अध्याय 11, श्लोक 37
अध्याय 11: Viśhwarūp Darśhan Yog — विश्वरूपदर्शनयोगकस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥
kasmāch cha te na nameran mahātman garīyase brahmaṇo ’py ādi-kartre ananta deveśha jagan-nivāsa tvam akṣharaṁ sad-asat tat paraṁ yat
हे महात्मन् ! ब्रह्मा के भी आदि कर्ता और सबसे श्रेष्ठ आपके लिए वे कैसे नमस्कार नहीं करें? (क्योंकि) हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत् असत् और इन दोनों से परे अक्षरतत्त्व है, वह आप ही हैं।।
वे सिद्ध संघ आपको नमस्कार कैसे नहीं करें क्योंकि आप तो सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के भी आदिकर्त्ता हैं। आदिकारण वह है जो सम्पूर्ण कार्यजगत् को व्याप्त करके समस्त नाम और रूपों को धारण करता है? जैसे घटों का कारण मिट्टी और आभूषणों का कारण स्वर्ण है। अनन्तस्वरूप परमात्मा न केवल यह विश्व है? बल्कि समस्त देवों का ईश्वर भी है? क्योंकि उसी सर्वशक्तिमान् परमात्मा से समस्त देवताओं को तथा प्राकृतिक शक्तियों को सार्मथ्य प्राप्त होती है।इस चराचर जगत् को दो भागों सत् और असत् में विभाजित किया जा सकता है। यहाँ सत् शब्द से अर्थ उन वस्तुओं से है? जो इन्द्रिय? मन और बुद्धि के द्वारा जानी जा सकती हैं? अर्थात् जो स्थूल और सूक्ष्म रूप में व्यक्त हैं। स्थूल विषय? भावनाएं और विचार व्यक्त (सत्) कहलाते हैं। इस व्यक्त का जो कारण है? उसे असत् अर्थात् अव्यक्त कहते हैं। व्यक्ति की जीवन पद्धति को नियन्त्रित करने वाला यह अव्यक्त कारण उस व्यक्ति के संस्कार या वासनाएं ही हैं। यहाँ परमात्मा की दी हुई परिभाषा के अनुसार वह सत् और असत् दोनों ही है। और वह इन दोनों से परे भी है।आप इनसे परे भी हैं नाट्यगृह के रंगमंच पर हो रहा नाटक सुखान्त अथवा दुखान्त हो सकता है? परन्तु उन्हें प्रकाशित करने वाला प्रकाश उन दोनों से ही परे होता है। अंगूठी और कण्ठी ये दोनों? निसन्देह स्वर्ण के बने हैं? किन्तु स्वर्ण की परिभाषा यह नहीं दी जा सकती है कि वह अंगूठी या कण्ठी है। वह ये दोनों आभूषण तो हैं ही? परन्तु इन दोनों से परे भी है। इस दृष्टि से? समस्त नामरूपों का सारतत्त्व होने से परमात्मा व्यक्त और अव्यक्त दोनों ही है और अपने स्वरूप की दृष्टि से इन दोनों से परे अक्षर स्वरूप है। वह? अक्षरतत्त्व चैतन्य स्वरूप है? जो स्थूल और सूक्ष्म दोनों का ही प्रकाशक है। इसी अक्षर ने ही यह विराट्रूप धारण किया है? जिसकी स्तुति अर्जुन कर रहा है।प्रस्तुत खण्ड? विश्व के सभी धर्मों में उपलब्ध सार्वभौमिक प्रार्थनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। किसी भी धर्म या जाति के लोगों को इसके प्रति कोई आक्षेप नहीं हो सकता? क्योंकि सनातन सत्य के विषय में जो कुछ भी प्रतिपादित सिद्धांत है? उसका ही सार यह खण्ड है। यह भक्त के हृदय को प्राय अप्रमेय की सीमा तक ऊँचा उठा सकता है। भक्त उसे साक्षात् अनुभव कर सकता है। अर्जुन भगवान् की स्तुति करते हुए कहता है