्मतर और उसे व्याप्त किये हुए है। वह सबको व्याप्ता है? परन्तु उसे कोई व्याप नहीं सकता। अत वह परमात्मा देह में स्थित होकर भी उससे लिप्त नहीं होता।स्वप्नावस्था के हत्यारे के हाथ जागृत पुरुष को रक्तरञ्जित नहीं कर सकते। प्रेत के रक्तरञ्जित वस्त्र स्तम्भ पर अपने चिन्ह नहीं छोड़ सकते। मृगमारीचिका से रेत गीली नहीं हो जाती। ये सब उदाहरण भ्रम और अध्यास के हैं। यह जगत् परम सत्य के अज्ञान से प्रक्षेपित होने के कारण किसी भी प्रकार से परमात्मा को दूषित नहीं कर सकता।तब? इस आत्मा का देह में क्या कार्य है सुनो

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥

yathā prakāśhayaty ekaḥ kṛitsnaṁ lokam imaṁ raviḥ kṣhetraṁ kṣhetrī tathā kṛitsnaṁ prakāśhayati bhārata

अर्थहे भारत ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ) सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।।

yathāasprakāśhayatiilluminesekaḥonekṛitsnamentirelokamsolar systemimamthisraviḥsunkṣhetramthe bodykṣhetrīthe soultathāsokṛitsnamentireprakāśhayatiilluminebhārataArjun, the son of Bharat
व्याख्या

आध्यात्मिक साहित्य में भगवान् पार्थसारथि का दिया हुआ यह दृष्टान्त ध्यानाकर्षित करने वाला है। यह दृष्टान्त क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के सम्बन्ध को बोधगम्य बना देता है। जैसे सुदूर आकाश में स्थित एक ही सूर्य सदैव इस जगत् को प्रकाशित करता रहता है? वैसे ही एक आत्मा वस्तुओं? शरीर? मन और बुद्धि को केवल प्रकाशित करता है।यद्यपि? लौकिक भाषा में सूर्य जगत् को प्रकाशित करता है? इस प्रकार कह कर हम सूर्य पर प्रकाशित करने की क्रिया के कर्तृत्व का आरोप करते हैं तथापि विचार करने पर ज्ञात होगा कि इस प्रकार का हमारा आरोप सर्वथा निराधार है। कर्म वह है? जो किसी क्षण विशेष में प्रारम्भ होकर अन्य क्षण में समाप्त होता है तथा सामान्यत वह किसी दृढ़ इच्छा या मूक प्रयोजन की सिद्धि के लिए किया जाता है। इस दृष्टि से सूर्य जगत् को प्रकाशित नहीं करता। प्रकाश तो उसका धर्म है और प्रत्येक वस्तु उसकी उपस्थिति में प्रकाशित होती है। इसी प्रकार? चैतन्य तो आत्मा का स्वरूप है और उसकी उपस्थिति में सब वस्तुएं ज्ञात होती हैं।जगत् के शुभ और अशुभ? सदाचारी और दुराचारी? सुरूप और कुरूप इन सबको एक ही सूर्य प्रकाशित करता है? किन्तु उनमें से किसी के भी गुण या दोष से वह लिप्त नहीं होता। इसी प्रकार? सच्चिदानन्द आत्मा उपाधियों में व्यक्त होने पर भी मन के पाप? बुद्धि के विकार और शरीर के अपराधों से असंस्पृष्ट ही रहता है।इस अध्याय में विवेचित क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विषय का उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥

kṣhetra-kṣhetrajñayor evam antaraṁ jñāna-chakṣhuṣhā bhūta-prakṛiti-mokṣhaṁ cha ye vidur yānti te param

अर्थइस प्रकार, जो पुरुष ज्ञानचक्षु के द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा प्रकृति के विकारों से मोक्ष को जानते हैं, वे परम ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।।

kṣhetrathe bodykṣhetra-jñayoḥof the knower of the bodyevamthusantaramthe differencejñāna-chakṣhuṣhāwith the eyes of knowledgebhūtathe living entityprakṛiti-mokṣhamrelease from material naturechaandyewhoviduḥknowyāntiapproachtetheyparamthe Supreme
व्याख्या

आत्मा सर्वप्रकाशक होने से प्रकाश्य के धर्मों से लिप्त नहीं होता है। इस सिद्धांत का वर्णन करने के पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि मानव जीवन का परम लक्ष्य है? क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के स्वरूप? कार्य और सम्बन्ध को जानकर अपने परमात्मस्वरूप का साक्षात्कार करना। जीवन का यह साध्य वही साधक सम्पादित कर सकता है जो इस अध्याय में निर्दिष्ट विवेक और हृदय के गुणों से साधन सम्पन्न होता है। केवल वही साधक अपने एकमेव अद्वितीय सच्चिदानन्द ब्रह्मस्वरूप का साक्षात् अनुभव कर सकता है। आत्मानुभव का साधन अन्तर्प्रज्ञा कहलाता है? जिसे हिन्दू शास्त्रों में ज्ञानचक्षु कहा गया है।परमात्मस्वरूप में स्थित होकर जिन्होंने प्रकृति (क्षेत्र? अव्यक्त? अविद्या) के आत्यन्तिक अभाव को पहचान लिया है? वे ही पूर्ण ज्ञानी पुरुष हैं। केवल अविद्या वशात् ही प्रकृति की प्रतीति होती है वास्तव में केवल ब्रह्म ही एक पारमार्थिक सत्य है।conclusion तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविज्ञानयोगो नाम त्रयोदशोऽध्याय।।इस प्रकार? श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रस्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त होता है।गीता का यह अतिशय उज्ज्वल अध्याय है? जो हमें अपने नित्यशुद्धबुद्धमुक्त आत्मस्वरूप के ध्यान करने के साक्षात् साधन का उपदेश देता है? जिसके अभ्यास से हम अपरोक्षनुभूति प्राप्त कर सकते हैं। स्वप्न से जाग जाने का अर्थ स्वप्नावस्था के सब दुखों का अन्त हो जाना है। जाग्रत् ? स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं के मध्य यातायात की कोई निश्चित सीमा नहीं निर्धारित की गयी है अर्थात् अवस्थान्तर के लिए हमें कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता है। इसी प्रकार हमारा संसारदुख प्रकृति के साथ हमारे अविद्याजनित मिथ्या तादात्म्य के कारण ही है। अत क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विवेक के द्वारा प्राप्त आत्मबोध से संसार की निवृत्ति हो जाती है। यही एकमात्र ज्ञेय वस्तु है। सम्पूर्ण गीता में? परमात्मा का इससे अधिक स्पष्ट और साक्षात् निर्देशन हमें किसी अन्य अध्याय में नहीं मिलता है।